रूस और भारत के बीच प्रस्तावित रेल कॉरिडोर योजना के संदर्भ में व्लादिमीर पुतिन और नरेंद्र मोदी दिखाई दे रहे हैं।

भारत और रूस के बीच द्विपक्षीय संबंधों को एक नया और रणनीतिक आयाम देने की दिशा में एक बेहद अहम प्रस्ताव सामने आया है। ईरान और अमेरिका के बीच लगातार बनी तकरार तथा भू-राजनीतिक तनावों के माहौल के बीच मॉस्को की तरफ से एक खास प्रस्ताव पेश किया गया है। रूस की नजर अब भारत के साथ सीधे तौर पर जमीनी कनेक्टिविटी स्थापित करने पर टिकी हुई है। इसी कड़ी में रूसी उप प्रधानमंत्री मरात खुसनुलिन ने हिंद महासागर तक रेलवे ट्रैक बनाने की संभावनाओं पर गंभीरता से विचार करना शुरू कर दिया है। यह प्रस्ताव वैश्विक व्यापार मार्गों में आ रही बाधाओं के बीच एक वैकल्पिक परिवहन तंत्र की तलाश का हिस्सा माना जा रहा है।

नई दिल्ली और मॉस्को के बीच इस संभावित रेल मार्ग को लेकर चर्चाएं तब शुरू हुईं जब रूसी समाचार एजेंसी टीएएसएस को दिए गए एक साक्षात्कार में उप प्रधानमंत्री मरात खुसनुलिन ने खुलकर अपनी बात रखी। उन्होंने स्पष्ट किया कि मॉस्को को वैश्विक स्तर पर महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों पर अपनी अत्यधिक निर्भरता को कम करने के लिए वैकल्पिक परिवहन मार्गों की गहराई से जांच करनी चाहिए। वर्तमान में वैश्विक व्यापार बड़े पैमाने पर कुछ चुनिंदा समुद्री रास्तों पर निर्भर है, जिनमें बॉस्फोरस और होर्मुज स्ट्रेट जैसे अति-संवेदनशील समुद्री मार्ग प्रमुख रूप से शामिल हैं। इन मार्गों पर लगातार मंडराते खतरों और भू-राजनीतिक अस्थिरता ने रूस को जमीनी गलियारों के विकल्प तलाशने के लिए मजबूर किया है।

खुसनुलिन के अनुसार, इस दूरगामी योजना के तहत एक संभावित विकल्प यह हो सकता है कि रूस से एक रेलवे कॉरिडोर शुरू किया जाए जो तुर्कमेनिस्तान, ईरान, अफगानिस्तान और पाकिस्तान होते हुए सीधे भारत तक अपनी पहुंच बनाए। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि रूस ऐसे किसी भी व्यावहारिक मार्ग पर विचार करने के लिए पूरी तरह तैयार है जो उसे भारत तक सीधी जमीनी पहुंच प्रदान कर सके। हालांकि, यह प्रस्ताव अभी अपने शुरुआती और प्राथमिक चरण में है। प्रस्तावित योजना के तहत फिलहाल रूस और भारत को सीधे तौर पर जोड़ने वाले किसी भी रेलवे मार्ग, यात्री ट्रेन सेवा, टिकट की कीमत या फिर इसके आधिकारिक रूप से शुरू होने की तारीख जैसी कोई भी बात अभी तय नहीं की गई है।

रूस द्वारा इस प्रकार के वैकल्पिक मार्गों की तलाश के पीछे सबसे बड़ा कारण होर्मुज स्ट्रेट से जुड़ी गंभीर चिंताएं हैं। होर्मुज स्ट्रेट दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण और संवेदनशील समुद्री व्यापार मार्गों में शुमार है। आंकड़ों के अनुसार, वैश्विक तेल व्यापार का लगभग 25 प्रतिशत हिस्सा और लिक्विड नेचुरल गैस यानी एलएनजी की करीब 20 प्रतिशत खेप इसी एक मार्ग से होकर गुजरती है। हाल के दिनों में अमेरिका, इजरायल और ईरान के बीच बढ़ते सैन्य तनाव के कारण इस समुद्री मार्ग के जरिए होने वाले व्यापार में भारी रुकावटें आई हैं। स्थिति तब और गंभीर हो गई जब 28 फरवरी को अमेरिका और इजरायल ने ईरान पर संयुक्त सैन्य हमले किए, जिसमें तेहरान समेत कई प्रमुख शहरी केंद्रों को निशाना बनाया गया। इसके जवाब में ईरान ने भी इजरायली ठिकानों के साथ-साथ बहरीन, जॉर्डन, इराक, कतर, कुवैत, संयुक्त अरब अमीरात और सऊदी अरब में स्थित अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर मिसाइल और ड्रोन हमले किए, जिससे पूरे क्षेत्र में सुरक्षा संकट गहरा गया है।

ऐसी अस्थिरता के बीच भारत के लिए यह रेल कॉरिडोर भू-राजनीतिक और आर्थिक रूप से बेहद अहम माना जा रहा है। यदि यह प्रस्तावित जमीनी संपर्क भविष्य में आकार लेता है, तो यह रूस को पूरी तरह से समुद्री परिवहन पर निर्भर हुए बिना हिंद महासागर की दिशा में माल और सामग्री पहुंचाने के लिए एक सुरक्षित और वैकल्पिक मार्ग उपलब्ध कराएगा। इससे मध्य और दक्षिण एशिया के साथ रूस की जमीनी कनेक्टिविटी भी काफी मजबूत होगी। इसके अलावा, भारत के लिए यह कॉरिडोर रूस और मध्य एशिया के तमाम देशों के साथ व्यापार और कूटनीति के नए रास्ते खोलेगा। भविष्य में यदि यह मार्ग धरातल पर उतरता है, तो इससे दोनों क्षेत्रों के बीच लोगों की आवाजाही बढ़ने और पर्यटन को भी जबर्दस्त बढ़ावा मिलने की पूरी उम्मीद है। हालांकि, इस महात्वाकांक्षी परियोजना को अमली जामा पहनाने के लिए कई देशों के बीच व्यापक सहमति, बड़े पैमाने पर बुनियादी ढांचे के विकास और सीमा पार आवाजाही, ट्रांजिट तथा सुरक्षा को लेकर एक मजबूत समन्वय की सख्त आवश्यकता होगी।