'12 मन सूखी लकड़ी ही मेरी संपत्ति है...' - जब जिंदगी और मौत के फलसफे पर बेबाक बोले थे नाना पाटेकर|
प्रसिद्ध बॉलीवुड अभिनेता नाना पाटेकर का दिल का दौरा पड़ने से निधन हो गया, उन्होंने 75 वर्ष की उम्र में अंतिम सांस ली।
75 वर्ष की आयु में दिल का दौरा पड़ने से निधन के बाद दिग्गज अभिनेता नाना पाटेकर की फाइल तस्वीर।
महान, बेलाग और बेलौस अभिनेता नाना पाटेकर ने इस दुनिया को बेरुखी के साथ अलविदा कह दिया है। गुरुवार सुबह 75 साल की उम्र में दिल का दौरा पड़ने (हार्ट अटैक) से उनका निधन हो गया। भले ही वे इस दुनिया से चले गए हों, लेकिन उनकी फिल्में, उनके किरदार और उनके साक्षात्कार लोगों के जेहन में हमेशा जिंदा रहेंगे।
नाना पाटेकर का सितंबर 2023 में दिया गया एक इंटरव्यू काफी चर्चा में रहा था, जो उन्होंने अपनी फिल्म ‘द वैक्सीन वॉर’ के रिलीज के दौरान दिया था। कोरोना महामारी के दौर में हर तरफ फैले मौत के खौफ के बीच दिए गए इस इंटरव्यू में उन्होंने जिंदगी और मौत से जुड़े अपने फलसफे को खुलकर साझा किया था।
'मुझे मृत्यु पर विश्वास है, मेरी प्रॉपर्टी बस 12 मन लकड़ी है'
2023 के उस इंटरव्यू में जब नाना पाटेकर से पूछा गया कि फिल्म इंडस्ट्री में ग्लैमर के बीच भी वे किस मिट्टी के बने हैं कि उनके अंदर कोई बनावट नहीं आई, तो उन्होंने 1991 की अपनी फिल्म 'प्रहार' के मेजर चौहान की तरह सीधे और सपाट लहजे में जवाब दिया था। उन्होंने कहा था, "मुझे मालूम है कि कल मरने वाला हूं मैं, मुझे मृत्यु पर विश्वास है। इसी वजह से मुझे इन बातों में कोई दिलचस्पी नहीं है। जो लोग सोचते हैं कि हम कभी मरने वाले नहीं हैं, वो बस बटोरते और जुटाते रहते हैं। हमें मालूम है कि हमको जाना है और 12 मन लकड़ी लगने वाली है। यही मेरी पूरी प्रॉपर्टी है और इसी के साथ चला जाऊंगा।"
'सूखी लकड़ी में जलाना और मरने के बाद तस्वीर मत लगाना'
मौत को लेकर अपनी बेबाक सोच रखते हुए नाना पाटेकर ने बताया था कि उन्होंने अपने अंतिम संस्कार के लिए वास्तव में सूखी लकड़ियां रखी हैं। उन्होंने कहा था, "मैंने कह रखा है कि मुझे उसी में जलाना, गीली लकड़ी मत इस्तेमाल करना, नहीं तो धुआं आएगा और दोस्तों तथा आसपास के लोगों की आंखों में जाएगा। फिर उनकी आंखों से पानी आएगा और मरते वक्त मुझे यह गलतफहमी होगी कि वे मेरे लिए रो रहे हैं। कम से कम मरते वक्त तक तो यह गलतफहमी नहीं होनी चाहिए।"
आगे बात करते हुए उन्होंने कहा था, "मैं इसी तरह से जीता हूं और मुझे लगता है कि यही सच्चाई है। आप मर जाओगे, आपको कोई याद नहीं करेगा और 2-4 दिन के बाद सब भूल जाएंगे। हमने तो यह भी बोल दिया है कि मेरी तस्वीर भी तुम मत लगाओ, पूरी तरह भूल जाओ।"
'मृत्यु के बाद मां-बाप और भाई-बहनों से मिलने जाऊंगा'
नाना पाटेकर ने अपने भावुक पारिवारिक पहलू पर बात करते हुए कहा था, "आज भी मुझे लगता है कि मेरी मां जिंदा हैं। मेरे लिए मृत्यु का मतलब है कि यहां से निकलने के बाद मैं उनसे मिलने जाऊंगा। हम 7 भाई-बहन थे, जिनमें से 6 गुजर गए और मैं अकेला रह गया था। इसलिए मुझे लगता है कि मां, बाप, भाई, बहन कोई नहीं रहा तो मैं इस दुनिया का नहीं रहा। मेरे तो सभी वहीं हैं, इसलिए मैं हमेशा वहीं के बारे में सोचता हूं।"
1986 की फिल्म 'अंकुश' और यादगार किरदार
वर्ष 1986 में आई एन. चंद्रा की फिल्म 'अंकुश' में नाना पाटेकर ने एक बेरोजगार युवक का शानदार किरदार निभाया था। इस फिल्म का एक बेहद चर्चित गाना था— 'इतनी शक्ति हमें देना दाता', जिसे फिल्म में बेरोजगार युवक बने नाना पाटेकर भी गाते हैं। फिल्म की कहानी में वह अपनी मां-बेटी पर हुए अत्याचारों का बदला अपने तीन दोस्तों के साथ मिलकर लेते हैं। इसके अलावा, एन. चंद्रा की ही 1998 में आई फिल्म 'वजूद' में उन्होंने एक सिरफिरे आशिक का यादगार रोल निभाया था, जिसमें माधुरी दीक्षित के लिए कही गई उनकी कविता "कैसे बताऊं कि तुम मेरे लिए क्या हो..." बेहद हिट हुई थी।
'प्रहार' से निर्देशन में कदम और राष्ट्रीय पुरस्कार का सफर
नाना पाटेकर ने वर्ष 1991 में आई फिल्म 'प्रहार: द फाइनल अटैक' से बतौर निर्देशक अपने करियर की शुरुआत की थी। वे इस फिल्म के लेखक, निर्देशक और मुख्य अभिनेता तीनों भूमिकाओं में थे। इसमें उन्होंने भारतीय सेना के उच्च प्रशिक्षित अधिकारी 'मेजर प्रताप चौहान' का रोल निभाया था, जो देश सेवा के साथ-साथ समाज में फैले भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाते हैं।
इससे पहले 1989 में आई विधु विनोद चोपड़ा की फिल्म 'परिंदा' में उन्होंने 'अन्ना सेठ' नाम के खूंखार गैंगस्टर की भूमिका निभाई थी, जिसके लिए उन्हें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार (नेशनल अवॉर्ड) मिला था और इसे भारतीय सिनेमा के बेहतरीन खलनायक किरदारों में गिना जाता है।
नाना पाटेकर की कुछ सबसे यादगार फिल्में:
- अंकुश (1986): बेरोजगार युवक की मुख्य भूमिका।
- परिंदा (1989): 'अन्ना सेठ' का खूंखार गैंगस्टर किरदार (राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित)।
- प्रहार: द फाइनल अटैक (1991): आर्मी कमांडो 'मेजर प्रताप चौहान' का किरदार और बतौर निर्देशक पहली फिल्म।
- तिरंगा (1993): पुलिस इंस्पेक्टर 'शिवाजीराव वाघले' का रोल, जिसमें वे अभिनेता राज कुमार (ब्रिगेडियर सूर्यदेव सिंह) के साथ नजर आए थे|
- क्रान्तिवीर (1994): 'प्रताप' का दमदार किरदार, जिसके लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार और फिल्मफेयर पुरस्कार प्राप्त हुआ।
- वजूद (1998): सिरफिरे आशिक का किरदार।
- अब तक छप्पन (2004): एनकाउंटर स्पेशलिस्ट 'साधु आगाशे' का शांत और गंभीर किरदार।
- अपहरण (2005) व राजनीति (2010): प्रभावशाली राजनीतिज्ञ की भूमिकाएं।
- वेलकम (2007): कॉमेडी किरदार डॉन 'उदय शेट्टी' का रोल, जिसे दर्शकों ने काफी पसंद किया।
- संकल्प (2026): इस वर्ष ओटीटी प्लेटफॉर्म पर रिलीज हुई उनकी वेब सीरीज।