तेंदुए के हमलों से बचाव के लिए शिरपुर में विशेष मार्गदर्शन शिविर आयोजित
सामाजिक वनीकरण विभाग ने शिरपुर के विद्यालय में मानव-वन्यजीव संघर्ष रोकने और तेंदुओं से बचाव के सुरक्षा उपायों की जानकारी दी।
शिरपुर के कॉलेज में आयोजित शिविर में विद्यार्थियों को वन्यजीव संरक्षण की जानकारी दी गई।
महाराष्ट्र के तऱ्हाडी स्थित स्व. आण्णासो साहेबराव सोमा पाटील माध्यमिक एवं जूनियर साइंस कॉलेज में मानव-वन्यजीव संघर्ष को रोकने और वन्यजीवों की सुरक्षा के प्रति जागरूकता बढ़ाने के उद्देश्य से विशेष मार्गदर्शन शिविर आयोजित किया गया। सामाजिक वनीकरण विभाग, शिरपुर की ओर से राष्ट्रीय हरित सेना के अंतर्गत आयोजित इस शिविर में विद्यार्थियों, शिक्षकों और ग्रामीणों को वन्यजीव संरक्षण, सुरक्षा उपायों तथा मानव-वन्यजीव सहजीवन के महत्व की जानकारी दी गई।
कार्यक्रम के मंच पर सामाजिक वनीकरण विभाग के वनपाल नितीन मंडलिक, शिविर के प्रमुख वक्ता एवं राष्ट्रीय हरित सेना के समन्वयक योगेश्वर मोरे तथा विद्यालय के प्रधानाचार्य रावसाहेब चव्हाण उपस्थित रहे। इस अवसर पर विद्यालय के सहशिक्षक और शिक्षकेतर कर्मचारी भी बड़ी संख्या में मौजूद थे।
शिविर में मार्गदर्शन करते हुए राष्ट्रीय हरित सेना के समन्वयक योगेश्वर मोरे ने बताया कि मनुष्य और तेंदुए जैसे वन्यजीवों के बीच संघर्ष बढ़ने के पीछे कई कारण हैं। बढ़ते शहरीकरण, सड़क निर्माण और कृषि क्षेत्र के विस्तार के कारण जंगलों का दायरा सिमट रहा है। इससे वन्यजीवों के प्राकृतिक आवास प्रभावित हो रहे हैं और उनके रहने के स्थान कम होते जा रहे हैं।
जंगलों में हिरण और सांभर जैसे प्राकृतिक शिकार की उपलब्धता कम होने पर तेंदुए भोजन की तलाश में गांवों के आसपास पहुंचते हैं और पालतू पशुओं का शिकार करते हैं। इसके अलावा, गन्ने की खेती तेंदुओं के लिए दिन में छिपने और शावकों को जन्म देने का सुरक्षित ठिकाना बन जाती है। इस कारण उनका वास मानव बस्तियों के नजदीक हो जाता है।
मानव गतिविधियां भी इस संघर्ष को बढ़ाने में भूमिका निभाती हैं। कचरे के ढेर, आवारा कुत्तों की मौजूदगी तथा तेंदुआ दिखाई देने पर लोगों की भीड़ जुटना और उसके साथ सेल्फी लेने जैसी घटनाएं परिस्थितियों को अधिक संवेदनशील बना देती हैं।
शिविर में मानव-वन्यजीव संघर्ष को नियंत्रित करने के लिए वन विभाग की ओर से किए जाने वाले उपायों की भी जानकारी दी गई। तेंदुए की मौजूदगी वाले क्षेत्रों में रात के समय रोशनी रखने, घरों के आसपास साफ-सफाई बनाए रखने और छोटे बच्चों को अकेला नहीं छोड़ने जैसे सुरक्षा उपायों पर जोर दिया गया।
बस्ती में तेंदुए के फंसने की सूचना मिलने पर वन विभाग की टीम जाल, पिंजरे या ट्रैंक्विलाइजर के माध्यम से बेहोश करने वाली दवा का इस्तेमाल कर उसे सुरक्षित तरीके से पकड़ती है। जंगल में छोड़े जाने के लिए उपयुक्त नहीं माने जाने वाले या खतरनाक हो चुके तेंदुओं को जुन्नर स्थित प्रसिद्ध तेंदुआ आश्रय केंद्र जैसे सुरक्षित स्थानों पर रखा जाता है।
पशुओं के बाड़ों के आसपास मजबूत जाली लगाने और वन्यजीवों के कारण नुकसान होने पर शासन की ओर से शीघ्र आर्थिक मुआवजा दिलाने जैसे उपायों को भी प्रभावी बताया गया।
शिविर के समापन पर विद्यार्थियों से जंगलों और वन्यजीवों के महत्व को समझने तथा उनके संरक्षण के प्रति सकारात्मक भूमिका निभाने का आह्वान किया गया। समन्वयक योगेश्वर मोरे ने कहा कि मानव और वन्यजीवों के बीच सहजीवन संभव है। विद्यार्थियों को शिविर में सीखी गई सुरक्षा संबंधी जानकारी, नियमों और जनजागरूकता के संदेश को अपने परिवार तथा गांव के लोगों तक पहुंचाना चाहिए। उन्होंने विद्यार्थियों से पर्यावरणदूत बनकर वन्यजीव संरक्षण और मानव-वन्यजीव सहजीवन के लिए पहल करने की अपील की।
शिविर के माध्यम से विद्यार्थियों, शिक्षकों और ग्रामीणों को यह संदेश दिया गया कि मानव-वन्यजीव संघर्ष को कम करने के लिए सुरक्षा नियमों का पालन, जागरूकता और वन्यजीवों के प्राकृतिक आवास का संरक्षण महत्वपूर्ण है।