रेल सुरक्षा में ऐतिहासिक सुधार: 2026-27 में अब तक केवल 2 ट्रेन दुर्घटनाएं, 2,569 रूट किमी पर सफल हुआ कवच 4.0

भारतीय रेलवे में सुरक्षा सुधारों का असर अब आंकड़ों में भी दिखाई दे रहा है। 2026-27 में जून तक केवल 2 परिणामी रेल दुर्घटनाएं हुई हैं, जबकि कवच 4.0 अब 2,569 रूट किलोमीटर पर लागू हो चुका है। जानिए रेल सुरक्षा, तकनीकी उन्नयन, अनुरक्षण और कवच परियोजना से जुड़े सभी आधिकारिक आंकड़े।

Update: 2026-07-29 11:48 GMT

तस्वीर में भारतीय रेलवे में परिणामी दुर्घटनाओं की संख्या में वर्षों के दौरान आई कमी को दर्शाने वाला एक लाइन ग्राफ दिखाया गया है।

भारतीय रेलवे में सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता देते हुए पिछले वर्षों में लागू किए गए तकनीकी, अवसंरचनात्मक और अनुरक्षण संबंधी उपायों का प्रभाव अब स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगा है। रेल मंत्रालय के अनुसार वर्ष 2026-27 में जून 2026 तक केवल 2 परिणामी (Consequential) रेल दुर्घटनाएं दर्ज की गई हैं। केंद्रीय रेल, सूचना एवं प्रसारण तथा इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री अश्विनी वैष्णव ने लोकसभा में एक प्रश्न के लिखित उत्तर में यह जानकारी दी।

रेल मंत्रालय के अनुसार वर्ष 2014-15 में परिणामी रेल दुर्घटनाओं की संख्या 135 थी, जो वर्ष 2025-26 में घटकर 16 रह गई, अर्थात 88 प्रतिशत की कमी दर्ज हुई। वहीं वर्ष 2026-27 में जून 2026 तक केवल 2 परिणामी रेल दुर्घटनाएं हुई हैं।

रेल परिचालन सुरक्षा में सुधार का एक अन्य महत्वपूर्ण पैमाना ‘परिणामी दुर्घटना सूचकांक’ (Consequential Accident Index) भी है। वर्ष 2014-15 में यह सूचकांक 0.11 था, जबकि वर्ष 2025-26 में घटकर 0.01 रह गया, जो 91 प्रतिशत की कमी को दर्शाता है। यह सूचकांक कुल ट्रेन परिचालन के मिलियन किलोमीटर के अनुपात में परिणामी दुर्घटनाओं की संख्या को दर्शाता है।

रेल मंत्रालय ने बताया कि सुरक्षा संबंधी गतिविधियों पर व्यय और बजट में लगातार वृद्धि की गई है। वर्ष 2013-14 में सुरक्षा संबंधी गतिविधियों पर 39,200 करोड़ रुपये खर्च किए गए थे। यह राशि वर्ष 2022-23 में 87,336 करोड़ रुपये, वर्ष 2023-24 में 1,01,662 करोड़ रुपये, वर्ष 2024-25 में 1,14,022 करोड़ रुपये, वर्ष 2025-26 में 1,17,693 करोड़ रुपये तथा वर्ष 2026-27 में 1,20,389 करोड़ रुपये हो गई है।

30 जून 2026 तक 6,671 स्टेशनों पर पॉइंट और सिग्नलों के केंद्रीकृत संचालन वाले इलेक्ट्रिकल/इलेक्ट्रॉनिक इंटरलॉकिंग सिस्टम स्थापित किए जा चुके हैं, जिससे मानवीय त्रुटियों के कारण होने वाली दुर्घटनाओं में कमी लाई जा सके। इसी अवधि तक 10,395 लेवल क्रॉसिंग गेटों पर इंटरलॉकिंग की व्यवस्था की गई है। 6,671 स्टेशनों पर ट्रैक की विद्युत माध्यम से उपलब्धता की पुष्टि के लिए पूर्ण ट्रैक सर्किटिंग भी उपलब्ध कराई गई है।

सिग्नल एवं दूरसंचार सुरक्षा से जुड़े विषयों पर अनिवार्य पत्राचार जांच, परिवर्तन कार्य प्रोटोकॉल, पूर्णता ड्राइंग तैयार करने सहित विस्तृत निर्देश जारी किए गए हैं। एस एंड टी उपकरणों के डिस्कनेक्शन और रिकनेक्शन की निर्धारित प्रक्रिया का पालन सुनिश्चित करने पर भी पुनः बल दिया गया है।

सभी लोकोमोटिवों में लोको पायलट की सतर्कता बढ़ाने के लिए विजिलेंस कंट्रोल डिवाइस (VCD) लगाए गए हैं। विद्युतीकृत क्षेत्रों में कम दृश्यता और कोहरे के दौरान चालक दल को आगे स्थित सिग्नलों की जानकारी देने के लिए सिग्मा बोर्ड लगाए गए हैं। कोहरे से प्रभावित क्षेत्रों में जीपीएस आधारित फॉग सेफ्टी डिवाइस (FSD) उपलब्ध कराए गए हैं, जिनकी सहायता से लोको पायलट सिग्नल, लेवल क्रॉसिंग गेट तथा अन्य महत्वपूर्ण स्थलों की दूरी का पता लगा सकते हैं।

प्राथमिक ट्रैक नवीनीकरण के दौरान 60 किलोग्राम, 90 अल्टीमेट टेंसाइल स्ट्रेंथ रेल, प्री-स्ट्रेस्ड कंक्रीट स्लीपर, इलास्टिक फास्टनिंग, पीएससी स्लीपर पर फैन शेप्ड लेआउट टर्नआउट तथा गर्डर पुलों पर स्टील चैनल और एच-बीम स्लीपर जैसी आधुनिक ट्रैक संरचनाओं का उपयोग किया जा रहा है।

ट्रैक बिछाने के कार्यों में PQRS, TRT और T-28 जैसी मशीनों के माध्यम से मशीनीकरण बढ़ाया गया है, ताकि मानवीय त्रुटियों को कम किया जा सके। 130 मीटर और 260 मीटर लंबे रेल पैनलों की अधिकतम आपूर्ति सुनिश्चित की जा रही है, जिससे रेल नवीनीकरण की गति बढ़े और वेल्डिंग जॉइंट कम हों। रेलों में दोषों की पहचान के लिए अल्ट्रासोनिक फ्लॉ डिटेक्शन (USFD) परीक्षण नियमित रूप से किए जा रहे हैं और दोषपूर्ण रेलों को समय पर हटाया जा रहा है।

लंबी रेलों का उपयोग बढ़ाया गया है, एलुमिनो थर्मिक वेल्डिंग को न्यूनतम किया गया है तथा फ्लैश बट वेल्डिंग जैसी बेहतर तकनीक अपनाई जा रही है। ट्रैक ज्यामिति की निगरानी के लिए ऑसिलेशन मॉनिटरिंग सिस्टम (OMS) और ट्रैक रिकॉर्डिंग कार (TRC) का उपयोग किया जा रहा है। रेल फ्रैक्चर और वेल्ड टूटने की पहचान के लिए नियमित ट्रैक पेट्रोलिंग की जाती है। टर्नआउट नवीनीकरण कार्यों में थिक वेब स्विच और वेल्डेबल CMS क्रॉसिंग का उपयोग किया जा रहा है।

रेलवे कर्मचारियों को सुरक्षित कार्यप्रणालियों के पालन के लिए नियमित निरीक्षण, प्रशिक्षण और जागरूकता कार्यक्रम संचालित किए जाते हैं। ट्रैक परिसंपत्तियों की निगरानी के लिए वेब आधारित ऑनलाइन मॉनिटरिंग सिस्टम, ट्रैक डाटाबेस और डिसीजन सपोर्ट सिस्टम अपनाए गए हैं। ट्रैक सुरक्षा से जुड़े विषयों जैसे इंटीग्रेटेड ब्लॉक, कॉरिडोर ब्लॉक, कार्यस्थल सुरक्षा और मानसून संबंधी सावधानियों पर विस्तृत दिशा-निर्देश जारी किए गए हैं।

कोच और वैगनों का निवारक अनुरक्षण नियमित रूप से किया जाता है ताकि सुरक्षित रेल परिचालन सुनिश्चित हो सके। पारंपरिक आईसीएफ डिज़ाइन वाले कोचों के स्थान पर एलएचबी डिज़ाइन वाले कोच लगाए जा रहे हैं। ब्रॉड गेज मार्गों पर सभी मानव रहित लेवल क्रॉसिंग जनवरी 2019 तक समाप्त कर दिए गए थे। रेलवे पुलों की सुरक्षा नियमित निरीक्षण के माध्यम से सुनिश्चित की जाती है तथा आवश्यकता के अनुसार उनकी मरम्मत और पुनर्वास कराया जाता है।

यात्रियों की सुरक्षा के लिए सभी कोचों में वैधानिक अग्नि सुरक्षा सूचनाएं प्रदर्शित की गई हैं। प्रत्येक कोच में अग्नि सुरक्षा पोस्टर लगाए गए हैं, जिनमें ज्वलनशील पदार्थ, विस्फोटक सामग्री न ले जाने, धूम्रपान निषेध और दंड संबंधी जानकारी दी गई है। उत्पादन इकाइयों द्वारा नए पावर कार और पेंट्री कार में फायर डिटेक्शन एवं सप्रेशन सिस्टम तथा नए कोचों में फायर और स्मोक डिटेक्शन सिस्टम लगाए जा रहे हैं। मौजूदा कोचों में भी चरणबद्ध तरीके से इन प्रणालियों को स्थापित किया जा रहा है। कर्मचारियों की नियमित काउंसलिंग और प्रशिक्षण भी जारी है।

30 नवंबर 2023 की राजपत्र अधिसूचना के माध्यम से भारतीय रेलवे के ओपन लाइन जनरल रूल्स में ‘रोलिंग ब्लॉक’ की अवधारणा लागू की गई, जिसके तहत परिसंपत्तियों के अनुरक्षण, मरम्मत और प्रतिस्थापन की योजना 52 सप्ताह पहले तैयार कर चरणबद्ध ढंग से क्रियान्वित की जाती है।

वर्ष 2004-05 से 2013-14 की तुलना में वर्ष 2014-15 से 2025-26 के दौरान तकनीकी सुधारों में उल्लेखनीय प्रगति दर्ज की गई। 60 किलोग्राम गुणवत्ता वाली रेलों का उपयोग 57,450 किलोमीटर से बढ़कर 1.63 लाख किलोमीटर हो गया, जो 2.8 गुना से अधिक है। 260 मीटर लंबे रेल पैनल 9,917 किलोमीटर से बढ़कर 87,219 किलोमीटर हो गए, जो लगभग 9 गुना वृद्धि है। इलेक्ट्रॉनिक इंटरलॉकिंग वाले स्टेशनों की संख्या 837 से बढ़कर 3,691 हो गई, जो 4 गुना से अधिक है। फॉग पास सेफ्टी डिवाइस 31 मार्च 2014 तक 90 थे, जो 31 मार्च 2026 तक बढ़कर 31,693 हो गए, अर्थात 352 गुना वृद्धि हुई। थिक वेब स्विच, जो पहले शून्य थे, उनकी संख्या बढ़कर 35,971 हो गई।

बेहतर अनुरक्षण प्रथाओं के तहत प्राथमिक रेल नवीनीकरण 32,260 ट्रैक किलोमीटर से बढ़कर 57,583 ट्रैक किलोमीटर हो गया, जो 1.78 गुना वृद्धि है। USFD के माध्यम से वेल्ड परीक्षण 79.43 लाख से बढ़कर 2.25 करोड़ हो गए, जो 2.8 गुना से अधिक हैं। वर्ष 2013-14 में 3,699 वेल्ड विफलताओं की तुलना में वर्ष 2025-26 में यह संख्या घटकर 272 रह गई, जो 93 प्रतिशत की कमी है। इसी प्रकार रेल फ्रैक्चर वर्ष 2013-14 के 2,548 से घटकर वर्ष 2025-26 में 208 रह गए, जो 92 प्रतिशत की कमी है।

बेहतर अवसंरचना और रोलिंग स्टॉक के तहत नए ट्रैक का निर्माण 14,985 ट्रैक किलोमीटर से बढ़कर 36,429 ट्रैक किलोमीटर हो गया, जो लगभग 2.5 गुना वृद्धि है। रोड ओवर ब्रिज और रोड अंडर ब्रिज की संख्या 4,148 से बढ़कर 14,362 हो गई, जो 3 गुना से अधिक है। 31 मार्च 2014 तक ब्रॉड गेज पर 8,948 मानव रहित लेवल क्रॉसिंग थीं, जिन्हें 31 जनवरी 2019 तक पूरी तरह समाप्त कर दिया गया। एलएचबी कोचों का निर्माण 2,337 से बढ़कर 49,366 हो गया, जो 21 गुना से अधिक है।

रेल मंत्रालय ने बताया कि ‘कवच’ स्वदेशी रूप से विकसित ऑटोमैटिक ट्रेन प्रोटेक्शन (ATP) प्रणाली है, जिसे उच्चतम स्तर के सुरक्षा प्रमाणन SIL-4 के अनुरूप विकसित किया गया है। यह प्रणाली लोको पायलट द्वारा निर्धारित गति सीमा का पालन न करने की स्थिति में स्वतः ब्रेक लगाती है तथा खराब मौसम में भी सुरक्षित ट्रेन संचालन में सहायता करती है।

यात्री ट्रेनों पर कवच का पहला फील्ड ट्रायल फरवरी 2016 में शुरू किया गया था। स्वतंत्र सुरक्षा मूल्यांकन के बाद वर्ष 2018-19 में तीन कंपनियों को कवच संस्करण 3.2 की आपूर्ति के लिए स्वीकृत किया गया। जुलाई 2020 में कवच को राष्ट्रीय ऑटोमैटिक ट्रेन प्रोटेक्शन प्रणाली के रूप में अपनाया गया।

कवच प्रणाली के कार्यान्वयन के अंतर्गत प्रत्येक स्टेशन और ब्लॉक सेक्शन पर स्टेशन कवच की स्थापना, पूरे ट्रैक पर RFID टैग लगाना, दूरसंचार टावर स्थापित करना, ट्रैक के साथ ऑप्टिकल फाइबर केबल बिछाना तथा प्रत्येक लोकोमोटिव में लोको कवच उपलब्ध कराना शामिल है।

दक्षिण मध्य रेलवे में 1,465 रूट किलोमीटर पर कवच संस्करण 3.2 के अनुभव के आधार पर सुधार किए गए और 16 जुलाई 2024 को अनुसंधान अभिकल्प एवं मानक संगठन (RDSO) ने कवच संस्करण 4.0 को स्वीकृति प्रदान की। कवच 4.0 में बेहतर लोकेशन सटीकता, बड़े यार्डों में सिग्नलों की बेहतर जानकारी, स्टेशन-टू-स्टेशन कवच इंटरफेस तथा मौजूदा इलेक्ट्रॉनिक इंटरलॉकिंग प्रणाली के साथ प्रत्यक्ष इंटरफेस जैसी सुविधाएं शामिल की गई हैं।

20 जुलाई 2026 तक कवच संस्करण 4.0 को 2,569 रूट किलोमीटर पर सफलतापूर्वक चालू किया जा चुका है। इसमें दिल्ली-मुंबई हाई डेंसिटी मार्ग के 1,423 रूट किलोमीटर शामिल हैं, जिनमें तिलक ब्रिज–जंक्शन केबिन–पलवल–मथुरा–कोटा–नागदा–रतलाम–वडोदरा–वीरार सेक्शन के 1,327 रूट किलोमीटर तथा वडोदरा–अहमदाबाद सेक्शन के 96 रूट किलोमीटर शामिल हैं।

दिल्ली-हावड़ा हाई डेंसिटी मार्ग के 1,146 रूट किलोमीटर में चिपयाना–टूंडला–कानपुर–सूबेदारगंज सेक्शन के 563 रूट किलोमीटर, कानपुर–लखनऊ सेक्शन के 71 रूट किलोमीटर, डीडीयू (FOC)–भभुआ रोड सेक्शन के 50 रूट किलोमीटर, सासाराम–फेसर सेक्शन के 43 रूट किलोमीटर, गया–सरमाटार्न–निमियाघाट सेक्शन के 159 रूट किलोमीटर तथा छोटा अंबाना–बर्द्धमान–हावड़ा सेक्शन के 260 रूट किलोमीटर शामिल हैं।

इसके अतिरिक्त 21,858 रूट किलोमीटर पर ट्रैक साइड कवच कार्य शुरू किया गया है, जिसमें भारतीय रेलवे के सभी GQ, GD, HDN तथा चिन्हित सेक्शन शामिल हैं। दक्षिण रेलवे के गुडूर–चेन्नई सेंट्रल–अरक्कोनम–रेनिगुंटा, अरक्कोनम–जोलारपेट्टई तथा शोरनूर–एर्नाकुलम सेक्शन भी इसमें शामिल हैं।

भारतीय रेलवे में कवच से संबंधित प्रमुख कार्यों की प्रगति के अनुसार 11,253 किलोमीटर ऑप्टिकल फाइबर केबल बिछाई जा चुकी है। 1,668 दूरसंचार टावर स्थापित किए गए हैं। 988 स्टेशनों पर स्टेशन डाटा सेंटर स्थापित किए गए हैं। 7,726 रूट किलोमीटर पर ट्रैक साइड उपकरण लगाए गए हैं तथा 6,153 लोकोमोटिवों में कवच उपलब्ध कराया गया है।

इसके अतिरिक्त 7,327 लोकोमोटिव और 1,200 ईएमयू/मेमू में कवच स्थापित करने का कार्य भी शुरू किया जा चुका है। कवच तकनीक पर रेलवे के केंद्रीकृत प्रशिक्षण संस्थानों में विशेष प्रशिक्षण कार्यक्रम संचालित किए जा रहे हैं। अब तक 94,000 से अधिक तकनीशियन, ऑपरेटर और इंजीनियरों को प्रशिक्षण दिया जा चुका है, जिनमें लगभग 57,000 लोको पायलट और सहायक लोको पायलट शामिल हैं। इन पाठ्यक्रमों को IRISET के सहयोग से तैयार किया गया है।

रेल मंत्रालय के अनुसार जून 2026 तक कवच परियोजना पर 3,874 करोड़ रुपये खर्च किए जा चुके हैं। वर्ष 2026-27 के लिए 2,066 करोड़ रुपये का बजटीय प्रावधान किया गया है। मंत्रालय ने कहा कि पूरे देश में कवच का कार्य तेज गति से चल रहा है और कार्यों की प्रगति के अनुरूप आवश्यक धनराशि उपलब्ध कराई जा रही है।

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