तस्वीर में मुंबई के मंच पर पर्युषण पर्व के दौरान जैन साध्वियां बैठी और संबोधित करती हुई।

मुंबई। वाणी संयम के महासाधक आचार्य महाश्रमण की विदुषी सुशिष्या साध्वी निर्वाणश्री के पावन सान्निध्य में वाणी संयम दिवस के अवसर पर विशेष उपक्रम आयोजित किए गए। पर्युषण पर्वाराधना में संभागी श्रावक समाज को संबोधित करते हुए साध्वी निर्वाणश्री ने वाणी संयम को शक्ति का स्रोत बताया।

साध्वी निर्वाणश्री ने कहा कि शुभ समय और शुभ घड़ी में माता देवानंदा ने चौदह स्वप्न देखे। ये महास्वप्न किसी महामानव के अवतरण के द्योतक थे। शुभ स्वप्न दर्शन से जीवन में विशेष प्रसन्नता मिलती है। उन्होंने बताया कि ये विलक्षण स्वप्न 24वें तीर्थंकर के अवतरण के संकेत थे। यह बात ऋषभदत्त ने अपनी पत्नी से कही। किंतु सौधर्मेन्द्र ने देव द्वारा गर्भ परिवर्तन करवा दिया। इसके बाद त्रिशला रानी ने भी वही स्वप्न देखे। राजा सिद्धार्थ के आंगन में जगत पूज्य महावीर का अवतरण 2600 वर्ष पूर्व की विलक्षण घटना थी।


साध्वी डा. योगक्षेमप्रभाज ने अपने प्रेरक वक्तव्य में भगवान अरिष्टनेमि के आठ पूर्व भवों की रोचक घटनाओं का विवेचन करते हुए मैत्री भाव के विकास की प्रेरणा दी। उन्होंने कहा कि मैत्री और शत्रुता के बीज सर्वत्र बिखरे पड़े हैं। यह हमारे दृष्टिकोण पर निर्भर है कि हम किसे पोषण दें और किसे उखाड़कर फेंक दें। मैत्री का महापर्व मैत्री का संवाहक है। उन्होंने प्राणी मात्र के प्रति मैत्रीभाव विकसित करने का आह्वान किया।

साध्वी मधुरप्रभा ने वाणी संयम के महत्त्व को प्रतिपादित करते हुए ‘मौन क्यों आवश्यक है’ विषय पर उद्गार व्यक्त किए। साध्वी लावण्यप्रभा ने ‘वाणी संयम’ पर मधुर गीतों की प्रस्तुति देकर सभी का मन मोह लिया।

कार्यक्रम का शुभारंभ नमस्कार महामंत्र के उच्चारण और ध्यान-प्रयोग से हुआ। काजूपाडा ते. महिला मंडल की बहनों ने मंगलाचरण किया। मंच संचालन मैत्री पायल मांडोत ने किया।

कार्यक्रम से पूर्व फादर डा. माइकल रोजारियो ने अपने विद्यार्थी वर्ग के साथ साध्वी से जैन दर्शन पर मार्गदर्शन लिया। अणुव्रत समिति से राजकुमार चपलोत ने उनका परिचय दिया। तेरापंथी सभा, चेम्बूर की ओर से उन सभी को साहित्य उपहार किया गया। मुख्य प्रवचन कार्यक्रम में संगीता चंडकोत हेंडोरे ने साध्वी के प्रवचन श्रवण का लाभ लिया।

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