इजरायल चुनाव के बाद प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू संसद में बहुमत से दूर रहे।

इजरायल के आम चुनाव में प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के नेतृत्व वाली राजनीतिक गठबंधन व्यवस्था अपने प्रतिद्वंद्वियों से आगे रही, लेकिन संसद में बहुमत हासिल करने में नाकाम रही। मंगलवार को हुए चुनाव के बाद 90 प्रतिशत मतों की गिनती पूरी होने पर नेतन्याहू की लिकुड पार्टी और उसके दक्षिणपंथी तथा धार्मिक सहयोगियों को 120 सदस्यीय संसद में 53 सीटें मिलने का अनुमान है। पूर्व सैन्य प्रमुख गादी आइजेनकोट के नेतृत्व वाले विपक्षी गठबंधन को 48 सीटें मिलने की संभावना है, जबकि अरब पार्टियां ऐतिहासिक रूप से 19 सीटें हासिल करती दिख रही हैं। सरकार बनाने के लिए 61 सीटों की जरूरत है, लेकिन दोनों प्रमुख गठबंधन इस आंकड़े से दूर हैं।

यह परिणाम नेतन्याहू के लिए राजनीतिक राहत लेकर आया है। गाजा युद्ध से निपटने के उनके तरीके, 7 अक्टूबर 2023 को हमास के हमलों से जुड़ी सुरक्षा विफलताओं और इजरायली बंधकों के भविष्य को लेकर उन्हें तीखी आलोचनाओं का सामना करना पड़ा है। इसके बावजूद उनकी लिकुड पार्टी देश की सबसे बड़ी राजनीतिक ताकत बनी हुई है और उसे 26 संसदीय सीटें मिलने का अनुमान है।

चुनाव ने संसद में राजनीतिक शक्ति के संतुलन को भी बदल दिया है। अरब पार्टियों ने रिकॉर्ड स्तर पर अपने मतदाताओं को मतदान केंद्रों तक पहुंचाया। इजरायल के दक्षिणी रेगिस्तानी क्षेत्रों में मतदान केंद्रों पर ऊंटों से पहुंचते लोगों के वीडियो भी सामने आए। दो अरब राजनीतिक समूहों, ज्वाइंट लिस्ट और राम के संयुक्त रूप से 19 सीटें जीतने का अनुमान है। यह उनकी मौजूदा संसदीय भागीदारी के मुकाबले लगभग दोगुना है और इससे अगली सरकार के गठन में उनकी भूमिका निर्णायक हो सकती है।

ज्वाइंट लिस्ट तीन पार्टियों हदाश, ताल और बलाद का गठबंधन है। यह कम्युनिस्ट, अरब राष्ट्रवादी और फिलिस्तीनी राष्ट्रवादी राजनीति के विभिन्न विचारों का प्रतिनिधित्व करता है। इससे जुड़ी पार्टियां जायनिज्म यानी यहूदी राष्ट्रीय आंदोलन की विचारधारा का विरोध करती हैं और गाजा में इजरायल की सैन्य कार्रवाई की कड़ी आलोचक हैं।

इसके विपरीत, मंसूर अब्बास के नेतृत्व वाली राम एक इस्लामवादी पार्टी है, जिसने इजरायली राजनीति के प्रति अधिक व्यावहारिक रुख अपनाया है। वर्ष 2021 में यह किसी इजरायली सरकार के गठबंधन में शामिल होने वाली पहली स्वतंत्र अरब पार्टी बनी थी। सरकार गठन के गणित में यह अंतर महत्वपूर्ण है। राम ने यहूदी पार्टियों के साथ मिलकर सरकार चलाने की इच्छा दिखाई है, जबकि ज्वाइंट लिस्ट की विचारधारा इजरायल की राजनीतिक व्यवस्था के प्रति अधिक विरोधी है।

प्रमुख यहूदी विपक्षी पार्टियां पहले ही सरकार बनाने के लिए अरब पार्टियों पर निर्भर रहने से इनकार कर चुकी हैं। इससे नेतन्याहू को सत्ता से हटाने की कोशिशों के सामने गंभीर बाधा खड़ी हो गई है, भले ही विपक्षी दलों के पास संयुक्त रूप से संसदीय बहुमत बनाने की संभावना हो।

गादी आइजेनकोट के लिए, जिनकी नवगठित याशर पार्टी को 21 सीटें मिलने का अनुमान है, चुनाव परिणाम अवसर और चुनौती दोनों लेकर आया है। चुनाव के बाद उन्होंने कहा, “जनता ने बदलाव के लिए मतदान किया। विफलता के गठबंधन ने लोगों का विश्वास खो दिया है।” उन्होंने “सार्वभौमिक सैन्य सेवा” और “हमास को खत्म करने” के लिए प्रतिबद्ध सरकार बनाने का भी संकल्प जताया।

सैन्य सेवा इस चुनाव का एक प्रमुख मुद्दा रही। अति-रूढ़िवादी यहूदी पुरुषों को सैन्य सेवा से छूट देने के सवाल पर मतभेदों ने नेतन्याहू के पिछले गठबंधन पर दबाव बढ़ाया था। चुनाव में हमास के हमलों और उसके बाद हुए युद्धों के संदर्भ में इजरायल के सुरक्षा नेतृत्व पर जनता के भरोसे की भी परीक्षा हुई। मतदान प्रतिशत लगभग 80 प्रतिशत रहा, जो 1999 के बाद सबसे अधिक है।

राष्ट्रपति इसहाक हर्जोग ने राजनीतिक नेताओं से समझौता करने और देश को एक और चुनाव की ओर जाने से बचाने की अपील की है। उन्होंने बुधवार से पहले दिन कहा, “हमें एक और चुनाव के दौर से बचने के लिए हर संभव प्रयास करना चाहिए, विशेष रूप से कल के बाद। इसलिए, मैं उम्मीद करता हूं कि यहां आने वाला हर व्यक्ति खुले मन से आएगा।” राष्ट्रपति के रूप में हर्जोग की भूमिका अगले सप्ताह राजनीतिक दलों के नेताओं के साथ औपचारिक परामर्श शुरू करने और उसके बाद सरकार बनाने का प्रयास करने के लिए किसी उम्मीदवार का चयन करने की है।

फिलहाल सरकार गठन के सामने कई विकल्प हैं। नेतन्याहू विपक्षी सांसदों को अपने गठबंधन में शामिल करने की कोशिश कर सकते हैं। आइजेनकोट अरब पार्टियों का समर्थन जुटा सकते हैं या फिर व्यापक राष्ट्रीय एकता सरकार बनाने का प्रयास किया जा सकता है। हालांकि, सुरक्षा नीति, सैन्य सेवा और नेतन्याहू के नेतृत्व को लेकर गहरे मतभेद इन सभी विकल्पों को कठिन बनाते हैं। यदि बातचीत विफल रहती है, तो इजरायल में अगले साल की शुरुआत में फिर से आम चुनाव हो सकते हैं।

सत्ता का संतुलन बदलने वाले अन्य घटनाक्रमों में संसद में विपक्ष की ओर से नई सरकार बनने से पहले नए कानून पारित कर नेतन्याहू पर दबाव बनाने की कोशिशें शामिल हैं। इसके अलावा, इजरायल और अमेरिकी बलों के बीच ईरान के साथ फिर से लड़ाई शुरू होने की आशंका भी राजनीतिक समीकरणों को प्रभावित कर सकती है।

फिलहाल चुनाव ने नेतन्याहू की चुनावी मजबूती तो दिखाई है, लेकिन उनकी सत्ता में बने रहने की स्थिति सुनिश्चित नहीं की है। इजरायल की अगली सरकार का भविष्य इस बात पर निर्भर करेगा कि कौन-सी पार्टी सबसे आगे रही, इससे अधिक महत्वपूर्ण यह है कि राजनीतिक नेता संसद में सरकार चलाने लायक बहुमत जुटाने के लिए कितना प्रभावी समझौता कर पाते हैं।