जमीनी भाजपाई क्या फर्श और झण्डा ही उठाते रहेंगे? टिकट में निष्ठा या धनबल का सवाल
झालरापाटन नगरपालिका चुनाव से पहले भाजपा में टिकट वितरण को लेकर जमीनी कार्यकर्ताओं के सवाल तेज हैं। निष्ठा, संघर्ष और संगठन के बजाय धनबल व प्रभाव को तरजीह मिलने की आशंका के बीच पुराने आरोप भी चर्चा में हैं।
झालरापाटन में नगरपालिका चुनाव की आहट के साथ ही राजनीतिक बिसात पर पुराने मोहरे फिर सजने लगे हैं। राजनीतिक हलकों में चर्चा अब केवल इस बात की नहीं है कि टिकट किसे मिलेगा, बल्कि सवाल यह भी उठ रहा है कि टिकट का पैमाना क्या होगा—निष्ठा, संघर्ष और संगठन के प्रति समर्पण या फिर पैसा, प्रभाव और अवसरवाद?
झालरापाटन में भाजपा की जमीन पर वर्षों से खड़े कार्यकर्ता अब सीधे सवाल उठा रहे हैं। उनका सवाल है कि क्या पार्टी के लिए दिन-रात पसीना बहाने वाला जमीनी कार्यकर्ता केवल चुनाव कार्यालय का फर्श संभालने, झण्डा उठाने और नारे लगाने के लिए ही रह जाएगा? बूथ संभालने, मतदाताओं को घर से निकालकर मतदान केंद्र तक पहुंचाने और पार्टी के लिए अपना समय व संसाधन लगाने वाले कार्यकर्ता की चुनाव के बाद राजनीतिक हैसियत क्या एक समोसे, एक गुलाब जामुन, चार-पांच चिप्स और एक कप चाय तक सीमित रह जाएगी?
कार्यकर्ताओं के बीच यह सवाल भी है कि चुनाव आते ही चाय और भोजन के पैकेट की व्यवस्था तो हो जाती है, लेकिन टिकट की बारी आने पर वर्षों की तपस्या अचानक ‘योग्यता’ की सूची से बाहर क्यों हो जाती है। सवाल किसी एक कार्यकर्ता तक सीमित नहीं है, बल्कि उस राजनीतिक संस्कृति पर है, जिसमें कार्यकर्ता विचारधारा का झण्डा उठाता है और अवसरवादी टिकट का झण्डा।
नगरपालिका चुनाव नजदीक आते ही राजनीतिक हलकों में उस टीम की सक्रियता को लेकर भी चर्चाएं तेज हैं, जिसके कुछ लोगों के कांग्रेस से भाजपा में आने के बाद संगठन के भीतर असहजता और सवाल खड़े हुए हैं। कार्यकर्ताओं का आरोप है कि जिन चेहरों ने पहले दूसरी राजनीतिक जमीन पर अपनी दुकान सजाई, वे अब कमल के सहारे सत्ता की सीढ़ी चढ़ने की कोशिश कर रहे हैं।
कार्यकर्ताओं का सवाल है कि जिसने वर्षों तक कमल की जड़ में पानी डाला, क्या उसकी जगह वह व्यक्ति लेगा जो चुनाव देखकर विचारधारा का रंग बदल लेता है? राजनीति में दल बदलना अपराध नहीं है, लेकिन सवाल तब पैदा होता है जब निष्ठावान कार्यकर्ता को दरकिनार कर अवसरवाद को पुरस्कार मिलने लगे।
नगरपालिका चुनाव भले ही छोटा हो, लेकिन कार्यकर्ता के लिए यह उसके राजनीतिक भविष्य का बड़ा दरवाजा है। सवाल यह है कि उस दरवाजे की चाबी संगठन के पास है या फिर आर्थिक ताकत रखने वालों के पास?
कार्यकर्ता का दर्द यह है कि वह वर्षों से पार्टी के साथ खड़ा है, लेकिन टिकट वितरण के समय उसकी मेहनत की कीमत कौन लगाएगा? क्या टिकट के लिए विचारधारा से ज्यादा जेब की गहराई देखी जाएगी? क्या संगठन से ज्यादा व्यक्तिगत प्रभाव मायने रखेगा? क्या वर्षों से पार्टी के साथ खड़ा कार्यकर्ता केवल पोस्टर लगाने और भीड़ जुटाने तक सीमित रहेगा?
स्थानीय राजनीतिक चर्चाओं में नगरपालिका से जुड़े पुराने मामलों को लेकर भी तरह-तरह के आरोप और सवाल उठाए जा रहे हैं। इनमें कथित फर्जी पट्टों, भूखंडों, निर्माण कार्यों, नंदीशाला से जुड़े खर्च, व्यापार सेवा समिति का चुनाव नहीं करवाकर लाखों रुपये व्यापारियों के हड़पने तथा सत्ता के प्रभाव से नियमविरुद्ध 53 पट्टे जारी करने जैसे आरोप शामिल हैं।
इन आरोपों की सत्यता का फैसला जांच और दस्तावेजों से होना है। दस्तावेज जनता के पास हैं, लेकिन राजनीतिक सवाल इससे बड़ा है। यदि किसी व्यक्ति पर गंभीर सार्वजनिक आरोप हैं तो क्या चुनावी टिकट देने से पहले पार्टी को उन आरोपों की निष्पक्ष जांच नहीं करानी चाहिए?
लालबाग से जुड़े मामले हों या कथित रूप से बड़ी संख्या में जारी किए गए पट्टों के सवाल—यदि दस्तावेज मौजूद हैं तो उनकी जांच होनी चाहिए और यदि आरोप निराधार हैं तो आरोप लगाने वालों को भी जवाब देना चाहिए। राजनीति में आरोप लगाना आसान है, लेकिन वापस टिकट देना उससे कहीं बड़ी जिम्मेदारी है।
सबसे बड़ा व्यंग्य यही है कि पार्टी के कार्यक्रम में जमीनी कार्यकर्ता दरी बिछाता है, कुर्सियां लगाता है, झण्डा लगाता है, नारे लगाता है और बूथ पर पसीना बहाता है। मंच तक पहुंचने का रास्ता किसी और के लिए खुल जाता है। चुनाव परिणाम आने के बाद वही कार्यकर्ता कहता है, “साहब, इस बार भी हमने पार्टी को जिताया है।” और पार्टी शायद मुस्कुराकर कहती है, “बहुत अच्छा किया, अगली बैठक में चाय जरूर पीजिएगा।” कार्यकर्ता के हिस्से में फिर वही चाय, वही समोसा और वही झण्डा रह जाता है।
अब सवाल भाजपा से नहीं, भाजपा के भीतर बैठे निर्णयकर्ताओं से है। जमीनी कार्यकर्ता पूछ रहा है कि अगर निकाय चुनाव में भी उसे अवसर नहीं मिलेगा तो फिर संगठनात्मक राजनीति में उसकी भूमिका क्या है? क्या वह केवल फर्श उठाएगा, झण्डा उठाएगा, नारा लगाएगा और वोट उठाएगा? या भीड़ का हिस्सा बनकर अवसरवादियों को नेता बनाएगा और टिकट कोई दूसरा उठाकर ले जाएगा?
नगरपालिका चुनाव में टिकट वितरण केवल प्रत्याशी तय करने की प्रक्रिया नहीं है। यह संदेश भी तय करता है कि पार्टी अपने कार्यकर्ताओं को क्या सम्मान देती है। यदि निष्ठा की जगह धनबल, संघर्ष की जगह प्रभाव और विचारधारा की जगह अवसरवाद को प्राथमिकता मिली तो सबसे बड़ा नुकसान किसी एक प्रत्याशी का नहीं, संगठन की आत्मा का होगा।
कार्यकर्ता जब टूटता है तो पार्टी का झण्डा उसके हाथ में जरूर रहता है, लेकिन दिल में पार्टी नहीं रहती। राजनीति में सबसे खतरनाक स्थिति वह होती है जब कार्यकर्ता नारा लगाना बंद नहीं करता, बस भीतर से विश्वास करना बंद कर देता है।