बॉम्बे हाईकोर्ट: बायकुला की जर्जर इस्सा बिल्डिंग के पुनर्विकास का रास्ता साफ
हाईकोर्ट ने MHADA के बेदखली नोटिस के खिलाफ याचिकाएं खारिज कर कहा कि कुछ कब्जाधारी बहुसंख्यक समर्थित प्रोजेक्ट को नहीं रोक सकते।
तस्वीर में मुंबई स्थित बॉम्बे हाईकोर्ट की ऐतिहासिक इमारत और आसपास का परिसर दिख रहा है।
मुंबई, 7 अक्टूबर 2026: बॉम्बे हाईकोर्ट ने बायकुला की जर्जर इस्सा बिल्डिंग के पुनर्विकास का रास्ता साफ करते हुए कहा कि कुछ असहमत कब्जाधारियों को बहुसंख्यक किरायेदारों के समर्थन वाले आवासीय प्रोजेक्ट को रोकने की अनुमति नहीं दी जा सकती, खासकर तब जब इमारत जीवन और सुरक्षा के लिए खतरा पैदा कर रही हो।
न्यायमूर्ति सुमन श्याम और न्यायमूर्ति गौतम अंखड़ की पीठ ने महाराष्ट्र हाउसिंग एंड एरिया डेवलपमेंट अथॉरिटी (MHADA) की ओर से MHADA अधिनियम की धारा 95A के तहत जारी बेदखली नोटिस को चुनौती देने वाले कुछ कब्जाधारियों की याचिकाएं खारिज कर दीं। यह प्रावधान पुनर्विकास योजनाओं में बाधा डालने वाले कब्जाधारियों को संक्षिप्त प्रक्रिया के तहत बेदखल करने की अनुमति देता है।
मदनपुरा स्थित 83 इकाइयों वाली इस्सा बिल्डिंग में 63 आवासीय और 20 व्यावसायिक परिसर हैं। इमारत को जर्जर घोषित किया गया था और भूमि मालिक पुडीनावाला मोहम्मद रफीक तथा जैनुल अबेदीन पुडीनावाला की ओर से DCPR 2034 के विनियमन 33(7) के तहत इसके पुनर्विकास का प्रस्ताव रखा गया था।
83 कब्जाधारियों में से 57 ने स्थायी वैकल्पिक आवास समझौते (Permanent Alternate Accommodation Agreements-PAAAs) किए थे और अपना कब्जा सौंप दिया था। शेष कब्जाधारियों में याचिकाकर्ता जावेद अब्दुल राशिद अंसारी भी शामिल थे। उन्होंने MHADA के कार्यकारी अभियंता की ओर से 12 अगस्त 2026 को जारी बेदखली नोटिस को चुनौती दी थी। याचिकाकर्ताओं ने अधिकारी के अधिकार पर सवाल उठाने के साथ आरोप लगाया था कि डेवलपर ने कॉर्पस फंड और किराया समझौतों से जुड़ी शर्तों का पालन नहीं किया।
MHADA की ओर से पेश महाधिवक्ता मिलिंद साठे ने कार्रवाई का बचाव करते हुए कहा कि धारा 95A का उद्देश्य ही व्यक्तिगत कब्जाधारियों को पुनर्विकास में देरी करने से रोकना है। उन्होंने कहा कि कार्यकारी अभियंता ने MHADA बोर्ड के मुख्य अधिकारी से विधिवत प्राधिकरण प्राप्त करने के बाद कार्रवाई की थी।
डेवलपर्स की ओर से पेश अधिवक्ता कार्ल टैम्बोली ने इमारत की स्थिति और बहुसंख्यक कब्जाधारियों के हितों को अदालत के सामने रखा। उन्होंने कहा, “इमारत खतरनाक रूप से जर्जर है और लगातार जीवन के लिए जोखिम पैदा कर रही है।” उन्होंने यह भी कहा कि केवल कुछ कब्जाधारी ही परियोजना को रोक रहे हैं।
पीठ ने कहा कि धारा 95A आवासीय योजनाओं में तेजी लाने के लिए संक्षिप्त प्रक्रिया उपलब्ध कराती है और इसे पूर्ण दीवानी मुकदमे में परिवर्तित नहीं किया जा सकता। अदालत ने यह भी नोट किया कि याचिकाकर्ताओं द्वारा इन्हें स्वीकार करने से इनकार करने के बाद डेवलपर ने किराया और कॉर्पस फंड MHADA के पास जमा कर दिए थे।
MHADA की ओर से दी गई इस आश्वस्ति को स्वीकार करते हुए कि सभी शर्तों को सख्ती से लागू किया जाएगा, पीठ ने याचिकाएं खारिज कर दीं। इसके साथ ही अदालत ने बायकुला की इस्सा बिल्डिंग के पुनर्विकास को आगे बढ़ाने का रास्ता साफ कर दिया।