तस्वीर में नसियाजी स्थित जिनालय में श्रावकजन जिनेन्द्र भगवान की मूर्ति पर शांतिधारा करते हुए नजर आ रहे हैं।

धन-वैभव और पद-प्रतिष्ठा से अधिक महत्वपूर्ण आत्मा की निर्मलता और धर्म की संपदा है। जीव जैसे कर्म करता है और जैसे भाव रखता है, वैसा ही उसका भविष्य निर्मित होता है। यह संदेश श्री पुण्योदय अतिशय क्षेत्र, नसियाजी, दादाबाड़ी में चातुर्मासरत ज्येष्ठ-श्रेष्ठ निर्यापक श्रमण मुनि श्री 108 योगसागर जी महाराज ने स्वाध्याय श्रृंखला के अंतर्गत आचार्य समन्तभद्र स्वामी विरचित रत्नकरण्ड श्रावकाचार ग्रंथ की व्याख्यानमाला में 29वें श्लोक की व्याख्या करते हुए दिया।

मुनिश्री ने धर्म और अधर्म के प्रभाव को जीव के आध्यात्मिक उत्थान-पतन से जोड़ते हुए कहा कि धर्म और अधर्म केवल पूजा-पाठ अथवा बाहरी धार्मिक क्रियाओं के नाम नहीं हैं, बल्कि जीव के भीतर उत्पन्न होने वाले शुभ-अशुभ भावों और परिणामों का स्वरूप हैं। धर्म के प्रभाव से जीव ऊंची गति और श्रेष्ठ अवस्था को प्राप्त कर सकता है, जबकि पाप एवं अधर्म के परिणाम उसे अधोगति की ओर ले जाते हैं।

मुनि श्री योगसागर जी महाराज ने श्लोक के भाव को स्पष्ट करते हुए कहा कि धर्म के प्रभाव से कुत्ता भी देव बन सकता है और पाप के प्रभाव से देव भी तिर्यंच गति को प्राप्त हो सकता है। इससे स्पष्ट है कि किसी जीव की वर्तमान स्थिति ही उसकी अंतिम पहचान नहीं है। उसके भाव और कर्म ही उसकी आगामी जीवन की दिशा निर्धारित करते हैं। धर्म के परिणामस्वरूप जीव को ऐसी अनिर्वचनीय आत्मिक सम्पदा प्राप्त हो सकती है, जिसकी तुलना संसार के धन, वैभव और भौतिक संपत्तियों से नहीं की जा सकती।

उन्होंने कहा कि मनुष्य को अपने वर्तमान पद, प्रतिष्ठा, धन और वैभव पर अहंकार नहीं करना चाहिए, क्योंकि संसार की सभी उपलब्धियां क्षणभंगुर एवं परिवर्तनशील हैं। आज जो व्यक्ति ऊंचाई पर है, वह अपने कर्मों के कारण वहां है। यदि उसके भाव और कर्म बदल गए तो उसकी स्थिति और गति भी बदल सकती है। न कोई जन्म से महान है और न कोई जन्म से छोटा; जीव की महानता उसके कर्मों और परिणामों से निर्धारित होती है। इसलिए बाहरी उपलब्धियों पर गर्व करने के बजाय मनुष्य को अपने भावों की निर्मलता और आत्मगुणों की वृद्धि पर ध्यान देना चाहिए।

मुनिश्री ने धर्म का वास्तविक स्वरूप बताते हुए कहा कि करुणा, संयम, क्षमा, सत्य, अहिंसा, सम्यग्दर्शन और वीतरागता की ओर बढ़ना ही धर्म की सार्थकता है। इसके विपरीत राग, द्वेष, क्रोध, मान, माया और लोभ जैसे भाव आत्मा को संसार के बंधनों में और अधिक जकड़ते हैं। उन्होंने श्रद्धालुओं से कहा कि यह विचार करना चाहिए कि “मेरे पास कितना धन है?” से अधिक महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि “मेरे भीतर कितना धर्म है?” धन बाहरी सम्पदा है, जबकि धर्म आत्मा की सच्ची सम्पदा है। बाहरी संपत्ति शरीर के साथ छूट जाती है, लेकिन धर्म से निर्मित संस्कार और कर्मों के परिणाम जीव के साथ आगे भी चलते हैं।

मुनिश्री ने प्रेरणा देते हुए कहा कि जीवन में धन कमाइए, लेकिन धन से पहले धर्म कमाइए। प्रतिष्ठा प्राप्त कीजिए, लेकिन प्रतिष्ठा से पहले पवित्र परिणाम प्राप्त कीजिए। संसार में ऊंचा पद प्राप्त करना बड़ी बात नहीं है; अपने भीतर की आत्मा को ऊंचा उठाना ही जीवन की वास्तविक सफलता है। धर्म को केवल मंदिर तक सीमित न रखते हुए उसे विचारों, वाणी, व्यवहार और आचरण में उतारना चाहिए। प्रत्येक क्षण अपने भावों को परखना चाहिए और ऐसा जीवन जीना चाहिए कि प्रत्येक विचार, प्रत्येक वचन और प्रत्येक कर्म आत्मकल्याण की दिशा में एक कदम बने।

उन्होंने कहा कि जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि बाहरी वैभव का विस्तार नहीं, बल्कि आत्मा की निर्मलता और शुभ परिणामों की वृद्धि है। इसलिए मनुष्य को अपने जीवन में यह प्रयास करना चाहिए कि उसके भीतर धर्म बढ़े, पापास्रव घटे और आत्मकल्याण की भावना निरंतर प्रबल होती जाए। धर्म जीवन को ऊंचाई देता है और अधर्म पतन की ओर ले जाता है। प्रत्येक क्षण अपने भावों की परीक्षा कर जीवन को धर्म, संयम एवं आत्मचिंतन से जोड़ना चाहिए।

इसी क्रम में 28 अगस्त 2026, शुक्रवार को रक्षाबंधन महापर्व “श्रमण संस्कृति रक्षक दिवस” के रूप में श्रद्धा एवं संकल्प के साथ मनाया जाएगा। इसी पावन दिवस पर पूज्य आचार्य विष्णुकुमार मुनिराज ने 700 मुनिराजों की रक्षा कर श्रमण संस्कृति की रक्षा का महान उपकार किया था। इस गौरवशाली प्रसंग की स्मृति में समाजजनों को अपनी श्रमण संस्कृति एवं तीर्थ क्षेत्रों के संरक्षण के प्रति जागरूक करने का संकल्प लिया जाएगा।

परम पूज्य निर्यापक श्रमण मुनि श्री योगसागर जी महाराज एवं मुनि श्री प्रणवसागर जी महाराज के पावन सान्निध्य, प्रेरणा एवं मार्गदर्शन में समाजबंधुओं को अकम्पनाचार्य आदि 700 मुनिराजों के प्रति श्रीफल के माध्यम से अर्घ्य समर्पित करने का सौभाग्य प्राप्त होगा।

रक्षाबंधन के अवसर पर मंदिरों में राखी के विशेष काउंटर लगाए जाएंगे। समाजबंधुओं से आग्रह किया गया है कि रक्षाबंधन के इस पावन अवसर पर मंदिरों में स्थापित राखी काउंटर से श्रमण संस्कृति एवं जिनालय संरक्षण की भावना से राखी प्राप्त करें। अध्यक्ष, मंत्री एवं समिति के पदाधिकारियों से मंदिरों में राखी के काउंटर की समुचित व्यवस्था सुनिश्चित करने का आग्रह किया गया है।

आज के प्रमुख पुण्यार्जकों के संबंध में अध्यक्ष श्री जम्बू जैन सर्राफ ने बताया कि कलश स्थापना का पुण्यार्जन श्री कैलाशचंद जी, श्रीमती विमला जी, डॉ. मनोज जी, श्रीमती नीतू जी, ऐश्वर्य एवं आर्जव जैन तथा समस्त बगड़ा परिवार, बसंत विहार द्वारा सुपुत्र आर्जव जैन के टेंपल डे के शुभ अवसर पर श्रद्धाभावपूर्वक किया गया।

महामंत्री श्री महेन्द्र कासलीवाल ने बताया कि आज की शांतिधारा का पुण्यार्जन श्री जम्बू जी, रोहित जी, खजूरी एवं श्री संजय जी, अक्षत जी, बाटा जी, बीना जी, रतन जी, सुलोचना जी, सेठिया परिवार तथा श्रीमती सुशीला जी एवं श्री विवेक जी ठोरा परिवार द्वारा श्रद्धाभावपूर्वक किया गया।

प्रशासनिक मंत्री श्रीमती अर्चना जैन सर्राफ एवं उपाध्यक्ष श्री सुमित जैन ने बताया कि श्रावक श्रेष्ठी, चित्र अनावरण, दीप प्रज्वलन एवं शास्त्र भेंट का पुण्यार्जन श्री कैलाशचंद जी बगड़ा परिवार द्वारा श्रद्धाभावपूर्वक किया गया।

श्री धर्मचंद धनोप्या ने बताया कि भक्तामर विधान का पुण्यार्जन श्री महावीर भारती मित्तल, श्री पवन जी, श्रीमती उषा जी एवं सेठिया परिवार द्वारा श्रद्धाभावपूर्वक प्राप्त किया गया। श्री अर्पित एवं श्री सुनील माडिया ने बताया कि मुनिश्री योगसागर जी महाराज के आहारदान का सौभाग्य बाल ब्रह्मचारिणी ज्योति दीदी के परिवार को प्राप्त हुआ। श्री दर्शन बरमुंडा ने बताया कि मुनिश्री प्रणवसागर जी महाराज के आहारदान का सौभाग्य उपवास के रूप में प्राप्त हुआ। मंगलाचरण का पुण्य अवसर आर्जव बगड़ा द्वारा श्रद्धाभावपूर्वक सम्पन्न किया गया।

धर्मसभा के समापन पर श्रद्धालुओं ने श्रद्धापूर्वक आचार्य श्री की पूजन-अर्चना, अर्घ्य समर्पण एवं जिनवाणी वंदना कर धर्मलाभ अर्जित किया। गुरुवाणी के अमृत संदेश में कहा गया कि संसार की सम्पत्ति शरीर के साथ छूट जाती है, लेकिन धर्म की सम्पदा आत्मा के साथ चलती है। धन कमाने के साथ धर्म को नहीं भूलना, वैभव पाने के साथ विनय को नहीं छोड़ना और संसार में ऊंचा उठने से पहले अपनी आत्मा को ऊंचा उठाना ही जीवन की वास्तविक दिशा है।

Tags: