स्वाधीनता संग्राम में संघ की भूमिका पर मुरलीधर का दावा, बोले- इतिहास धूमिल करने के प्रयास नहीं टिकेंगे
कोटा में स्वतंत्रता दिवस समारोह में प्रांत प्रचारक मुरलीधर ने स्वाधीनता संग्राम में संघ की भूमिका के प्रमाण गिनाए। डॉ. हेडगेवार से लेकर 1942 आंदोलन और विभाजन तक के प्रसंगों का उल्लेख करते हुए विकसित-अखंड भारत का आह्वान किया।
तस्वीर में कोटा के सूरज भवन, बल्लभबाड़ी में आयोजित स्वतंत्रता दिवस समारोह के दौरान वक्ता मुरलीधर उपस्थित जनसमूह को संबोधित करते हुए नजर आ रहे हैं।
कोटा, 15 अगस्त। स्वतंत्रता दिवस की 80वीं वर्षगांठ पर भारतीय जनकल्याण समिति, कोटा की ओर से सूरज भवन, बल्लभबाड़ी में भव्य समारोह आयोजित किया गया। कार्यक्रम की अध्यक्षता कोटा विभाग संघचालक पन्नालाल शर्मा ने की। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, चित्तौड़ प्रांत के प्रांत प्रचारक मुरलीधर ने कहा कि भारतीय इतिहास को धूमिल करने के प्रयास अब और नहीं टिकेंगे। उन्होंने स्वाधीनता संग्राम में संघ की भूमिका के अकाट्य प्रमाण प्रस्तुत किए।
मुख्य वक्ता मुरलीधर ने कहा कि भारत की आजादी बिना खड़ग-बिना ढाल से नहीं, बल्कि क्रांतिकारियों के बलिदान और जन-जन के संघर्षों का परिणाम है। इसमें राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक केशवराव हेडगेवार एवं तत्कालीन स्वयंसेवकों की टोली ने सक्रिय योगदान दिया। उन्होंने कहा कि जो लोग संघ पर आरोप लगाते हैं, उन्हें “संघ और स्वतंत्रता आंदोलन” नामक पुस्तक पढ़नी चाहिए।
मुरलीधर ने कहा कि डॉ. हेडगेवार ने 8 वर्ष की उम्र में ही रानी विक्टोरिया के राज्यारोहण की हीरक जयंती पर मिठाई को सबके सामने कूड़ेदान में फेंककर विदेशी दासता का प्रतिकार किया था। उन्होंने सवाल किया कि जो व्यक्ति अपने जीवन के शुरुआती दौर से ही विदेशी दासता का विरोध करता रहा, वह अपने शेष जीवन में स्वाधीनता संग्राम से दूर कैसे रह सकता था।
उन्होंने बताया कि 1907 में नीलसिटी हाई स्कूल से डॉ. हेडगेवार को इसलिए निष्कासित किया गया, क्योंकि उन्होंने रिस्ले सर्कुलर के विरोध में पूरे स्कूल को वन्देमातरम् और भारत माता की जय से गूंजायमान कर दिया था। कलकत्ता में क्रांतिकारियों की अनुशीलन समिति में भी उनकी सक्रिय भूमिका रही, जहां उन्हें “कोकेन” छद्म नाम दिया गया।
मुरलीधर ने बताया कि 1920 में कांग्रेस के नागपुर अधिवेशन में संयुक्त सचिव का पद निर्वहन करते हुए पूर्ण स्वराज्य का प्रस्ताव पारित करने का सर्वप्रथम आग्रह डॉ. हेडगेवार ने किया था, जिसे कांग्रेस के दूसरे नेताओं ने पारित नहीं किया। यही प्रस्ताव कांग्रेस ने 1929 के लाहौर अधिवेशन में पारित किया।
उन्होंने कहा कि 1925 में क्रांतिकारी राजगुरु ने डॉ. हेडगेवार को पुणे नहीं आने की सलाह दी। राजगुरु को पुणे आने पर गिरफ्तार किया गया और अंततः उन्हें फांसी दे दी गई। मुरलीधर ने कहा कि डॉ. हेडगेवार के स्वाधीनता संघर्ष में सक्रिय रहने का इससे बड़ा प्रमाण क्या हो सकता है कि 1930 में 11 माह की जेल काटकर रिहा होते समय मोतीलाल नेहरू, हाकिम अजमल खां और राजगोपालाचार्य जैसे वरिष्ठ कांग्रेसी नेता जेल के बाहर उन्हें लेने आए।
आजादी के लिए शहीद हुए कई स्वयंसेवकों का उल्लेख करते हुए मुरलीधर ने कहा कि 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में 7 लोग गोली से शहीद हुए, जिनमें से 2 लोग सक्रिय स्वयंसेवक थे। हेमू कालानी संघ के स्वयंसेवक थे, जिन्हें 1943 में मौत की सजा दी गई। 1947 में एक शाखा प्रमुख दादानाई को मौत की सजा मिली। एक शाखा प्रमुख रामदास की हत्या पुलिस की गोली से हुई। आंदोलनरत स्वयंसेवक बालाजी रामदास को अंग्रेज पुलिस ने गोली मारी।
मुरलीधर ने कहा कि विभाजन के समय हिंदुओं को पाकिस्तान से बचाकर भारत लाने की आंखों देखी बातें आज भी कोटा में वयोवृद्ध स्वयंसेवक लद्दाराम से सुनी जा सकती हैं। भारत विभाजन में हिंदुओं पर हुए भीषण अत्याचारों को नई पीढ़ी से नहीं छिपाया जा सकता। उन्होंने कहा कि देश की जनता ने स्वतंत्रता का क्या मूल्य चुकाया, इस पर व्यापक चर्चा की आवश्यकता है।
उन्होंने बताया कि 1947 में असंख्य कांग्रेस नेताओं को विस्थापन के पश्चात शरण देने वाले स्वयंसेवकों के नाम गिनाए जा सकते हैं, जिनका अरुणा आसफ अली जैसे कांग्रेस नेताओं ने सार्वजनिक रूप से आभार प्रकट किया। मुरलीधर ने आम नागरिकों से विकसित और अखंड भारत के लिए कर्तव्य निर्वहन करने का आग्रह किया।
समारोह में अखिल भारतीय सामाजिक सद्भाव कार्य के प्रमुख आ. बलिराम, विभाग संघचालक पन्नालाल, महानगर संघचालक गोपाल गर्ग, वयोवृद्ध प्रचारक राजेन्द्र द्विवेदी एवं कई गणमान्य लोगों ने भाग लिया।