कोटा: मुनि योगसागर महाराज ने बताया आत्मकल्याण और निर्जरा का मार्ग
नसियां जी में आयोजित धर्मसभा में मुनि श्री ने कषायों के क्षय, सल्लेखना और व्रतों के पालन से कर्म निर्जरा का महत्व समझाया।
तस्वीर में कोटा के नसियां जी में जैन मुनि के समक्ष वंदना करते श्रद्धालु।
कोटा, 05 अक्टूबर 2026। आश्विन कृष्ण दशमी के अवसर पर श्री पुण्योदय अतिशय क्षेत्र, नसियां जी, दादाबाड़ी में रत्नकरण्डक श्रावकाचार स्वाध्याय श्रृंखला के अंतर्गत धर्मसभा आयोजित हुई। ज्येष्ठ-श्रेष्ठ निर्यापक श्रमण मुनि श्री 108 योगसागर जी महाराज ने धर्मसभा को संबोधित करते हुए कहा कि व्रतों और प्रतिमाओं के माध्यम से अपने परिणामों को निरंतर धर्म की ओर संभालते हुए विशुद्ध किया जाए तो कर्मों की फल देने की शक्ति धीरे-धीरे कमजोर होने लगती है। साधक को नि:शंकित होकर दृढ़ता और शांति के साथ अपने परिणामों को निरंतर विशुद्धि की ओर ले जाना चाहिए। यही आत्मकल्याण की दिशा में आगे बढ़ने का मार्ग है।
कषायों का क्षय ही सल्लेखना की दिशा है। मुनि श्री ने कहा कि सल्लेखना का तात्पर्य कषायों को कमजोर करना है। जैसे-जैसे विषय-कषायों को कम किया जाता है, वैसे-वैसे आत्मा में निहित शक्ति प्रकट होने लगती है। विषयों में रस आना मिथ्यादृष्टि का लक्षण है, जबकि आत्मा में रस और आनंद की अनुभूति होना सम्यक्दृष्टि का लक्षण है।
उन्होंने कहा कि संसार एक नाटक के समान है और प्रत्येक व्यक्ति को इस ‘नाटक’ में अटकना नहीं, बल्कि अपनी भूमिका को समझते हुए उससे ऊपर उठने का पुरुषार्थ करना चाहिए। इसके लिए अपने व्रतों की मर्यादा दृढ़तापूर्वक निर्धारित कर उनका विवेक एवं नियमपूर्वक पालन करना आवश्यक है। व्रतों में अतिचार और अनाचार से बचते हुए उनका पालन करने से संचित कर्मों की निर्जरा का मार्ग प्रशस्त होता है।
मुनि श्री ने पारिवारिक संस्कारों की चर्चा करते हुए कहा कि परिवार में एक व्यक्ति भी त्याग और संयम का मार्ग अपनाता है तो उसके प्रभाव से परिवार के अन्य सदस्यों में भी त्याग एवं धर्म को अंगीकार करने की भावना जागृत होने लगती है। एक व्यक्ति का आत्मपरिवर्तन पूरे परिवार के आध्यात्मिक जीवन को प्रभावित कर सकता है।
उन्होंने कहा कि शरीर के प्रति ममत्व कम करके आत्मशक्ति को जागृत करना आवश्यक है। जिस प्रकार दूध को तपाने और विभिन्न प्रक्रियाओं से गुजारने पर उससे घी (नवनीत) प्राप्त होता है और वह दूध की अपेक्षा अधिक मूल्यवान एवं शक्तिशाली होता है, उसी प्रकार तप और साधना की प्रक्रिया से आत्मा में निहित शक्ति जागृत होती है। आत्मशक्ति का जागरण हुए बिना आत्मकल्याण के मार्ग पर आगे बढ़ना कठिन है।
मुनि श्री योगसागर जी महाराज ने रत्नकरण्डक श्रावकाचार स्वाध्याय श्रृंखला में श्लोक क्रमांक 64 का अर्थ समझाते हुए अणुव्रतों के आदर्श पात्रों का उल्लेख किया। उन्होंने बताया कि अणुव्रतों के पालन की परंपरा में विभिन्न श्रावकों ने अपने उत्कृष्ट आचरण से आदर्श प्रस्तुत किए हैं।
उन्होंने बताया कि अहिंसा में यमपाल चांडाल, अचौर्य में वारिषेण, सत्य में सेठ धनदेव, ब्रह्मचर्य में नीली सती तथा परिग्रह-परिमाण में जयकुमार, जो भरत चक्रवर्ती के सेनापति थे, अपने आदर्श आचरण के लिए प्रसिद्ध हुए।
मुनि श्री ने कहा कि ये आदर्श पात्र बताते हैं कि व्रत केवल बाहरी नियम नहीं, बल्कि आत्मा को भीतर से निर्मल बनाने का साधन हैं। जब साधक अपने परिणामों को विषयों और कषायों से हटाकर आत्मा की ओर मोड़ता है, तभी कर्मों की निर्जरा और आत्मिक शक्ति का विकास संभव होता है।
उन्होंने कहा कि आत्मशक्ति को जागृत करके ही मनुष्य आत्मकल्याण के मार्ग पर आगे बढ़ सकता है। इसलिए जीवन में व्रत, संयम, तप, त्याग और स्वाध्याय को अपनाते हुए अपने परिणामों को निरंतर विशुद्ध करते रहना चाहिए।
प्रशासनिक मंत्री श्रीमती अर्चना जैन सर्राफ ने बताया कि श्रावक श्रेष्ठी, चित्र अनावरण, दीप प्रज्वलन एवं शास्त्र भेंट का पुण्यार्जन श्रद्धालु परिवारों द्वारा भक्तिभावपूर्वक किया गया। श्रीमती चंदा जी, अक्षरा जी एवं समस्त जैन परिवार, छिंदवाड़ा द्वारा कलश स्थापना का पुण्यार्जन किया गया। वहीं दीपेश जी, पदमा जी एवं समस्त परिवार, आंवा वाले परिवार द्वारा भी धार्मिक अनुष्ठान में पुण्यार्जन किया गया।
श्री सुमित सेंकी एवं श्री मनोज बगड़ा ने बताया कि आज की शांतिधारा का पुण्यार्जन श्रीमान अनिल कुमार, आयुष कुमार एवं सम्यक ठोरा परिवार, झाताला, तथा श्रीमान विनोद कुमार, अनुपम एवं अभिषेक जैन, बासवाड़ा द्वारा भक्तिभावपूर्वक किया गया।
श्री धर्मचंद धनोप्या ने बताया कि भक्तामर विधान का पुण्यार्जन श्रीमान केवलचंद, विनोद, पवन, ललित एवं पारस सेठिया परिवार द्वारा श्रद्धाभावपूर्वक किया गया।
श्री सुनील माडिया ने बताया कि मुनि श्री योगसागर जी महाराज के आहारदान का पुण्यलाभ प्रकाश, महावीर, हरसोरा एवं समस्त परिवार, दादाबाड़ी, कोटा को प्राप्त हुआ। श्री दर्शन बरमुंडा ने बताया कि मुनि श्री प्रणवसागर जी महाराज के आहारदान का सौभाग्य कमलेश, अशोक एवं संदीप गोयल परिवार को प्राप्त हुआ।
इस अवसर पर मंगलाचरण का पुण्य अवसर भी श्रद्धाभावपूर्वक सम्पन्न हुआ। धर्मसभा के समापन पर श्रद्धालुओं ने आचार्य श्री की पूजन-अर्चना, अर्घ्य समर्पण एवं जिनवाणी वंदना कर धर्मलाभ अर्जित किया।
धर्मसभा में गुरुवाणी का संदेश रहा कि व्रत, नियम और संयम आत्मा पर बाहर से थोपी गई मर्यादाएं नहीं, बल्कि भीतर की निर्मलता का साधन हैं। अपने परिणामों को विषयों और कषायों से हटाकर आत्मा की ओर मोड़ने से कर्मों की निर्जरा का मार्ग प्रशस्त होता है। जैसे तप की प्रक्रिया से दूध में छिपा घी प्रकट होता है, वैसे ही तप, त्याग, संयम और स्वाध्याय से आत्मा में निहित शक्ति प्रकट होती है। व्रतों की मर्यादा दृढ़ता से निर्धारित कर अतिचार-अनाचार से बचना और निरंतर परिणामों की विशुद्धि करते हुए आत्मकल्याण की दिशा में आगे बढ़ना ही प्रवचन का प्रमुख संदेश रहा।