तस्वीर में कोटा के राजकीय महाविद्यालय में आयोजित कार्यशाला के दौरान मंच पर बैठे अतिथि और पोडियम पर बोलतीं वक्ता नजर आ रही हैं, जबकि सामने श्रोता बैठे हैं।

कोटा के राजकीय महाविद्यालय में भारतीय ज्ञान परंपरा, नवाचार एवं बौद्धिक संपदा अधिकार प्रकोष्ठ के तत्वावधान में ‘ज्ञान से नवाचार तक, भारतीय ज्ञान परंपरा एवं बौद्धिक संपदा अधिकार’ विषय पर एक दिवसीय कार्यशाला आयोजित की गई। कार्यशाला में युवाओं को नवाचार और उद्यमिता के माध्यम से रोजगार सृजित करने वाला बनने का आह्वान किया गया। मुख्य अतिथि कोटा विश्वविद्यालय के कुलगुरु प्रो. बी.पी. सारस्वत रहे, जबकि सहायक निदेशक प्रो. नवीन मित्तल विशिष्ट अतिथि के रूप में उपस्थित रहे। समाजसेवी भामाशाह जी.डी. पटेल एवं डॉ. के.के. कंजोलिया भी मंचासीन रहे।

मुख्य अतिथि कोटा विश्वविद्यालय के कुलगुरु प्रो. बी.पी. सारस्वत ने कहा कि ज्ञान की सार्थकता तभी है, जब उसका उपयोग नवाचार, कर्म और समाज के हित में हो। ऐसा ज्ञान ही वास्तविक अर्थों में सार्थक है, जो देश, समाज और मानवता के कल्याण में योगदान दे। उन्होंने भारतीय ज्ञान परंपरा की समृद्ध विरासत का उल्लेख करते हुए कहा कि योग हजारों वर्षों पुरानी भारतीय परंपरा है, जो आज वैश्विक स्तर पर मानव कल्याण का माध्यम बन चुका है।

प्रो. बी.पी. सारस्वत ने कहा कि भारतीय शिक्षा और संस्कृति की समृद्ध परंपरा को समझने तथा उसे नई पीढ़ी तक पहुंचाने की आवश्यकता है। आज देश को ऐसे युवाओं की जरूरत है, जो नवाचार और उद्यमिता के माध्यम से रोजगार सृजित करने वाले बनें। उन्होंने कहा कि तकनीकी एवं आर्थिक प्रगति के साथ चरित्र निर्माण भी वर्तमान समय की महत्वपूर्ण आवश्यकता है।

कार्यक्रम का शुभारंभ अतिथियों ने मां सरस्वती के समक्ष दीप प्रज्ज्वलित कर किया। राष्ट्रगीत एवं राष्ट्रगान के बाद अतिथियों का स्वागत किया गया। कार्यक्रम संयोजक प्रो. नीरजा श्रीवास्तव ने कार्यशाला की रूपरेखा प्रस्तुत करते हुए कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा, नवाचार और बौद्धिक संपदा अधिकार एक-दूसरे से गहराई से जुड़े हैं। प्राचार्य प्रो. प्रतिमा श्रीवास्तव ने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा का मूल उद्देश्य मानव कल्याण है।

आमंत्रित वक्ता पेटेंट अटॉर्नी विकास आसावत ने बौद्धिक संपदा अधिकारों के संरक्षण, पेटेंट प्रक्रिया, पेटेंट प्रबंधन, अधिकारों के प्रभावी उपयोग तथा कॉपीराइट कानून के विभिन्न पहलुओं की जानकारी दी। उन्होंने विद्यार्थियों और शिक्षकों को नवाचारों को सुरक्षित रखने के लिए आईपीआर के प्रति जागरूक रहने का आह्वान किया।

कार्यशाला में समाजसेवी भामाशाह जी.डी. पटेल एवं डॉ. के.के. कंजोलिया को महाविद्यालय के प्रति उनके सहयोग एवं योगदान के लिए प्राचार्य प्रो. प्रतिमा श्रीवास्तव एवं सहायक निदेशक प्रो. नवीन मित्तल ने प्रशस्ति पत्र प्रदान कर सम्मानित किया।

इस अवसर पर प्रो. नीरजा श्रीवास्तव एवं पेटेंट अटॉर्नी विकास आसावत द्वारा संकलित ‘पेटेंट मार्गदर्शिका’ पुस्तक का विमोचन भी किया गया। कार्यशाला में तकनीकी एवं अकादमिक सहयोग प्रो. सियाराम मीणा एवं डॉ. जितेन्द्र कुमार वर्मा ने दिया। मंच संचालन प्रो. अजरा अख्तर ने किया तथा आभार कार्यशाला संयोजक प्रो. नीलकमल राठौर ने व्यक्त किया। कार्यक्रम में महाविद्यालय के बड़ी संख्या में संकाय सदस्य एवं विद्यार्थी उपस्थित रहे। कार्यशाला ने भारतीय ज्ञान परंपरा, नवाचार और बौद्धिक संपदा अधिकारों के बीच संबंध तथा नवाचारों के संरक्षण के महत्व को रेखांकित किया।

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