पाकिस्तान का 'आतंकी ट्रेनर' बना अपनी ही सेना का निशाना, PoJK में मारा गया पूर्व SSG कमांडो फारूक खान|

पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर में प्रदर्शन के दौरान पाकिस्तानी सेना की गोलीबारी में पूर्व एसएसजी कमांडो और आतंकी ट्रेनर फारूक खान की मौत हो गई है।

Update: 2026-07-31 07:47 GMT

सफेद दाढ़ी और काले चश्मे पहने पूर्व एसएसजी कमांडो फारूक खान पीओके में विरोध प्रदर्शन के दौरान नजर आ रहे हैं।

पाकिस्तान के कब्जे वाले जम्मू-कश्मीर (PoJK) से एक बेहद अहम और बड़ा भू-राजनीतिक घटनाक्रम सामने आया है, जहां भारत के खिलाफ सक्रिय आतंकवादियों को लंबे समय तक ट्रेनिंग देने वाला और पाकिस्तानी सेना का पूर्व एसएसजी (SSG) कमांडो फारूक खान उर्फ कमांडर फारूक सुधन पाकिस्तानी रेंजर्स की गोलीबारी में मारा गया है। इस घटना ने एक बार फिर पाकिस्तान के कब्जे वाले क्षेत्रों में सुलग रहे असंतोष और पाकिस्तानी सेना के दमनकारी रवैए को वैश्विक मंच पर उजागर कर दिया है।

फारूक खान मूल रूप से PoJK के पलंदरी क्षेत्र का रहने वाला था। अपनी सैन्य पृष्ठभूमि के तहत उसने साल 1960 से 1988 तक पाकिस्तानी सेना के विशिष्ट स्पेशल सर्विस ग्रुप (SSG) में एक कमांडो के रूप में अपनी सेवाएं दी थीं। पाकिस्तानी सेना से सेवानिवृत्त होने के बाद वह यासीन मलिक के नेतृत्व वाले जम्मू-कश्मीर लिबरेशन फ्रंट (JKLF) संगठन में शामिल हो गया था। 1990 के दशक के दौरान वह केवल JKLF तक सीमित नहीं रहा, बल्कि हरकत-उल-जिहाद-अल-इस्लामी (HUJI) और हिजबुल मुजाहिदीन जैसे कुख्यात आतंकवादी संगठनों से भी जुड़ गया था। वह हिजबुल मुजाहिदीन के उस प्रमुख 'खालिद बिन वलिद' ट्रेनिंग कैंप का मुख्य मास्टरमाइंड था, जिसका इस्तेमाल भारत के खिलाफ घाटी में घुसपैठ करने वाले आतंकवादियों को तैयार करने और उन्हें हथियारों का प्रशिक्षण देने के लिए किया जाता था।

खुफिया और ओपन सोर्स इंटेलिजेंस (OsintTV) द्वारा हाल ही में जारी की गई तस्वीरों से यह साफ हो चुका है कि कैसे फारूक खान पाकिस्तानी सेना के साए में PoJK के घने जंगलों और आतंकी शिविरों में हथियारबंद नए रंगरूटों को ट्रेनिंग दिया करता था। इन प्रमाणों ने एक बार फिर इस बात पर मुहर लगा दी है कि किस तरह पाकिस्तानी तंत्र भारत के खिलाफ आतंकवाद को बढ़ावा देने के लिए अपने पूर्व और वर्तमान सैन्य संसाधनों का इस्तेमाल करता रहा है। हालांकि, साल 2003 के बाद उसने हिजबुल मुजाहिदीन से अपनी दूरी बना ली थी और अपना पूरा समय JKLF की गतिविधियों में लगाने लगा था, जहां यासीन मलिक के साथ उसके गहरे संबंध थे और वह अक्सर उसके संपर्क में रहता था।

हालिया घटनाक्रम के अनुसार, PoJK में पिछले कुछ समय से स्थानीय जनता पाकिस्तान सरकार और प्रशासन के खिलाफ बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन कर रही है। इन प्रदर्शनों में फारूक खान भी खुलकर शामिल हो गया था। गत 27 जून को जब पीओके के लोग रावलाकोट से मुजफ्फराबाद के लिए एक बड़ा मार्च और रैली निकाल रहे थे, तो शहीद चौक के पास पाकिस्तानी सेना और रेंजर्स ने प्रदर्शनकारियों पर अंधाधुंध गोलीबारी शुरू कर दी। इसी खूनी संघर्ष और फायरिंग के दौरान पाकिस्तानी रेंजर्स की गोली की चपेट में आने से फारूक खान गंभीर रूप से घायल हो गया और आखिरकार उसकी मौत हो गई।

स्थानीय जानकारों और रिपोर्टों का कहना है कि जिस पाकिस्तानी सेना और खुफिया एजेंसी आईएसआई (ISI) के लिए उसने दशकों तक काम किया था और भारत के खिलाफ साजिशें रची थीं, वही तंत्र अंततः उसके और वहां की जनता के खिलाफ खड़ा हो गया। स्थानीय लोगों के बीच इस बात की चर्चा है कि जब फारूक खान ने प्रदर्शनों के दौरान पाकिस्तानी हुक्मों और आईएसआई की अंदरूनी रणनीतियों के राज खोलना शुरू किए, तो उसका मुंह हमेशा के लिए बंद कर दिया गया।

इस घटना के बाद से पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर में तनाव और अधिक बढ़ गया है। पूर्व सैन्य अधिकारियों और आतंकवाद के संरक्षकों का इस तरह अपने ही देश की सेना की गोलीबारी में मारा जाना इस बात का प्रमाण है कि पाकिस्तान का दमनकारी ढांचा अब अपनों को भी नहीं बख्श रहा है। इस पूरी घटना ने एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि PoJK में पनप रहा जनआक्रोश अब हिंसक रूप ले चुका है, जहां आम नागरिकों के साथ-साथ पूर्व सैन्य और वैचारिक रूप से जुड़े लोग भी पाकिस्तानी सेना के अत्याचारों का शिकार बन रहे हैं।

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