भूखे को भोजन और प्यासे को पानी पिलाना ही संसार का श्रेष्ठ कर्म: संत दिग्विजय राम
रामद्वारा में शिव पुराण कथा में संत दिग्विजय राम ने दान, सेवा, संस्कार और धन के सदुपयोग को मानव कल्याण का श्रेष्ठ मार्ग बताया।
तस्वीर में संत दिग्विजय राम चित्तौड़गढ़ के रामद्वारा में आयोजित शिव पुराण कथा के दौरान माइक के सामने प्रवचन देते हुए नजर आ रहे हैं।
बड़ी सादड़ी। रामद्वारा में आयोजित शिव पुराण कथा में संत दिग्विजय राम ने कहा कि भूखे को भोजन और प्यासे को पानी पिलाने से उत्तम कार्य इस संसार में नहीं है। उन्होंने इसे मानव का सर्वश्रेष्ठ कर्म बताते हुए कहा कि व्यक्ति को अपने कर्मों के अनुसार पुण्य और पाप का फल प्राप्त होता है।
चित्तौड़गढ़ में रामद्वारा में आयोजित शिव पुराण कथा के दौरान संत दिग्विजय राम ने कहा कि जीवन में व्यक्ति जो धन अर्जित करता है, उसे तीन भागों में खर्च करना चाहिए। पहला भाग धर्म के लिए, दूसरा धन की वृद्धि के लिए और तीसरा स्वयं के लिए खर्च करना चाहिए। शिव पुराण सहित हर शास्त्र में इसका उल्लेख किया गया है। उन्होंने कहा कि तन की शुद्धि सेवा से, धन की शुद्धि दान से और मन की शुद्धि सत्संग से होती है। यही कल्याण का सर्वोत्तम मार्ग है।
उन्होंने कहा कि धर्म के लिए धन तीन प्रकार से खर्च करना चाहिए। पहला नित्य कर्म में, दूसरा धार्मिक कार्यक्रमों के निमित्त और तीसरा अपनी मनोकामना पूरी करने के लिए। धन की वृद्धि के लिए व्यक्ति को व्यापार करना चाहिए, जिससे धन में वृद्धि हो सके। तीसरा हिस्सा स्वयं के लिए खर्च करना चाहिए। व्यक्ति यदि इन सभी कार्यों को करता है तो उसे भगवत भक्ति प्राप्त होती है और वह गोलोक को प्राप्त करता है।
संत दिग्विजय राम ने कहा कि व्यक्ति को अपनी आय का दसवां हिस्सा दान करना चाहिए। जो व्यक्ति धन का उपयोग केवल अपने लिए करता है, उसे नरक की सजा भुगतनी पड़ती है। आज व्यक्ति को जो कुछ भी मिल रहा है, वह भगवत कृपा है। इसलिए उसे ईमानदारी से दान करना चाहिए। उन्होंने कहा कि यदि आप कंजूसी करेंगे तो ईश्वर भी आपको देने में कंजूसी करेगा।
उन्होंने बताया कि धर्म के चार चरण सत्य, दया, तप और दान बताए गए हैं, लेकिन कलयुग में केवल दान की प्रधानता बताई गई है। दान ही भक्ति के प्रभाव को शक्तिशाली बनाता है और इसी से व्यक्ति का कल्याण संभव है। उन्होंने कहा कि अपना और अपने परिवार का पेट तो पशु भी पालता है, लेकिन मानव देह में दो ही बातें श्रेष्ठ मानी गई हैं—भगवत भजन और सेवा। यदि व्यक्ति दोनों कार्य ईमानदारी से करता है तो उसका कल्याण हो जाता है।
संत दिग्विजय राम ने कहा कि प्रभु कृपा से यदि कुछ मिला है तो प्रसन्न रहो, लेकिन प्रपंच मत करो। शास्त्रों में धन की तीन गति बताई गई हैं—दान, भोग और नाश। किसी को दुख दोगे तो दुख मिलेगा और किसी को सुख दोगे तो सुख मिलेगा। उन्होंने कहा कि संस्कार से अच्छे विचार आते हैं। इसलिए अपने बच्चों को धन की बजाय संस्कार दें। यदि व्यक्ति के पास संस्कार होंगे तो धन अपने आप कमा लेगा और यदि संस्कार नहीं हैं तो दिया गया धन भी नष्ट हो जाएगा।
उन्होंने कहा कि व्यक्ति ने धन का दान और भोग नहीं किया तो धन की तीसरी गति यानी नाश अपने आप हो जाएगी। दान भी एक हाथ से करें तो दूसरे हाथ को मालूम नहीं पड़ना चाहिए। भगवान दिए गए दान को चक्रवर्ती ब्याज के साथ वापस लौटाते हैं।
संत दिग्विजय राम ने कहा कि संसार में देने वाला परमात्मा है। भगवान सबकी पूर्ति करते हैं—कीड़ी को कण और हाथी को मण। यह सब प्रभु की व्यवस्था है। एक पत्थर में रहने वाले छोटे से जीव का भरण-पोषण भी ईश्वर करता है। व्यक्ति को इस भ्रम में नहीं जीना चाहिए कि वह अपने परिवार के लिए सब कुछ कर रहा है। उसे इसका अहंकार नहीं होना चाहिए। हर व्यक्ति को अपने कर्मों के अनुसार प्राप्त होता है।
उन्होंने कहा कि प्रकृति आदान-प्रदान से चलती है। दान केवल धन का नहीं होता, बल्कि कई प्रकार का होता है। समय दान भी व्यक्ति के श्रेष्ठ कार्य करने का माध्यम है। इस प्रकार भगवत भजन, सेवा, दान और संस्कार को जीवन में अपनाकर व्यक्ति अपने कर्मों को सार्थक कर सकता है।