शारदीय नवरात्रि के प्रथम दिन पूजा स्थल पर स्थापित मां शैलपुत्री का स्वरूप, जिनकी प्रथम दिन विधि-विधान से पूजा की जाती है।

शारदीय नवरात्रि का पावन पर्व हिंदू धर्म में बहुत ही धूमधाम से मनाया जाता है। नवरात्रि के पहले दिन मां दुर्गा के प्रथम स्वरूप मां शैलपुत्री की विधि-विधान से पूजा-अर्चना की जाती है। पर्वतराज हिमालय की पुत्री होने के कारण माता पार्वती का नाम शैलपुत्री पड़ा था। 'शैल' का अर्थ हिमाचल होता है और पर्वतराज की पुत्री होने के कारण उन्हें शैलपुत्री के नाम से जाना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इनकी पूजा करने से व्यक्ति की सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं।

मां शैलपुत्री की पूजा विधि

देवी भागवत पुराण में मां शैलपुत्री की संपूर्ण पूजा विधि बताई गई है। नवरात्रि के पहले दिन की पूजा से जुड़े मुख्य चरण निम्नलिखित हैं:

  • ब्रह्म मुहूर्त और सफाई: शारदीय नवरात्रि के पहले दिन ब्रह्म मुहूर्त में उठकर पूजा स्थल की अच्छे से साफ-सफाई करें और उसे शुद्ध करें।
  • स्थापना: पूजा के लिए एक लकड़ी की चौकी पर लाल कपड़ा बिछाकर उस पर मां शैलपुत्री की प्रतिमा या तस्वीर की स्थापना करें।
  • मंत्र जाप और आह्वान: मां शैलपुत्री का ध्यान करते हुए उनके मंत्रों का जाप करें। पूजा षोडशोपचार विधि से की जाती है, जिसमें सभी दिशाओं, तीर्थों और नदियों का आह्वान किया जाता है।
  • पुष्प और तिलक: मां शैलपुत्री को सफेद और पीले रंग के पुष्प अर्पित किए जाते हैं। इसके बाद मां को कुमकुम का तिलक लगाएं और शुद्ध देसी घी का दीपक जलाएं।
  • प्रसाद और पाठ: मां के सामने फल और प्रसाद अर्पित करें। इसके बाद मां शैलपुत्री की आरती करें और दुर्गा चालीसा का पाठ करें।

मां शैलपुत्री के विशेष मंत्र

पूजा के दौरान इन विशेष मंत्रों का उच्चारण किया जाता है:

वन्दे वांछितलाभाय चन्द्रार्धकृतशेखरम्, वृषारूढां शूलधरां शैलपुत्रीं यशस्विनीम्।

पूणेन्दु निभां गौरी मूलाधार स्थितां प्रथम दुर्गा त्रिनेत्राम्।

पटाम्बर परिधानां रत्नाकिरीटा नामालंकार भूषिता।

प्रफुल्ल वंदना पल्लवाधरां कातंकपोलां तुंग कुचाम्,

कमनीयां लावण्यां स्नेमुखी क्षीणमध्यां नितम्बनीम्।

या देवी सर्वभूतेषु शैलपुत्री रूपेण संस्थिता, नमस्तस्यै, नमस्तस्यै, नमस्तस्यै नमो नम:,

ओम् शं शैलपुत्री देव्यै: नम:।

नवरात्रि के पहले दिन की व्रत कथा

पौराणिक कथा के अनुसार, प्रजापति दक्ष ने एक भव्य यज्ञ का आयोजन किया था। इस यज्ञ में उन्होंने सभी देवी-देवताओं को श्रद्धा के साथ आमंत्रित किया था, लेकिन अपनी बेटी सती और उनके पति भगवान शिव को आमंत्रण नहीं भेजा था। देवी सती की इच्छा उस यज्ञ में जाने की थी। उन्होंने भगवान शिव को यह बात समझाने का काफी प्रयास किया और अपनी जिद्द पर अड़ी रहीं, जिसके बाद भगवान शिव ने उन्हें यज्ञ में जाने की अनुमति दे दी।

जब देवी सती अपने पिता के यज्ञ में पहुंचीं, तो वहां उनके साथ बहुत बुरा व्यवहार किया गया। उनकी माता को छोड़कर किसी ने भी उनका स्वागत नहीं किया और न ही उनसे ठीक से बात की। प्रजापति दक्ष ने भी उनका अपमान किया। अपने पिता द्वारा किए गए इस अपमान से सती बहुत आहत हुईं। जब भगवान शंकर को इस बात का पता चला तो वे बहुत क्रोधित हुए। दक्ष द्वारा भोलेनाथ का अपमान सती को बिल्कुल सहन नहीं हुआ और उन्होंने खुद को यज्ञ की अग्नि में जला लिया।

भगवान शिव ने क्रोधित होकर दक्ष के यज्ञ को नष्ट कर दिया। इसके बाद सती ने अगले जन्म में हिमाचल प्रदेश के यहाँ शैलपुत्री के रूप में जन्म लिया और वह पर्वतराज हिमालय की पुत्री बनीं। मान्यता है कि शैलराज हिमालय की पुत्री के रूप में सती का यह पुनर्जन्म हुआ, इसीलिए उनका नाम शैलपुत्री पड़ा। उनका विवाह पुनः भगवान शिव से हुआ। धार्मिक मान्यता है कि मां दुर्गा के इस स्वरूप की पूजा करने से भक्तों की सभी इच्छाएं पूरी होती हैं और कन्याओं को मनचाहा वर प्राप्त होता है।

माता शैलपुत्री की आरती

शैलपुत्री मां बैल पर सवार। करें देवता जय जयकार।

शिव शंकर की प्रिय भवानी। तेरी महिमा किसी ने ना जानी।।

पार्वती तू उमा कहलावे। जो तुझे सिमरे सो सुख पावे।

ऋद्धि-सिद्धि परवान करे तू। दया करे धनवान करे तू।।

सोमवार को शिव संग प्यारी। आरती तेरी जिसने उतारी।

उसकी सगरी आस पुजा दो। सगरे दुख तकलीफ मिला दो।।

घी का सुंदर दीप जला के। गोला गरी का भोग लगा के।

श्रद्धा भाव से मंत्र गाएं। प्रेम सहित फिर शीश झुकाएं।।

जय गिरिराज किशोरी अंबे। शिव मुख चंद्र चकोरी अंबे।

मनोकामना पूर्ण कर दो। भक्त सदा सुख संपत्ति भर दो।।

जोर से बोलो जय माता दी, सारे बोले जय माता दी।