UP MLC Election Results: भाजपा के लिए क्या संकेत हैं विधान परिषद चुनाव?
वाराणसी और लखनऊ में परिणामों के बाद भाजपा के भीतर आंतरिक गुटबाजी और प्रत्याशी चयन पर उठे सवालों के बीच 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले रणनीति पर मंथन।
उत्तर प्रदेश विधान परिषद चुनाव के नतीजों के बाद राजनीतिक दलों में समीक्षा और मंथन का दौर जारी है।
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के संसदीय क्षेत्र वाराणसी, रक्षामंत्री राजनाथ सिंह की सीट लखनऊ और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के गढ़ नागपुर में एमएलसी चुनाव के नतीजों ने भारतीय जनता पार्टी के भीतर संगठनात्मक रणनीति और प्रत्याशी चयन को लेकर नई बहस छेड़ दी है। हाईप्रोफाइल सीटों पर पार्टी के प्रदर्शन और कुछ सीटों पर करीबी मुकाबले के बाद संगठन के भीतर ही कथित गुटबाजी, भीतरघात और नेताओं की महत्वाकांक्षाओं को लेकर सवाल उठने लगे हैं।
देश के चार राज्यों उत्तर प्रदेश, बिहार, महाराष्ट्र और कर्नाटक की 28 विधान परिषद (एमएलसी) सीटों पर चुनाव संपन्न हो चुके हैं। सभी राजनीतिक दल और विश्लेषक परिणामों का अपने-अपने राजनीतिक लाभ-हानि के नजरिये से आकलन कर रहे हैं। हालांकि, इस बार के चुनाव कई ऐसे सवाल छोड़ गए हैं, जिनके जवाब राजनीतिक दलों के रणनीतिकारों को तलाशने होंगे। विशेष रूप से उत्तर प्रदेश के संदर्भ में भाजपा के शीर्ष नेतृत्व के सामने संगठन की कार्यप्रणाली और चुनावी प्रबंधन की समीक्षा की चुनौती खड़ी हुई है।
भाजपा को अन्य राजनीतिक दलों से अलग संगठन को सर्वोपरि रखने वाली पार्टी के रूप में देखा जाता है। पार्टी किसी व्यक्ति या परिवार की जागीर होने के बजाय संगठन की प्राथमिकता का दावा करती रही है। शीर्ष नेतृत्व सार्वजनिक मंचों से भी भाजपा को आंतरिक गुटबाजी से दूर और अनुशासन के लिए पहचाना जाने वाला राजनीतिक दल बताता रहा है। इसके बावजूद एमएलसी चुनावों में उत्तर प्रदेश की वाराणसी और लखनऊ जैसी महत्वपूर्ण सीटों के साथ महाराष्ट्र की नागपुर सीट पर पार्टी के प्रदर्शन ने इन दावों के सामने सवाल खड़े किए हैं।
इन चुनावी नतीजों के पीछे भाजपा के कुछ नेताओं की अति महत्वाकांक्षा और संगठनात्मक अनुशासन की अनदेखी को बड़ी वजह माना जा रहा है। पहले पार्टी के अधिकांश नेता और कार्यकर्ता निस्वार्थ भाव से धरातल पर सक्रिय दिखाई देते थे, लेकिन लंबे समय तक सत्ता में रहने के कारण कुछ नेताओं के अहंकार और महत्वाकांक्षाओं में वृद्धि की चर्चा है। आरोप हैं कि सत्ता के मद में चूर कुछ नेता जनता के साथ-साथ पार्टी के केंद्रीय और प्रदेश नेतृत्व के दिशा-निर्देशों की भी लगातार अनदेखी कर रहे हैं।
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह के दौर में भाजपा की पहचान ऐसे राजनीतिक दल के रूप में बनी है, जिसके नेता और कार्यकर्ता किसी भी स्तर के चुनाव को हल्के में नहीं लेते। इसके बावजूद उत्तर प्रदेश के एमएलसी चुनावों में पार्टी के प्रदर्शन ने रणनीतिकारों को सभी जीती और हारी सीटों के परिणामों का विस्तार से विश्लेषण करने के लिए मजबूर कर दिया है।
उत्तर प्रदेश में वर्ष 2027 में विधानसभा चुनाव होने हैं। भाजपा को योगी सरकार के कार्यों के आधार पर लगातार तीसरी बार सत्ता हासिल करने की उम्मीद है। ऐसे समय में पार्टी के शीर्ष रणनीतिकार एमएलसी चुनावों के माध्यम से प्रत्येक सीट पर जीत का अंतर बढ़ाकर विपक्षी दलों को जनता की अदालत में कमजोर करना और भाजपा के पक्ष में माहौल तैयार करना चाहते थे। लेकिन सूत्रों के अनुसार, लगातार बैठकों और आपसी मेल-मिलाप के बावजूद पार्टी के कुछ नेताओं की कथित भीतरघात और अनुशासनहीनता के कारण रणनीति अपेक्षित परिणाम नहीं दे सकी। इसका नुकसान भाजपा को एमएलसी चुनावों में कुछ सीटों पर हार के रूप में उठाना पड़ा।
इन नतीजों के बाद वाराणसी, लखनऊ और नागपुर जैसी हाईप्रोफाइल सीटों पर संगठन की रणनीति और प्रत्याशी चयन को लेकर पार्टी के भीतर सवाल उठने लगे हैं। राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, केवल इन सीटों पर हार ही नहीं, बल्कि अन्य सीटों पर जीत का अंतर भी संगठन के लिए चिंता का विषय है। कुछ सीटों पर भाजपा के ही लोगों की कथित भीतरघात, दावेदारों और अन्य जिम्मेदार पदाधिकारियों की ओर से सही तरीके से वोट नहीं बनवाना, प्रत्याशी चयन पर उठे सवाल और संगठन की चुनावी रणनीति के क्रियान्वयन में कमी जैसे पहलू चर्चा में हैं। आरोप यह भी हैं कि पार्टी के कुछ अपने ही लोगों ने चुनाव के दौरान रणनीति को नुकसान पहुंचाया।
इस पूरे घटनाक्रम के बीच उत्तर प्रदेश में वर्ष 2027 के विधानसभा चुनावों की तैयारियां भी महत्वपूर्ण हो गई हैं। भाजपा का केंद्रीय और प्रदेश नेतृत्व चुनावी रणनीति को प्रभावी बनाने के लिए लगातार छोटी-बड़ी बैठकें करता रहा है। इनमें केंद्रीय और प्रदेश स्तर के नेताओं से लेकर मंडल स्तर के पदाधिकारी और कार्यकर्ता तक समय-समय पर शामिल होते हैं। इन बैठकों में चुनावी मैदान के लिए विस्तृत रणनीति तैयार की जाती है।
हालांकि, सूत्रों के अनुसार पार्टी के भीतर एक बड़ा धड़ा ऐसा भी तैयार हो गया है, जो बैठकों में संगठनात्मक एकजुटता की बात करने के बाद अपनी गुटबाजी और व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं के चलते संगठन सर्वोपरि की भावना से दूर हो जाता है। आरोप हैं कि ऐसे नेता और कार्यकर्ता चुनावी रणनीति को कमजोर करने वाली गतिविधियों में जुट जाते हैं। हाल ही में संपन्न उत्तर प्रदेश की 11 एमएलसी सीटों के चुनावों को इसका ताजा उदाहरण माना जा रहा है।
इन 11 सीटों में भाजपा ने छह और समाजवादी पार्टी ने पांच सीटों पर जीत दर्ज की। हालांकि, भाजपा के लिए चिंता केवल सीटों पर मिली हार नहीं, बल्कि कुछ सीटों पर बेहद कम अंतर से मिली जीत भी है। चुनाव परिणामों में दस सीटों पर मौजूदा एमएलसी दोबारा निर्वाचित हुए। केवल लखनऊ स्नातक सीट पर बड़ा उलटफेर देखने को मिला, जहां भाजपा के मौजूदा एमएलसी अवनीश कुमार सिंह को समाजवादी पार्टी की कांति सिंह ने पराजित कर दिया।
वर्ष 2020 में इन्हीं 11 सीटों पर हुए चुनाव में भाजपा ने छह, समाजवादी पार्टी ने तीन और निर्दलीय उम्मीदवारों ने दो सीटों पर जीत हासिल की थी। इस बार भाजपा की सीटों की संख्या छह पर ही बनी रही, जबकि समाजवादी पार्टी ने अपनी सीटें तीन से बढ़ाकर पांच कर लीं। इस तरह परिणामों में भाजपा की सीटें स्थिर रहने के बावजूद सपा की बढ़त ने उत्तर प्रदेश की राजनीतिक स्थिति में बदलाव के संकेत दिए हैं।
एमएलसी चुनावों के ये नतीजे भाजपा के भीतर आंतरिक गुटबाजी और आगामी विधानसभा चुनावों में कड़ी चुनौती की आशंका को भी सामने ला रहे हैं। वर्ष 2027 में लगातार तीसरी बार सत्ता हासिल करने की तैयारी कर रही भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व के लिए यह आत्ममंथन का विषय बन गया है।
योगी सरकार के पास चुनावी मैदान में कानून-व्यवस्था सहित अपने कार्यों को जनता के सामने रखने के कई आधार हैं। लेकिन संगठन के भीतर आपसी खींचतान, गुटबाजी और कुछ नेताओं की महत्वाकांक्षाएं इन उपलब्धियों पर भारी न पड़ें, इसके लिए केंद्रीय नेतृत्व को समय रहते ठोस और प्रभावी कदम उठाने होंगे। एमएलसी चुनावों के नतीजों ने स्पष्ट कर दिया है कि आगामी विधानसभा चुनावों की राह में संगठनात्मक एकजुटता और चुनावी रणनीति का प्रभावी क्रियान्वयन भाजपा के लिए अहम रहने वाला है।