यूपी चुनाव 2027: यूजीसी विवाद पर बीजेपी ने बनाई संघ के साथ खास रणनीति
यूजीसी नियमों पर सवर्णों की नाराजगी दूर करने और सामाजिक समीकरण साधने के लिए बीजेपी और संघ ने छात्र संवाद व चौपालों की योजना तैयार की है।
यूजीसी के नए नियमों के विरोध में उत्तर प्रदेश में सड़कों पर उतरे छात्र प्रदर्शन कर रहे हैं।
उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले भारतीय जनता पार्टी (BJP) के सामने जातीय और सामाजिक समीकरणों को साधने की चुनौती बढ़ती जा रही है। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) के इक्विटी और जाति आधारित भेदभाव संबंधी नियमों को लेकर उठे विवाद ने पार्टी की चुनावी रणनीति को नई मुश्किल में डाल दिया है। बीजेपी को आशंका है कि इस मुद्दे का असर आगामी विधानसभा चुनाव के समीकरणों, खासकर युवा और नए मतदाताओं पर पड़ सकता है। ऐसे में पार्टी के सामने अपने परंपरागत सवर्ण वोटबैंक को बनाए रखने के साथ गैर-यादव ओबीसी और दलित वर्गों के बीच सामाजिक समीकरणों को संतुलित रखने की चुनौती है।
विधान परिषद की शिक्षक और स्नातक कोटे की सीटों पर हुए चुनाव में सवर्ण जातियों की नाराजगी का नुकसान बीजेपी को आगरा, वाराणसी और लखनऊ की सीटों पर उठाना पड़ा है। इसे 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले एक महत्वपूर्ण राजनीतिक संकेत माना जा रहा है। इसी के मद्देनजर बीजेपी ने प्रदेश में बिगड़ते सामाजिक और जातीय समीकरणों को दुरुस्त करने की रणनीति तैयार की है और उसे जमीन पर उतारने की कवायद भी शुरू कर दी है।
यूजीसी के कुछ नए प्रावधानों और दिशा-निर्देशों को लेकर उत्तर प्रदेश के विभिन्न शैक्षणिक संस्थानों और छात्र संगठनों के बीच असंतोष की स्थिति देखने को मिली है। इन नियमों के संभावित नफा-नुकसान और सामाजिक प्रभावों को लेकर विपक्षी दल इसे चुनावी मुद्दा बनाने की कोशिश में जुटे हैं। इस राजनीतिक चुनौती को देखते हुए बीजेपी सतर्क हो गई है। पार्टी और संगठन स्तर पर नीतिगत एवं वैधानिक मुद्दों को समय रहते सुलझाने तथा किसी भी तरह के असंतोष को बढ़ने से रोकने के लिए अंदरखाने मंथन शुरू हो चुका है।
इस रणनीति में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) और बीजेपी ने मिलकर छात्र संवाद पर जोर देने का फैसला किया है। दोनों संगठनों की कोशिश है कि युवाओं और छात्रों के बीच किसी भी तरह का गलत संदेश न पहुंचे और उनकी शंकाओं का समय रहते समाधान किया जा सके।
बीजेपी के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि यूजीसी नियमों का खुलकर समर्थन करने पर करीब 17-18 प्रतिशत सवर्ण वोटबैंक के नाराज होकर दूर जाने का खतरा है। वहीं, इन नियमों का खुलकर विरोध करने पर गैर-यादव ओबीसी और दलित वोटबैंक प्रभावित हो सकता है। सुप्रीम कोर्ट के अंतरिम आदेश और केंद्र सरकार की ओर से विचार के संकेतों से कानूनी राहत जरूर मिली है, लेकिन राजनीतिक नुकसान की भरपाई को लेकर पार्टी की चिंता बरकरार है। इसी कारण बीजेपी ने केवल संगठनात्मक बैठकों तक सीमित रहने के बजाय सीधे लोगों के बीच पहुंचने की रणनीति बनाई है।
यूजीसी विवाद से नाराज सवर्ण युवाओं को मनाने के लिए बीजेपी ने अपने विभिन्न प्रकोष्ठों को सक्रिय कर दिया है। संविधान, यूजीसी और एसआईआर समेत विभिन्न मुद्दों पर विपक्ष की ओर से बनाए जा रहे नैरेटिव का जवाब देने के लिए प्रकोष्ठों के पदाधिकारी और सदस्य मैदान में उतरेंगे। इस संबंध में पार्टी के सभी प्रकोष्ठों के पदाधिकारियों और सदस्यों की बैठक हुई, जिसमें राष्ट्रीय समन्वयक वीडी शर्मा और प्रदेश संगठन महामंत्री धर्मपाल सिंह ने संयोजकों, सह-संयोजकों और सदस्यों को उनकी जिम्मेदारियों के बारे में बताया।
बैठक में धर्मपाल सिंह ने अफवाहों को लेकर सतर्क रहने और सोशल मीडिया से लेकर समाज के हर वर्ग तक उनका तेजी से तथ्यात्मक जवाब पहुंचाने पर जोर दिया। उन्होंने एसआईआर को लेकर भी सतर्क रहने की सलाह दी। साथ ही प्रकोष्ठों के पदाधिकारियों और सदस्यों को घर-घर संपर्क अभियान चलाने तथा मतदाता सूची की जांच करने के निर्देश दिए।
राष्ट्रीय समन्वयक वीडी शर्मा ने बताया कि शिक्षकों, चिकित्सकों, अधिवक्ताओं, व्यापारियों, युवाओं, दुग्ध उत्पादकों, रेहड़ी-पटरी विक्रेताओं और वरिष्ठ नागरिकों को अभियानों से जोड़ा गया है। इसका उद्देश्य समाज के प्रत्येक वर्ग के साथ बेहतर संवाद स्थापित करना है। यूजीसी के मुद्दे पर नाराज सवर्ण युवाओं तक भी पार्टी के प्रकोष्ठ पहुंचेंगे और उनकी नाराजगी दूर करने का प्रयास करेंगे। इसके लिए सामाजिक चौपालों के आयोजन की योजना बनाई गई है।
बीजेपी और संघ के कार्यकर्ता मिलकर प्रदेशभर में छात्रों के साथ संवाद और बैठकें करेंगे। इन कार्यक्रमों के जरिए युवाओं की शंकाओं को दूर करने के साथ विपक्ष के आरोपों का तथ्यों के आधार पर जवाब दिया जाएगा। पार्टी ने अपने सभी प्रकोष्ठों को एक महीने की कार्ययोजना तैयार कर अभियान चलाने के निर्देश दिए हैं। वैचारिक और राजनीतिक मोर्चे पर सक्रिय रहते हुए समाज के बीच सही जानकारी पहुंचाने की जिम्मेदारी भी इन्हें सौंपी गई है।
आरएसएस और बीजेपी के शीर्ष नेतृत्व का जोर इस बात पर है कि शिक्षण संस्थानों से जुड़े मुद्दों को गंभीरता से लेते हुए तत्काल संज्ञान में लिया जाए। चुनाव से पहले विशेषकर युवा और छात्र वर्ग में किसी भी तरह की नाराजगी को बढ़ने से रोकने के लिए नीतिगत स्तर पर संवाद और समन्वय स्थापित किया जा रहा है। पार्टी के अलग-अलग प्रकोष्ठों के लगातार संवाद कार्यक्रमों के माध्यम से सरकार की प्राथमिकताओं को स्पष्ट करने की तैयारी है।
उत्तर प्रदेश में बीजेपी की रणनीति का एक अहम हिस्सा सामाजिक चौपालें भी हैं। इनके माध्यम से अलग-अलग सामाजिक और जातीय समुदायों के बीच सीधा संवाद स्थापित किया जाएगा। पार्टी की कोशिश है कि इन चौपालों में विभिन्न वर्गों की समस्याओं, अपेक्षाओं और मुद्दों को विस्तार से समझा जाए। इसके लिए स्थानीय स्तर पर सामाजिक प्रतिनिधियों और समुदायों के प्रभावशाली लोगों को भी अभियान से जोड़ने पर जोर दिया जाएगा।
बीजेपी की रणनीति का एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि उत्तर प्रदेश के चुनावी विमर्श को केवल जातीय समीकरणों तक सीमित रखने के बजाय धर्म के मुद्दे पर केंद्रित किया जाए। पार्टी की कोशिश है कि अलग-अलग जातियों में बंटे हिंदू मतदाताओं को एकजुट कर समाजवादी पार्टी के पीडीए यानी पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक फॉर्मूले का मुकाबला किया जाए।
दरअसल, उत्तर प्रदेश की राजनीति में युवा और छात्र मतदाताओं की भूमिका हमेशा महत्वपूर्ण रही है। यूजीसी विवाद जैसे मुद्दों पर विपक्षी दल बीजेपी सरकार को घेरने की कोशिश कर रहे हैं। वहीं, 2024 के लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश के भीतर बीजेपी के वोट शेयर में आई गिरावट और समाजवादी पार्टी के पीडीए फॉर्मूले के प्रभाव ने पार्टी की चिंता बढ़ाई है।
प्रदेश में सवर्ण मतदाताओं की हिस्सेदारी भले ही करीब 18 प्रतिशत हो, लेकिन चुनावी माहौल और राजनीतिक दिशा तय करने में इस वर्ग की भूमिका अहम मानी जाती है। सवर्ण समुदाय में बढ़ती नाराजगी बीजेपी के सबका साथ वाले नैरेटिव को भी कमजोर कर सकती है। ऐसे में पार्टी के सामने सवर्णों की नाराजगी दूर करने, ओबीसी और दलित समीकरणों को बनाए रखने तथा विपक्ष के नैरेटिव का जवाब देने की दोहरी चुनौती है।
इसी चुनौती से निपटने के लिए बीजेपी का संगठनात्मक तंत्र सक्रिय हो गया है। पार्टी की रणनीति है कि चुनाव से पहले ही संभावित असंतोष को नियंत्रित कर लिया जाए, ताकि उसका असर विधानसभा चुनाव के नतीजों पर न पड़े। इसके तहत नाराज सवर्ण नेताओं और स्थानीय प्रबुद्ध वर्ग के लोगों के साथ सीधे संवाद तथा जिला स्तरीय बैठकें शुरू करने की योजना बनाई गई है।
अब 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले बीजेपी और संघ की छात्र संवाद मुहिम, सामाजिक चौपालों और प्रकोष्ठों के अभियान की अहम भूमिका रहने वाली है। पार्टी के सामने सबसे बड़ी परीक्षा सवर्णों की नाराजगी दूर करते हुए गैर-यादव ओबीसी और दलित मतदाताओं के साथ अपने सामाजिक समीकरणों को बनाए रखने की होगी।