महाराष्ट्र सूखा: किसानों को 5 हजार की दिवाली सहायता पर उठे सवाल
महाराष्ट्र में सूखे से फसल बर्बाद होने पर किसानों को 5 हजार रुपये की अग्रिम सहायता दी जा रही है, जिसे नाकाफी बताते हुए किसान कर्ज माफी और प्रति हेक्टेयर 50 हजार मुआवजे की मांग कर रहे हैं।
महाराष्ट्र में सूखे और फसल बर्बादी से जूझ रहे किसानों के सामने अब दिवाली मनाने का खर्च भी बड़ी चुनौती बन गया है। बारिश की अनियमितता और सूखे के कारण खरीफ की फसल पूरी तरह बर्बाद होने से किसानों का आर्थिक गणित बिगड़ गया है। ऐसे में मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने बुधवार को सूखाग्रस्त किसानों को दिवाली से पहले प्रति किसान 5 हजार रुपये की अग्रिम सहायता देने की घोषणा की। हालांकि, महंगाई के बीच चार सदस्यों वाले परिवार की दिवाली पर करीब 15 हजार से 20 हजार रुपये तक खर्च होने का अनुमान है। ऐसे में किसानों के बीच सवाल उठ रहा है कि 5 हजार रुपये में किराना, कपड़े, फराल, पटाखे और पूजन सामग्री का खर्च कैसे पूरा होगा। किसानों की नाराजगी इस सवाल के रूप में सामने आ रही है कि फडणवीस साहब, पहले ही आपको 5 हजार रुपये भेज देते हैं, आप इसी रकम में चार लोगों की दिवाली मनाकर दिखाइए।
किसानों का कहना है कि सरकार की ओर से घोषित सहायता राशि दिवाली के बुनियादी खर्चों के मुकाबले भी पर्याप्त नहीं है। चार सदस्यों वाले परिवार के लिए दिवाली का अनुमानित खर्च करीब 20,200 रुपये तक पहुंच रहा है। दिवाली के लिए खाना बनाने की सामग्री पर लगभग 3,000 रुपये, चार लोगों के कपड़ों पर 10,000 रुपये, फराल की सामग्री पर 2,500 रुपये, पटाखों पर 1,500 रुपये, आकाश कंदील और सजावट पर 1,000 रुपये, पूजा सामग्री पर 700 रुपये तथा मिठाई और अन्य छोटे-मोटे त्योहार संबंधी खर्चों पर 1,500 रुपये खर्च होने का अनुमान है। इस तरह कुल खर्च लगभग 20,200 रुपये बैठता है। ऐसे में सरकार की ओर से घोषित 5 हजार रुपये की सहायता और परिवार की जरूरतों के बीच बड़ा अंतर दिखाई दे रहा है।
शिरपुर तालुका में 59,037 किसानों को मिल सकती है सहायता
शिरपुर तालुका के 11 राजस्व मंडलों में कुल लगभग 59 हजार 37 किसान हैं। इनमें 47 हजार 147 किसान और वनपट्टाधारक 11 हजार 890 किसान शामिल हैं। इन सभी किसानों को प्रति किसान 5 हजार रुपये की सहायता दी जाती है तो कुल 29 करोड़ 51 लाख 8500 रुपये की जरूरत होगी। इस हिसाब से तालुका के किसानों को लगभग 30 करोड़ रुपये की सहायता मिल सकती है।
हालांकि, तालुका में 71 हजार 189 हेक्टेयर क्षेत्र में फसलों को नुकसान हुआ है और उत्पादन में 80 से 90 प्रतिशत तक गिरावट आई है। ऐसे में किसानों का कहना है कि नुकसान की तुलना में 5 हजार रुपये की सहायता बेहद कम है। खेती के लिए लिया गया कर्ज, खाद, बीज, कीटनाशक और खेतों की तैयारी पर हुआ खर्च पहले से ही किसानों पर आर्थिक बोझ बढ़ा चुका है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि 5 हजार रुपये मिलने के बाद किसानों के हाथ आखिर कितना पैसा बचेगा।
नाना पंडित सोनवणे बोले, 5 हजार रुपये में दिवाली कैसे मनाएं?
किसान नाना पंडित सोनवणे ने सरकार की सहायता राशि पर सवाल उठाते हुए कहा कि एक एकड़ में सोयाबीन और मक्का की फसल निकालने के लिए ही 5 हजार रुपये मजदूरी देनी पड़ती है। ऐसे हालात में 5 हजार रुपये की अग्रिम सहायता घोषित करना किसानों के साथ मजाक करने जैसा है। उन्होंने कहा कि किसानों के जख्मों पर नमक छिड़कने के बजाय दिवाली से पहले प्रति हेक्टेयर कम से कम 50 हजार रुपये की पर्याप्त सहायता दी जानी चाहिए।
सोनवणे ने कहा कि सरकार ने सूखा घोषित किया है और केंद्रीय दल ने भी क्षेत्र का दौरा कर सूखे की गंभीर स्थिति का जायजा लिया है। इतनी प्रक्रियाएं पूरी होने के बाद भी सरकार अग्रिम सहायता की बात क्यों कर रही है? उन्होंने कहा कि तेल का एक डिब्बा खरीदने पर ही 2 हजार 700 रुपये खर्च हो जाते हैं। ऐसी स्थिति में 5 हजार रुपये में किसानों की दिवाली कैसे मनेगी? उन्होंने मुख्यमंत्री और मंत्रियों से किसानों को यह गणित समझाने की मांग की कि 5 हजार रुपये में दिवाली कैसे मनाई जा सकती है।
राजेंद्र बोरसे ने बताया किसानों के साथ क्रूर मजाक
किसान राजेंद्र बोरसे ने सरकार की ओर से घोषित 5 हजार रुपये की सहायता को अन्नदाता के साथ क्रूर मजाक बताया। उन्होंने कहा कि किसान लगातार तीन वर्षों से अतिवृष्टि, सूखा, फसल बीमा के लाभ से वंचित रहने और कृषि उपज का उचित समर्थन मूल्य नहीं मिलने जैसी समस्याओं का सामना कर रहे हैं। इन संकटों के कारण किसान गंभीर आर्थिक परेशानी में हैं।
बोरसे के अनुसार, शिरपुर तालुका के गिधाड़े, दहिवद, होलनाथे, थालनेर, बोराडी, सांगवी, कोलीद, बभलाज, अर्थे और जवखेड़ा सहित 11 राजस्व मंडलों के किसान फसल बीमा के लाभ से वंचित हैं। दूसरी ओर, बैंकों और वित्तीय संस्थानों की ओर से कर्ज वसूली के लिए लगातार दबाव बनाया जा रहा है। उन्होंने कहा कि 5 हजार रुपये में खेती का खर्च भी पूरा नहीं हो सकता। ऐसे में सरकार को किसानों के साथ मजाक बंद कर सभी किसानों का कर्ज माफ करना चाहिए और प्रति हेक्टेयर कम से कम 50 हजार रुपये की सहायता घोषित करनी चाहिए।
दिवाली के जरूरी खर्चों ने बढ़ाई चिंता
दिवाली पर किराना खरीदने, बच्चों के लिए नए कपड़े लेने, लड्डू-करंजी सहित फराल तैयार करने, घर सजाने, लक्ष्मी पूजन करने और बच्चों के लिए पटाखे खरीदने जैसे खर्च शामिल होते हैं। चार सदस्यों वाले मध्यमवर्गीय परिवार के लिए इन सभी जरूरतों पर अलग-अलग खर्च होता है, लेकिन कुल रकम काफी बढ़ जाती है। बाजार में खरीदारी के दौरान कुछ हजार रुपये कब खर्च हो जाते हैं, इसका भी पता नहीं चलता।
दिवाली के लिए जरूरी किराना सामग्री में खाद्य तेल, बेसन, चीनी, रवा, मैदा, सूखे मेवे और अन्य वस्तुएं शामिल हैं। इनकी कीमतों को देखते हुए घर पर फराल तैयार करना भी महंगा हो गया है। इसके अलावा बच्चों के कपड़े, पूजा सामग्री, दीये, आकाश कंदील और पटाखों का खर्च भी जुड़ जाता है। जरूरी और वैकल्पिक खर्चों में कटौती करने के बावजूद परिवारों के बजट पर दबाव बना रहता है।
ऐसे में सूखे और फसल बर्बादी का सामना कर रहे शिरपुर तालुका के किसानों के लिए दिवाली की खुशियां मनाना आर्थिक चुनौती बन गया है। सरकार की ओर से घोषित 5 हजार रुपये की अग्रिम सहायता के मुकाबले खेती में हुए नुकसान और त्योहार के खर्च का अंतर किसानों की परेशानी को सामने ला रहा है। किसान अब मांग कर रहे हैं कि उन्हें नुकसान के अनुपात में पर्याप्त आर्थिक सहायता और कर्ज से राहत दी जाए।