विजयादशमी के पर्व के अवसर पर भगवान श्रीराम और रावण के युद्ध का प्रतीकात्मक चित्र।

दशहरा भारत के प्रमुख त्योहारों में से एक है। यह पर्व हमें याद दिलाता है कि जीवन में चाहे कितनी भी मुश्किलें क्यों न आएं, अंत में सत्य, धर्म और अच्छाई का मार्ग ही सबसे महत्वपूर्ण होता है। इस दिन देश के अलग-अलग हिस्सों में रावण, कुंभकर्ण और मेघनाद के पुतलों का दहन किया जाता है। मंदिरों में विशेष पूजा होती है और कई जगहों पर रामलीला के माध्यम से भगवान श्रीराम की कहानी दिखाई जाती है।

दशहरे को विजयादशमी भी कहा जाता है। यह त्योहार केवल बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक नहीं है, बल्कि हमें अपने भीतर मौजूद अहंकार, क्रोध और गलत विचारों को दूर करने की प्रेरणा भी देता है। आइए जानते हैं कि दशहरा क्यों मनाया जाता है, भगवान राम और रावण की कहानी क्या है और साल 2026 में यह त्योहार किस दिन मनाया जाएगा।

दशहरा 2026 में कब मनाया जाएगा?

साल 2026 में भारत के अधिकांश हिस्सों में दशहरा 20 अक्टूबर, मंगलवार को मनाया जाएगा। हालांकि, पश्चिम बंगाल और केरल जैसे कुछ क्षेत्रों में स्थानीय परंपराओं के अनुसार विजयादशमी 21 अक्टूबर को मनाई जाएगी।

दशहरा क्यों मनाया जाता है?

दशहरा मनाने के पीछे मुख्य रूप से दो धार्मिक मान्यताएं प्रचलित हैं। पहली मान्यता भगवान श्रीराम की रावण पर विजय से जुड़ी है, जबकि दूसरी मां दुर्गा द्वारा महिषासुर का वध करने से संबंधित है।

उत्तर भारत में दशहरे का संबंध मुख्य रूप से भगवान श्रीराम और रावण की कथा से जोड़ा जाता है। वहीं, देश के कई हिस्सों में यह पर्व मां दुर्गा की शक्ति और महिषासुर पर उनकी विजय के रूप में मनाया जाता है। दोनों ही मान्यताएं बुराई पर अच्छाई की जीत का संदेश देती हैं।

भगवान श्रीराम और रावण की कहानी

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, भगवान श्रीराम अयोध्या के राजा दशरथ के पुत्र थे। उनका विवाह माता सीता से हुआ था। जब भगवान राम अपने भाई लक्ष्मण और पत्नी सीता के साथ वनवास में रह रहे थे, तब लंका के राजा रावण ने माता सीता का अपहरण कर लिया और उन्हें अपनी लंका ले गया।

माता सीता को वापस लाने के लिए भगवान श्रीराम ने रावण के विरुद्ध युद्ध करने का निर्णय लिया। इस कठिन समय में उनके भाई लक्ष्मण, हनुमान जी और वानर सेना ने उनका साथ दिया। हनुमान जी ने माता सीता का पता लगाया और भगवान राम तक उनका संदेश पहुंचाया।

इसके बाद भगवान श्रीराम की सेना और रावण की सेना के बीच युद्ध हुआ। लंबे संघर्ष के बाद भगवान श्रीराम ने रावण का वध किया और माता सीता को मुक्त कराया। इसी विजय की स्मृति में दशहरा मनाया जाता है।

इस कथा से हमें सीख मिलती है कि व्यक्ति कितना भी शक्तिशाली क्यों न हो, उसका अहंकार और गलत कर्म अंततः उसके पतन का कारण बन सकते हैं। रावण विद्वान और शक्तिशाली था, लेकिन उसके अहंकार और अधर्म ने उसे विनाश की ओर पहुंचा दिया।

मां दुर्गा और महिषासुर की कथा

दशहरे का एक अन्य महत्वपूर्ण संबंध मां दुर्गा और महिषासुर की कथा से है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, महिषासुर नामक असुर ने अपनी शक्ति के बल पर देवताओं और अन्य प्राणियों को परेशान करना शुरू कर दिया था। उसे पराजित करना कठिन हो गया था, इसलिए देवताओं ने मां दुर्गा की आराधना की।

इसके बाद मां दुर्गा और महिषासुर के बीच भयंकर युद्ध हुआ। नौ दिनों तक चले इस संघर्ष के बाद दसवें दिन मां दुर्गा ने महिषासुर का वध कर दिया। इसी कारण विजयादशमी को शक्ति, साहस और धर्म की विजय का प्रतीक भी माना जाता है।

नवरात्रि के नौ दिन मां दुर्गा के विभिन्न स्वरूपों की पूजा की जाती है और दसवें दिन विजयादशमी मनाई जाती है। इस अवसर पर भक्त मां दुर्गा से सुख, शांति और समृद्धि की प्रार्थना करते हैं।

दशहरा कैसे मनाया जाता है?

दशहरे के दिन देशभर में अलग-अलग परंपराएं देखने को मिलती हैं। उत्तर भारत के कई शहरों और कस्बों में रामलीला का आयोजन किया जाता है। इसमें कलाकार भगवान राम, माता सीता, लक्ष्मण, हनुमान और रावण जैसे पात्रों की भूमिका निभाते हैं।

शाम के समय रावण, कुंभकर्ण और मेघनाद के पुतलों का दहन किया जाता है। इसे देखने के लिए बड़ी संख्या में लोग मैदानों और सार्वजनिक स्थानों पर पहुंचते हैं। कई जगहों पर मेले लगते हैं, जहां बच्चे झूले झूलते हैं और परिवार एक साथ त्योहार का आनंद लेते हैं।

कुछ क्षेत्रों में लोग शमी के पेड़ की पूजा करते हैं और अपने बड़ों का आशीर्वाद लेते हैं। पश्चिम बंगाल में विजयादशमी दुर्गा पूजा के समापन से जुड़ी है, जबकि मैसूर में दशहरे के दौरान विशेष सांस्कृतिक आयोजन होते हैं।

दशहरे का महत्व क्या है?

दशहरा केवल एक धार्मिक त्योहार नहीं, बल्कि जीवन में अच्छे मूल्यों को अपनाने का अवसर भी है। यह हमें सिखाता है कि सत्य का साथ देना चाहिए और गलत परिस्थितियों में भी अपने सिद्धांतों को नहीं छोड़ना चाहिए।

इस पर्व का संदेश है कि हमें अपने भीतर मौजूद अहंकार, क्रोध, लालच और ईर्ष्या जैसी बुराइयों को पहचानकर उन्हें दूर करने का प्रयास करना चाहिए। जैसे भगवान श्रीराम ने धर्म और मर्यादा का पालन किया, वैसे ही हमें भी अपने जीवन में ईमानदारी, धैर्य और दूसरों के प्रति सम्मान बनाए रखना चाहिए।

दशहरे का वास्तविक अर्थ केवल रावण के पुतले का दहन करना नहीं है। इसका अर्थ अपने भीतर की बुराइयों को दूर करना और अच्छाई के मार्ग पर चलने का संकल्प लेना भी है। यही इस त्योहार का सबसे सुंदर संदेश है।