15 साल बाद जन्माष्टमी पर बन रहा अष्टमी-रोहिणी का दुर्लभ संयोग, जानें श्रेष्ठ मुहूर्त
4 सितंबर को जन्माष्टमी पर 15 साल बाद अष्टमी तिथि और रोहिणी नक्षत्र का दुर्लभ संयोग बन रहा है, जानें निशीथ काल का श्रेष्ठ मुहूर्त।
तस्वीर में ज्योतिषाचार्य बाबूलाल शास्त्री टोंक में खड़े हुए दिखाई दे रहे हैं।
टोंक में इस वर्ष श्रीकृष्ण जन्माष्टमी पर अष्टमी तिथि और रोहिणी नक्षत्र का विशेष दुर्लभ संयोग बन रहा है। मनु ज्योतिष एवं वास्तु शोध संस्थान, टोंक के निदेशक बाबूलाल शास्त्री के अनुसार यह संयोग 15 वर्ष बाद बन रहा है। भगवान श्रीकृष्ण का जन्म द्वापर युग में भाद्रपद कृष्ण अष्टमी की मध्य रात्रि में रोहिणी नक्षत्र में हुआ था। इसी कारण जन्माष्टमी के अवसर पर अष्टमी तिथि के साथ रोहिणी नक्षत्र का संयोग विशेष महत्व रखता है।
बाबूलाल शास्त्री ने बताया कि गत वर्षों में कई बार जन्माष्टमी के दिन अष्टमी तिथि तो रही, लेकिन रोहिणी नक्षत्र का संयोग नहीं बन पाया। रामानंदी संप्रदाय में भगवान श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव के लिए रोहिणी नक्षत्र को विशेष महत्व दिया जाता है। इसी कारण रामानंदी संप्रदाय और वैष्णव संप्रदाय की ओर से अलग-अलग दिन जन्माष्टमी मनाई जाती रही है। इस वर्ष दोनों संप्रदाय एक ही दिन 4 सितंबर को जन्माष्टमी मनाएंगे।
उन्होंने बताया कि इस वर्ष 4 सितंबर, शुक्रवार को भाद्रपद कृष्ण पक्ष अष्टमी है। अष्टमी तिथि अर्धरात्रि 24:13 बजे तक और रोहिणी नक्षत्र अर्धरात्रि 23:04 बजे तक रहेगा। इस तरह जन्माष्टमी पर अष्टमी तिथि और रोहिणी नक्षत्र का विशेष दुर्लभ संयोग बन रहा है।
श्रीकृष्ण जन्मोत्सव के लिए मध्य रात्रि के निशीथ काल में 11:56 से 12:41 बजे तक का समय महाअभिषेक के लिए श्रेष्ठ मुहूर्त बताया गया है। जन्माष्टमी की अर्धरात्रि में अष्टमी तिथि और रोहिणी नक्षत्र का एक साथ संयुक्त रूप से होना विशेष फलदायी माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार ऐसे संयोग में भगवान श्रीकृष्ण की आराधना करने से विशेष फल की प्राप्ति होती है।
बाबूलाल शास्त्री ने बताया कि जन्माष्टमी पर भगवान श्रीकृष्ण के बाल स्वरूप लड्डू गोपाल की पूजा और उपवास करना चाहिए। उन्हें पंचामृत से स्नान कराकर माखन-मिश्री, पंजीरी, फल और मिष्ठान का नैवेद्य अर्पित करना चाहिए। इस वर्ष बनने वाला अष्टमी-रोहिणी संयोग जन्माष्टमी के धार्मिक आयोजन और श्रीकृष्ण आराधना के लिए विशेष महत्व रखता है।