सम्यग्दर्शन ही जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि, सही दृष्टि से खुलता आत्मकल्याण का मार्ग
कोटा में मुनि श्री योगसागर जी महाराज ने सम्यग्दर्शन को जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि बताते हुए आत्मकल्याण का मार्ग समझाया।
कोटा के श्री पुण्योदय अतिशय क्षेत्र नसियाजी में चातुर्मास के दौरान मुनि श्री योगसागर जी महाराज की धर्मसभा में धार्मिक अनुष्ठान संपन्न करते श्रद्धालु।
कोटा, 26 अगस्त। श्री पुण्योदय अतिशय क्षेत्र, नसियाजी, दादाबाड़ी में चातुर्मासरत ज्येष्ठ-श्रेष्ठ निर्यापक श्रमण मुनि श्री 108 योगसागर जी महाराज ने रत्नकरण्ड श्रावकाचार के 28वें श्लोक की व्याख्या करते हुए कहा कि मनुष्य जीवन की वास्तविक सार्थकता धन, वैभव, पद और प्रतिष्ठा अर्जित करने में नहीं, बल्कि सम्यग्दर्शन अर्थात सही दृष्टि के जागरण में है। उन्होंने कहा कि सम्यग्दर्शन ही आत्मकल्याण और मोक्षमार्ग की आधारभूमि है।
मुनिश्री ने कहा कि सम्यग्दर्शन वह दिव्य दृष्टि है, जिसके माध्यम से जीव वस्तु के वास्तविक स्वरूप को पहचानता है। आत्मा को आत्मा और पर-पदार्थ को पर-पदार्थ समझना सम्यक् दृष्टि की आधारभूमि है। जिस जीव की दृष्टि निर्मल हो जाती है, उसके लिए धर्म केवल पूजा-पाठ और धार्मिक क्रियाओं तक सीमित नहीं रहता, बल्कि उसके विचार, व्यवहार, आचरण और जीवनशैली में धर्म का प्रभाव दिखाई देने लगता है।
उन्होंने कहा कि अज्ञान के कारण मनुष्य अनित्य पदार्थों में नित्य सुख खोजता रहता है। धन, परिवार, शरीर, इच्छाओं, पद, मान और प्रतिष्ठा को अपना मानकर उनमें आसक्त हो जाता है। सम्यग्दर्शन इस भ्रम को दूर करता है और जीव को उसकी वास्तविक पहचान कराता है कि “मैं शुद्ध चेतन आत्मा हूं तथा आत्मा के अतिरिक्त समस्त पदार्थ पर हैं।” जब मनुष्य अपने वास्तविक स्वरूप को पहचानने लगता है, तब संसार के प्रति उसकी दृष्टि बदलने लगती है। बाहरी उपलब्धियों के प्रति आसक्ति कम होती है और आत्मा के गुणों की ओर उसका झुकाव बढ़ता है।
मुनिश्री ने समझाया कि सम्यग्दर्शन प्राप्त होने पर धर्म के प्रति श्रद्धा अंधविश्वास नहीं रहती, बल्कि तत्त्वों की यथार्थ श्रद्धा बन जाती है। देव, शास्त्र और गुरु के प्रति सच्ची श्रद्धा के साथ आत्मा, कर्म, पुण्य-पाप, आस्रव, बंध, संवर, निर्जरा और मोक्ष जैसे तत्त्वों की वास्तविकता को स्वीकार करना सम्यक् दृष्टि का महत्वपूर्ण लक्षण है। उन्होंने कहा कि धर्म को केवल परंपरा के रूप में स्वीकार करना पर्याप्त नहीं है। धर्म के वास्तविक स्वरूप को समझकर उसके प्रति दृढ़ श्रद्धा उत्पन्न होना ही सम्यग्दर्शन की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।
मुनि श्री योगसागर जी महाराज ने कहा कि सम्यग्दर्शन मोक्षमार्ग का प्रथम और अत्यंत महत्वपूर्ण चरण है। सही दृष्टि के बिना ज्ञान भी सही दिशा नहीं दे सकता और आचरण भी अपने वास्तविक लक्ष्य तक नहीं पहुंच सकता। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि जिस प्रकार अंधकार में मार्ग दिखाई नहीं देता, उसी प्रकार मिथ्यात्व के अंधकार में जीव आत्मकल्याण का मार्ग नहीं पहचान पाता। सम्यग्दर्शन उस अंधकार को दूर करने वाला प्रकाश है।
उन्होंने श्रद्धालुओं को प्रेरणा देते हुए कहा कि जीवन में सबसे पहले यह प्रयास होना चाहिए कि हमारी दृष्टि सही हो। दृष्टि सही होगी तो विचार सही होंगे, विचार सही होंगे तो व्यवहार सही होगा और व्यवहार की शुद्धता आत्मा को कर्मों की निर्जरा की ओर ले जाएगी। मुनिश्री ने कहा कि सम्यग्दर्शन केवल एक धार्मिक शब्द नहीं, बल्कि जीवन को देखने की सही कला है। जिसने अपने वास्तविक स्वरूप को पहचान लिया, उसके लिए संसार में रहते हुए भी संसार से ऊपर उठने का मार्ग प्रशस्त हो जाता है।
मुनिश्री ने कहा—“सम्यग्दर्शन मिला तो जीवन की दिशा बदल गई, मिथ्यात्व की रात गई, आत्मज्ञान की भोर हुई। दुनिया को जीतना बड़ी बात नहीं, अपने भीतर की गलत दृष्टि को जीतना ही सच्ची विजय है।” उन्होंने कहा कि जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि बाहरी संसार को जीतना नहीं, बल्कि अपनी दृष्टि को निर्मल करना और आत्मा के वास्तविक स्वरूप को पहचानना है। यही सम्यग्दर्शन आत्मकल्याण और मोक्षमार्ग की आधारभूमि बनता है।
आज के प्रमुख पुण्यार्जकों के संबंध में अध्यक्ष श्री जम्बू जैन सर्राफ ने बताया कि आज कलश स्थापना का पुण्यार्जन श्री संजय जी, श्रीमती बीना जी, अरिहंत, सिद्धिका एवं समस्त लुहाड़िया परिवार तथा श्री अशोक जी, श्रीमती इन्द्रा जी, श्री अर्पित जी एवं श्रीमती नमिता जी द्वारा श्रद्धाभावपूर्वक किया गया।
महामंत्री श्री महेन्द्र कासलीवाल ने बताया कि आज की शांतिधारा का पुण्यार्जन श्री राजेन्द्र जी, हुकम काका, प्रकाश हरसोरा परिवार तथा श्रीमती सुशीला जी एवं श्री विवेक जी ठोरा परिवार द्वारा श्रद्धाभावपूर्वक किया गया।
प्रशासनिक मंत्री श्रीमती अर्चना जैन सर्राफ, उपाध्यक्ष श्री सुमित जैन एवं श्री मनोज बगड़ा ने बताया कि श्रावक श्रेष्ठी, चित्र अनावरण, दीप प्रज्वलन एवं शास्त्र भेंट का पुण्यार्जन श्रीमती सुजाता पाटिल, श्रीमती गीता कोले एवं समस्त परिवार, महाराष्ट्र द्वारा श्रद्धाभावपूर्वक किया गया।
श्री धर्मचंद धनोप्या ने बताया कि भक्तामर विधान का पुण्यार्जन श्री पुण्योदय भक्तामर मंडल द्वारा श्रद्धाभावपूर्वक प्राप्त किया गया। श्री अर्पित एवं श्री सुनील माडिया ने बताया कि मुनिश्री योगसागर जी महाराज के आहारदान का सौभाग्य श्रीमान नरेन्द्र जी, रतन जी, सन्नी जी, नेहल जी बगड़ा परिवार को प्राप्त हुआ। श्री दर्शन बरमुंडा ने बताया कि मुनिश्री प्रणवसागर जी महाराज के आहारदान का सौभाग्य श्री सोहन लाल जी, श्री सुरेश जी, किराना वाले, छावनी परिवार को प्राप्त हुआ। मंगलाचरण का पुण्य अवसर श्रीमती मधु शाह द्वारा श्रद्धाभावपूर्वक सम्पन्न किया गया।
धर्मसभा के समापन पर श्रद्धालुओं ने श्रद्धापूर्वक आचार्य श्री की पूजन-अर्चना, अर्घ्य समर्पण एवं जिनवाणी वंदना कर धर्मलाभ अर्जित किया। गुरुवाणी के अमृत संदेश में कहा गया कि “धन-वैभव की उपलब्धि क्षणिक है, सम्यग्दर्शन की उपलब्धि आत्मा को शाश्वत दिशा देती है। दृष्टि निर्मल होगी तो विचार निर्मल होंगे, विचार निर्मल होंगे तो आचरण निर्मल होगा, और निर्मल आचरण ही आत्मकल्याण का मार्ग प्रशस्त करेगा।”