तस्वीर में लक्ष्मण मंदिर में आयोजित शिव महापुराण कथा के दौरान व्यासपीठ पर विराजमान महंत मुरारी लाल पाराशर और अन्य लोग नजर आ रहे हैं।

शहर के ऐतिहासिक लक्ष्मण मंदिर में आयोजित शिव महापुराण कथा के आठवें दिन शनिवार को व्यासपीठ पर विराजमान लक्ष्मण मंदिर के महंत पूज्य पंडित मुरारी लाल पाराशर ने भगवान शंकर की कथा का वृत्तांत सुनाते हुए भगवान शिव के स्वरूप, उनके कल्याणकारी भाव और शिव-राम एकत्व का विस्तार से वर्णन किया।

पूज्य पंडित मुरारी लाल पाराशर ने कहा कि भगवान शिव को रुद्र नाम से जाना जाता है। रुद्र का अर्थ रुत् दूर करने वाला अर्थात दुखों को हरने वाला है। अतः भगवान शिव का स्वरूप कल्याणकारक है। रुद्राष्टाध्यायी के पांचवें अध्याय में भगवान शिव के अनेक रूप वर्णित हैं। रुद्र देवता को स्थावर-जंगम सर्व पदार्थ रूप, सर्व जाति, मनुष्य, देव, पशु और वनस्पति रूप मानकर सर्व अंतर्यामी भाव एवं सर्वोत्तम भाव सिद्ध किया गया है। इस भाव का ज्ञाता होकर साधक अद्वैतनिष्ठ बनता है।

उन्होंने कहा कि रामायण में भगवान राम के कथन के अनुसार शिव और राम में अंतर जानने वाला कभी भी भगवान शिव या भगवान राम का प्रिय नहीं हो सकता। शुक्ल यजुर्वेद संहिता के अंतर्गत रुद्र अष्टाध्यायी के अनुसार सूर्य, इंद्र, विराट पुरुष, हरे वृक्ष, अन्न, जल, वायु एवं मनुष्य के कल्याण के सभी हेतु भगवान शिव के ही स्वरूप हैं। भगवान सूर्य के रूप में शिव मनुष्य के कर्मों का भली-भांति निरीक्षण कर उन्हें वैसा ही फल देते हैं।

पूज्य पाराशर ने कहा कि संपूर्ण सृष्टि शिवमय है। मनुष्य अपने-अपने कर्मानुसार फल पाते हैं। स्वस्थ बुद्धि वालों को वृष्टि रूपी जल, अन्न, धन, आरोग्य और सुख आदि भगवान शिव प्रदान करते हैं, जबकि दुर्बुद्धि वालों के लिए व्याधि, दुख एवं मृत्यु आदि का विधान भी शिवजी करते हैं।

उन्होंने राम नाम की महिमा बताते हुए कहा, "राम रामेति रामेति रमे रामे मनोरमे, सहस्त्रनाम तत्तुल्यं रामनाम वरानने।" अर्थात राम-नाम सहस्त्र नामों के बराबर है। भगवान शिव, विष्णु, ब्रह्मा, शक्ति, राम और कृष्ण सब एक ही हैं। केवल नाम और रूप का भेद है, तत्व में कोई अंतर नहीं। किसी भी नाम से उस परमात्मा की आराधना की जाए, वह उसी सच्चिदानन्द की उपासना है।

उन्होंने कहा कि इस तत्व को न जानने के कारण भक्तों में आपसी मतभेद हो जाता है। परमात्मा के किसी एक नाम-रूप को अपना इष्ट मानकर एकाग्रचित्त होकर उनकी भक्ति करते हुए अन्य देवों का उचित सम्मान और उनमें पूर्ण श्रद्धा रखनी चाहिए। किसी भी अन्य देव की उपेक्षा करना या उनके प्रति उदासीन रहना स्वयं अपने इष्टदेव से उदासीन रहने के समान है।

पूज्य पाराशर ने शिव पुराण का उल्लेख करते हुए कहा कि ब्रह्मा, विष्णु व शिव एक-दूसरे से उत्पन्न हुए हैं, एक-दूसरे को धारण करते हैं और एक-दूसरे के अनुकूल रहते हैं। भक्त सोच में पड़ जाते हैं कि कहीं किसी को ऊंचा बताया जाता है, तो कहीं किसी को। विष्णु शिव से कहते हैं, "मेरे दर्शन का जो फल है वही आपके दर्शन का है। आप मेरे हृदय में रहते हैं और मैं आपके हृदय में रहता हूं।" कृष्ण शिव से कहते हैं, "मुझे आपसे बढ़कर कोई प्यारा नहीं है, आप मुझे अपनी आत्मा से भी अधिक प्रिय हैं।"

उन्होंने कहा कि संसार में निरंतर तीन प्रकार के कार्य चलते रहते हैं—उत्पत्ति, पालन और संहार। इन्हीं तीन भिन्न कार्यों के लिए तीन नाम दे दिए गए हैं—ब्रह्मा, विष्णु व महेश। विष्णु सतमूर्ति हैं, ब्रह्मा रजोगुणीमूर्ति व शिव तामसमूर्ति हैं। एक-दूसरे से स्नेह के कारण एक-दूसरे का ध्यान करने से शिव गोरे हो गए और विष्णु का रंग काला हो गया।

उन्होंने बताया कि शिव तामसी गुणों के अधिष्ठाता हैं। तामसी गुण यानी निंदा, क्रोध, मृत्यु, अंधकार आदि। तामसी भोजन यानी कड़वा, विषैला आदि। जिस अपवित्रता से, जिस दोष के कारण किसी वस्तु से घृणा की जाती है, शिव उसकी ओर बिना ध्यान दिए उसे धारण कर उसे भी शुभ बना देते हैं।

इस अवसर पर पान्हौरी सीता राम मंदिर के महंत बाबा शिवरामदास जी महाराज, पीतम दास मंदिर महंत कृष्णा बाबा, पूर्व जिला न्यायाधीश केदार लाल गुप्ता, हरेश बंसल, लक्ष्मी तमोलिया, मालती खण्डेलवाल, ममता बंसल, आशा सेठी, एडवोकेट मोहिनी गोयल सहित बड़ी संख्या में महिला-पुरुष भक्त उपस्थित थे।

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