नाशिक: एम्बुलेंस न मिलने पर मृत नवजात को बाइक से ले गए परिजन
त्र्यंबकेश्वर के दंपती को नाशिक जिला अस्पताल से शववाहिका नहीं मिली, जननी शिशु सुरक्षा योजना के क्रियान्वयन पर उठे सवाल।
तस्वीर में बाइक पर बैठा पुरुष और पीछे महिला पीले कपड़े में नवजात को पकड़े दिख रही है।
त्र्यंबकेश्वर तालुका में स्वास्थ्य व्यवस्था को लेकर गंभीर सवाल खड़े करने वाला मामला सामने आया है। टाके देवगांव के आदिवासी दंपती को नवजात बच्चे की मौत के बाद उसका शव घर ले जाने के लिए शववाहिका उपलब्ध नहीं हुई। इसके बाद माता-पिता को अपने मृत नवजात को दुचाकी पर लेकर करीब 60 किलोमीटर का सफर तय करना पड़ा।
नवजात बच्चे की मौत के बाद शव को दुचाकी पर ले जाते दंपती का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है। बच्चे को खोने के बाद परिवार को उसके अंतिम सफर के लिए भी सरकारी व्यवस्था का सहारा नहीं मिल पाने की घटना ने दुर्गम और आदिवासी क्षेत्रों में स्वास्थ्य सुविधाओं तथा सरकारी तंत्र की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
त्र्यंबकेश्वर तालुका के टाके देवगांव निवासी संगीता राहुल मेंगळ को प्रसव के लिए नाशिक जिला अस्पताल में भर्ती कराया गया था। शुक्रवार तड़के करीब दो बजे उन्होंने बच्चे को जन्म दिया। हालांकि, उपचार के दौरान शनिवार सुबह नवजात बच्चे की मौत हो गई।
बच्चे की मौत के बाद माता-पिता ने शव को घर ले जाने के लिए अस्पताल से शववाहिका उपलब्ध कराने की मांग की थी। बताया जा रहा है कि वाहन उपलब्ध नहीं होने के कारण आखिरकार दंपती को अपने ही दोपहिया वाहन से मृत नवजात को घर ले जाना पड़ा।
नवजात के शव को लेकर दंपती ने कुछ किलोमीटर नहीं, बल्कि करीब 60 किलोमीटर की दूरी तय की। जन्म के कुछ ही घंटों बाद बच्चे की मौत से परिवार पहले ही सदमे में था। इसके बाद मृत बच्चे को दुचाकी से घर ले जाने की मजबूरी ने स्थिति को और गंभीर बना दिया।
सरकार के जननी शिशु सुरक्षा कार्यक्रम के तहत बीमार बच्चों को सरकारी अस्पतालों में मुफ्त उपचार के साथ अस्पताल आने-जाने के लिए मुफ्त परिवहन सुविधा देने का प्रावधान है। बच्चे की मृत्यु होने पर उसके शव को सम्मानपूर्वक घर पहुंचाने के लिए भी सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था की ओर से आवश्यक परिवहन सुविधा उपलब्ध कराना अपेक्षित है।
टाके देवगांव की इस घटना ने इन सुविधाओं के वास्तविक क्रियान्वयन पर सवाल खड़ा कर दिया है। खासकर दुर्गम और आदिवासी क्षेत्रों में आपात स्थिति के दौरान सरकारी परिवहन सुविधा कितनी प्रभावी है, इसे लेकर सवाल उठ रहे हैं।
जन्म के कुछ ही घंटों बाद बच्चे की मौत से मां को भी गहरा मानसिक आघात लगा। मृत बच्चे को दुचाकी से घर ले जाने की स्थिति का भी उसकी मानसिक अवस्था पर असर पड़ने की बात सामने आई है। मानसिक आघात के कारण मां को अस्पताल में भर्ती किए जाने की जानकारी है।
नाशिक जिला सरकारी अस्पताल में इससे पहले भी इसी तरह की घटना सामने आ चुकी है। जून 2025 में नवजात बच्चे की मौत के बाद एंबुलेंस उपलब्ध नहीं होने पर माता-पिता ने शव को एक थैले में रखकर महामंडल की बस से करीब 90 किलोमीटर का सफर किया था।
उस घटना के बाद स्वास्थ्य विभाग ने जांच के आदेश दिए थे और अस्पताल में 24 घंटे मुफ्त एंबुलेंस उपलब्ध कराने के निर्देश दिए थे। लेकिन करीब एक साल बाद फिर इसी तरह की घटना सामने आने से उन निर्देशों के क्रियान्वयन पर सवाल उठ रहे हैं।
सरकार की ओर से दुर्गम और आदिवासी क्षेत्रों के नागरिकों को आसानी से स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध कराने का दावा किया जाता है। ऐसे में आपात स्थिति में रुग्णवाहिका जैसी बुनियादी सुविधा उपलब्ध नहीं होने पर सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन को लेकर सवाल उठना स्वाभाविक है।
21वीं सदी में किसी आदिवासी परिवार को नवजात बच्चे का शव दुचाकी पर रखकर घर ले जाने की मजबूरी केवल एक परिवार की त्रासदी नहीं, बल्कि स्वास्थ्य व्यवस्था के सामने खड़ा गंभीर सवाल है। इस मामले की जांच कर दोषियों पर कार्रवाई करने और दुर्गम क्षेत्रों के मरीजों तथा उनके परिजनों को आपातकालीन परिवहन सुविधा तत्काल उपलब्ध कराने की मांग जोर पकड़ रही है।