महाराष्ट्र में चुनावी व्यवस्था को अधिक पारदर्शी, जवाबदेह और समावेशी बनाने की मांग तेज हो गई है। महाराष्ट्र OBC युवा आघाडी की अध्यक्षा प्रतिक्षा तारासिंग चव्हाण ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी एवं महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री को विस्तृत ज्ञापन सौंपकर चुनावी प्रक्रिया में व्यापक और संरचनात्मक सुधार लागू करने की मांग उठाई है। ज्ञापन में जनप्रतिनिधियों के कार्यकाल की सीमा निर्धारित करने से लेकर उम्मीदवारों के योग्यता आधारित चयन, चुनाव प्रचार खर्च पर नियंत्रण और राजनीतिक दलों की जवाबदेही तय करने तक 13 महत्वपूर्ण प्रस्ताव रखे गए हैं।

चव्हाण ने ज्ञापन में कहा है कि राजनीति केवल आर्थिक रूप से सक्षम व्यक्तियों, राजनीतिक विरासत वाले परिवारों अथवा लंबे समय तक सत्ता में रहने वाले नेताओं तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। सामान्य परिवारों के प्रतिभाशाली युवक-युवतियों, महिलाओं, सामाजिक कार्यकर्ताओं, विशेषज्ञों और जमीनी स्तर पर जनसमस्याओं के समाधान के लिए काम करने वाले लोगों को भी विधायक, सांसद, मुख्यमंत्री, प्रधानमंत्री तथा स्थानीय स्वशासन संस्थाओं के महत्वपूर्ण पदों पर कार्य करने का समान अवसर मिलना चाहिए।

ज्ञापन में सबसे प्रमुख मांग जनप्रतिनिधियों के कार्यकाल की सीमा निर्धारित करने की है। इसके तहत विधायकों और सांसदों को अधिकतम दो बार निर्वाचित होने की सीमा तय करने के प्रस्ताव पर विचार करने की मांग की गई है। मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री पद पर किसी व्यक्ति को केवल एक बार अवसर देने के प्रस्ताव का संवैधानिक एवं कानूनी अध्ययन कराने की बात भी कही गई है। इसी तरह महापौर, नगराध्यक्ष, जिला परिषद अध्यक्ष और सरपंच जैसे पदों के लिए भी कार्यकाल की सीमा निर्धारित करने की व्यवस्था बनाने का प्रस्ताव रखा गया है।

उम्मीदवारों के चयन में पारदर्शिता और योग्यता को प्राथमिकता देने के लिए राजनीतिक दलों में टिकट वितरण से पहले अनिवार्य साक्षात्कार, लिखित परीक्षा अथवा क्षमता मूल्यांकन की व्यवस्था लागू करने की मांग की गई है। इसमें उम्मीदवारों की समस्या विश्लेषण क्षमता, नीति निर्माण, आर्थिक नियोजन, प्रशासनिक दक्षता, विकास योजनाओं और उनके क्रियान्वयन की क्षमता का परीक्षण शामिल करने का प्रस्ताव है।

चुनाव प्रचार में आर्थिक असमानता को कम करने के लिए डिजिटल प्रचार, चुनावी खर्च का ऑडिट और पारदर्शी वित्तीय रिकॉर्ड अनिवार्य करने की मांग भी ज्ञापन में शामिल है। इसका उद्देश्य सामान्य और आर्थिक रूप से कमजोर पृष्ठभूमि के योग्य उम्मीदवारों को भी चुनाव लड़ने के दौरान समान अवसर उपलब्ध कराना है। इसके साथ ही प्रत्येक पात्र उम्मीदवार को समान समय, समान अवसर और समान नियमों के तहत अपनी नीतियां एवं विकास योजनाएं मतदाताओं के सामने रखने के लिए सार्वजनिक मीडिया मंच उपलब्ध कराने की मांग की गई है। पेड न्यूज, छिपे हुए विज्ञापनों और अनधिकृत आर्थिक लेन-देन पर नियंत्रण रखने का प्रस्ताव भी रखा गया है।

चुनावी राजनीति में जाति, धर्म और उपनाम के आधार पर होने वाले ध्रुवीकरण को कम करने पर भी जोर दिया गया है। ज्ञापन के अनुसार चुनाव प्रचार में शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, महिला सुरक्षा, किसान, मजदूर, बुनियादी सुविधाएं, भ्रष्टाचार नियंत्रण और स्थानीय विकास जैसे मुद्दों को प्राथमिकता मिलनी चाहिए। इसके लिए मौजूदा चुनावी कानूनों का प्रभावी क्रियान्वयन सुनिश्चित करने की मांग की गई है।

युवाओं और महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी बढ़ाने के लिए राजनीतिक दलों को नेतृत्व प्रशिक्षण, नीति निर्माण, बजट और प्रशासन संबंधी प्रशिक्षण कार्यक्रम संचालित करने का प्रस्ताव दिया गया है। नए युवाओं, महिलाओं और पहली बार निर्वाचित जनप्रतिनिधियों से संबंधित जानकारी वार्षिक रिपोर्ट के माध्यम से सार्वजनिक करने की मांग भी की गई है।

नए नेतृत्व को तैयार करने के साथ अनुभवी नेताओं के राजनीतिक और प्रशासनिक अनुभव का लाभ उपलब्ध कराने पर भी जोर दिया गया है। इसके लिए प्रत्येक राजनीतिक दल में स्वतंत्र मार्गदर्शन समिति स्थापित करने का प्रस्ताव है। यह समिति नए उम्मीदवारों को संविधान, प्रशासन, नीति निर्माण, बजट और जनसमस्याओं के समाधान से संबंधित मार्गदर्शन प्रदान करेगी।

राजनीतिक आरक्षण और सामाजिक प्रतिनिधित्व के संबंध में अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, महिलाओं तथा कानून के अनुसार आरक्षण लागू अन्य वर्गों का प्रतिनिधित्व संवैधानिक प्रावधानों के अनुरूप सुनिश्चित करने की मांग की गई है। आरक्षण के क्रियान्वयन की वार्षिक समीक्षा सार्वजनिक करने का प्रस्ताव भी इसमें शामिल है।

राजनीतिक दलों की आर्थिक और प्रशासनिक पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए उनकी आय, खर्च, चंदे, आंतरिक चुनाव, पदाधिकारियों के चयन और उम्मीदवारों के टिकट वितरण से संबंधित पारदर्शी नियम बनाने की मांग की गई है। साथ ही जवाबदेही तय करने के लिए प्रभावी व्यवस्था विकसित करने पर जोर दिया गया है।

ज्ञापन में भ्रष्टाचार, चुनावी अनियमितताओं, मतदाताओं को प्रलोभन देने, अवैध धन के इस्तेमाल और अन्य गंभीर कानूनी उल्लंघनों के सिद्ध होने पर संबंधित व्यक्तियों के साथ राजनीतिक दल की संस्थागत जिम्मेदारी निर्धारित करने की मांग भी उठाई गई है। हालांकि, ऐसी कार्रवाई उचित जांच, साक्ष्य और कानूनी प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही किए जाने का प्रस्ताव है।

राजनीतिक दलों की कार्यप्रणाली को संविधान में निहित न्याय, स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व के मूल्यों के अनुरूप बनाने पर भी जोर दिया गया है। जातीय या धार्मिक घृणा फैलाने तथा नागरिकों के बीच वैमनस्य पैदा करने वाली सिद्ध गतिविधियों पर कानून के अनुसार कार्रवाई करने की मांग की गई है।

चुनावी व्यवस्था में सुधारों के लिए एक स्वतंत्र राष्ट्रीय चुनाव सुधार समिति गठित करने का प्रस्ताव भी ज्ञापन का हिस्सा है। इसमें चुनाव आयोग, संविधान विशेषज्ञों, कानून विशेषज्ञों, प्रशासनिक विशेषज्ञों, अर्थशास्त्रियों, युवा प्रतिनिधियों, महिला प्रतिनिधियों और नागरिक समाज के विशेषज्ञों को शामिल करने की मांग की गई है। समिति को वर्तमान चुनाव प्रणाली का अध्ययन कर आवश्यक कानूनों एवं संवैधानिक संशोधनों के प्रस्ताव तैयार करने तथा उनके क्रियान्वयन की समयबद्ध योजना प्रस्तुत करने की जिम्मेदारी देने का सुझाव दिया गया है।

इसके अलावा केंद्र एवं राज्य सरकार से इन सभी मांगों पर गंभीरता से विचार कर राष्ट्रीय और राज्यस्तरीय विशेषज्ञ समितियों का गठन करने की अपील की गई है। आवश्यक कानूनी एवं प्रशासनिक सुधारों की समीक्षा के साथ उन पर की गई कार्रवाई की लिखित रिपोर्ट और आगामी कार्ययोजना सार्वजनिक करने की मांग भी रखी गई है।

चव्हाण ने ज्ञापन में स्पष्ट किया है कि सत्ता परिवर्तन का अर्थ केवल एक राजनीतिक दल की जगह दूसरे दल का सत्ता में आना नहीं है, बल्कि शासन व्यवस्था में नए विचार, नई नीतियां, नई कार्यप्रणाली और बेहतर परिणामों का निर्माण होना चाहिए। लोकतंत्र में अनुभवी नेतृत्व का योगदान महत्वपूर्ण है, लेकिन नए नेतृत्व के लिए अवसर पैदा करना भी उतना ही आवश्यक है।

उन्होंने कहा, “राजनीति जनसेवा का माध्यम होनी चाहिए, स्थायी सत्ता का साधन नहीं। सामान्य परिवारों के युवक-युवतियों को भी देश का नेतृत्व करने का सपना देखने का अवसर मिलना चाहिए और उस सपने को साकार करने के लिए उन्हें समान, पारदर्शी एवं न्यायसंगत अवसर मिलने चाहिए। राजनीतिक पद किसी का स्थायी अधिकार क्षेत्र नहीं, बल्कि जनता द्वारा सौंपी गई सार्वजनिक जिम्मेदारी है।”

यह ज्ञापन प्रधानमंत्री एवं महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री को प्रस्तुत किया गया है। इसकी प्रतिलिपि राष्ट्रपति, केंद्रीय कानून एवं न्याय मंत्री, भारत निर्वाचन आयोग, महाराष्ट्र राज्य निर्वाचन आयोग, मुख्य निर्वाचन अधिकारी तथा महाराष्ट्र के राज्यपाल को भी भेजी गई है।

चुनावी प्रक्रिया को अधिक न्यायसंगत बनाना, राजनीतिक परिवारवाद एवं आर्थिक असमानता के कारण पैदा होने वाली प्रवेश संबंधी बाधाओं को कम करना, योग्यता आधारित नेतृत्व विकसित करना और राजनीतिक दलों को कानूनी रूप से जवाबदेह बनाना इस ज्ञापन का मुख्य उद्देश्य है। इन 13 मांगों के माध्यम से प्रतिक्षा तारासिंग चव्हाण ने चुनावी व्यवस्था में व्यापक बदलाव और युवाओं, महिलाओं तथा नए नेतृत्व की भागीदारी बढ़ाने का मुद्दा उठाया है।

Tags: