तस्वीर में जयपुर में डिजिटल अरेस्ट के मामले में गिरफ्तार आरोपी अखंड प्रताप सिंह (बाएं) और सतपाल सिंह (दाएं) दिखाई दे रहे हैं।

जयपुर में साइबर अपराधियों ने पुलिस, एटीएस और एनआईए अधिकारी बनकर एक बुजुर्ग दंपती को आतंकवादी गतिविधियों और मनी लॉन्ड्रिंग के मामले में फंसाने की धमकी देकर ₹76 लाख की साइबर ठगी की। डिजिटल अरेस्ट के इस मामले में राजस्थान स्टेट साइबर क्राइम पुलिस स्टेशन ने त्वरित कार्रवाई करते हुए ठगी की रकम में से करीब ₹50 लाख होल्ड करवाए हैं। पुलिस ने बैंकिंग ट्रेल और तकनीकी साक्ष्यों के आधार पर अखंड प्रताप सिंह निवासी गौतमबुद्ध नगर, उत्तर प्रदेश और सतपाल सिंह निवासी गाजीपुर, दिल्ली को गिरफ्तार किया है।

महानिदेशक पुलिस राजस्थान श्री राजीव कुमार शर्मा के निर्देश पर साइबर अपराधों, विशेषकर डिजिटल अरेस्ट के मामलों में प्रभावी कार्रवाई के लिए चलाए जा रहे अभियान के तहत यह कार्रवाई की गई। अतिरिक्त महानिदेशक पुलिस साइबर क्राइम श्री विजय कुमार सिंह ने बताया कि 14 अगस्त 2026 को प्रकरण दर्ज होने के बाद पुलिस ने ठगी की रकम की मनी ट्रेल, आरोपियों के मोबाइल नंबरों और बैंक खातों का तकनीकी विश्लेषण शुरू किया।

5 अगस्त को जयपुर निवासी परिवादी की पत्नी के मोबाइल पर व्हाट्सएप कॉल आई थी। इसके बाद अलग-अलग मोबाइल नंबरों से आरोपियों ने खुद को पुलिस, एटीएस और एनआईए का अधिकारी बताया। उन्होंने दंपती के आधार कार्ड के दुरुपयोग से आतंकवादी गतिविधियों और करोड़ों रुपये के वित्तीय अपराध होने की बात कही। आरोपियों ने गिरफ्तारी और परिवार के अन्य सदस्यों के खिलाफ कार्रवाई का भय दिखाया।

आरोपियों ने व्हाट्सएप के जरिए कथित एनआईए नोटिस भेजकर कुछ दिनों में एनओसी सर्टिफिकेट और सुरक्षा प्रमाण पत्र जारी करने का झांसा दिया। इसके साथ ही लगातार व्हाट्सएप वॉइस और वीडियो कॉल के माध्यम से दंपती पर निगरानी रखी गई। आरोपियों ने उनके फिक्स्ड डिपॉजिट और अन्य वित्तीय दस्तावेजों की जानकारी एवं तस्वीरें भी मंगवाईं। दबाव में आकर दंपती ने अपनी बचत को लिक्विडेट कर अलग-अलग बैंक खातों में ₹76 लाख ट्रांसफर कर दिए।

ठगी की सूचना मिलते ही स्टेट साइबर क्राइम पुलिस स्टेशन ने रकम को बचाने और आरोपियों की पहचान करने के लिए कार्रवाई शुरू की। आरोपियों द्वारा इस्तेमाल किए गए व्हाट्सएप नंबरों और संदिग्ध मोबाइल नंबरों की सीडीआर, सीएएफ आईडी और आईपीडीआर के साथ संबंधित बैंक खातों के रिकॉर्ड का विश्लेषण किया गया।

जांच के दौरान बैंकिंग ट्रेल में सामने आया कि ठगी की रकम एक खाते में पहुंचने के बाद उसी दिन आरटीजीएस के माध्यम से दूसरे खाते में और अगले दिन अन्य खाते में ट्रांसफर की गई। इस तरह रकम को एक खाते से दूसरे खाते में तेजी से स्थानांतरित किया गया। पुलिस टीम ने बैंकिंग ट्रांजेक्शन की इस कड़ी का तत्काल विश्लेषण करते हुए संबंधित बैंकों से समन्वय किया और ठगी की ₹76 लाख की रकम में से करीब ₹50 लाख होल्ड करवाए।

तकनीकी साक्ष्यों और बैंकिंग रिकॉर्ड के आधार पर पुलिस ने अखंड प्रताप सिंह निवासी गौतमबुद्ध नगर, उत्तर प्रदेश और सतपाल सिंह निवासी गाजीपुर, दिल्ली को गिरफ्तार किया।

अनुसंधान में सामने आया कि सतपाल सिंह कपड़ा निर्माण एवं सिलाई के व्यवसाय से जुड़ा है। उसने अपनी कंपनी के कर्मचारी एवं मैनेजर अखंड प्रताप सिंह के बैंक खातों की जानकारी साइबर अपराधियों को उपलब्ध कराई। इन खातों में साइबर ठगी की ₹10 लाख और ₹7 लाख की रकम प्राप्त हुई। रकम निकलवाने और अन्य खातों में स्थानांतरित करवाने में भी उसकी भूमिका सामने आई। अनुसंधान के अनुसार उसने कमीशन के लालच में साइबर ठगी की रकम के लेन-देन में सहयोग किया।

वहीं, अखंड प्रताप सिंह उर्फ शानू सिंह वर्ष 2013 से सतपाल सिंह के साथ कपड़ा निर्माण संबंधी कार्य से जुड़ा है और वर्तमान में कंपनी में प्रोडक्शन मैनेजर है। अनुसंधान में सामने आया कि सतपाल सिंह के कहने पर उसने अपने केनरा बैंक खाते की जानकारी उपलब्ध कराई, जिसमें ₹7 लाख की रकम प्राप्त हुई। इसके बाद चेक के माध्यम से आरटीजीएस द्वारा रकम अन्य खाते में ट्रांसफर की गई। पुलिस ने उसकी भूमिका साइबर ठगी की रकम प्राप्त करने और आगे हस्तांतरण के लिए बैंकिंग साधन उपलब्ध कराने के रूप में प्रथम दृष्टया सामने आने की बात कही है।

पुलिस अब व्हाट्सएप रिकॉर्ड, सीडीआर, सीएएफ आईडी, आईपीडीआर और बैंकिंग ट्रांजेक्शन की मनी ट्रेल का विस्तृत विश्लेषण कर रही है। ठगी की रकम आगे किन-किन बैंक खातों में पहुंची और इस नेटवर्क में अन्य कौन-कौन लोग शामिल हैं, इसकी जांच जारी है।

यह कार्रवाई उप महानिरीक्षक पुलिस साइबर क्राइम श्री शान्तनु कुमार सिंह के निर्देशन में स्टेट साइबर क्राइम पुलिस स्टेशन, राजस्थान, जयपुर के थानाधिकारी श्री गजेन्द्र शर्मा, उप अधीक्षक पुलिस के नेतृत्व में गठित टीम ने की। टीम में पुलिस निरीक्षक अजय कुमार, नीरज कुमार, हेड कांस्टेबल बृजलाल, कांस्टेबल सुभाष, किशनलाल, सच्चिदानंद, धर्मेंद्र और सूबे सिंह शामिल थे।

पुलिस ने आमजन से अपील की है कि यदि कोई व्यक्ति स्वयं को एनआईए, पुलिस, एटीएस, ईडी अथवा किसी अन्य सरकारी एजेंसी का अधिकारी बताकर गिरफ्तारी का भय दिखाए, वीडियो कॉल पर निगरानी रखे या बैंक खाते में पैसे जमा अथवा ट्रांसफर करने का दबाव बनाए तो उसके झांसे में न आएं।

पुलिस ने स्पष्ट किया है कि सरकारी एजेंसियां व्हाट्सएप वीडियो कॉल के माध्यम से किसी व्यक्ति को तथाकथित “डिजिटल अरेस्ट” कर पैसे ट्रांसफर करने के निर्देश नहीं देती हैं। किसी भी दबाव में धनराशि ट्रांसफर नहीं करनी चाहिए और ऐसी घटना होने पर तत्काल पुलिस को सूचना देनी चाहिए। साइबर अपराध की शिकायत 1930 पर की जा सकती है।

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