तस्वीर में संत दिग्विजय राम महाराज बड़ी सादड़ी रामद्वारा में शिव पुराण कथा के दौरान माइक पर प्रवचन देते हुए नजर आ रहे हैं।

बड़ी सादड़ी में चित्तौड़गढ़ रामद्वारा में आयोजित चातुर्मासिक सत्संग के तहत चल रही शिव पुराण कथा में संत दिग्विजय राम महाराज ने कहा कि अच्छाई में भी बुराई देखना संसार की प्रवृति है। उन्होंने कहा कि अहंकार व्यक्ति को भक्ति से दूर कर देता है और भक्ति में अहंकार नहीं होना चाहिए, क्योंकि अहंकार ही मनुष्य के पतन का कारण है। भगवान से प्रार्थना करते समय दासत्व भाव रखना चाहिए।

संत दिग्विजय राम महाराज ने कहा कि जनसाधारण को भगवान शिव के आठ नाम हर, महेश्वर, शंभू, शूलपाणी, पिनाक, शिव, पशुपति व महादेव का क्रमवार स्मरण कर पूजन करने से अभीष्ट फल की प्राप्ति होती है। पूजन के बाद क्षमा याचना और सांष्टांग प्रणाम करना चाहिए।



उन्होंने कहा कि संसार में व्यक्ति सभी ऋण चुका सकता है, लेकिन माता, पिता और गुरु का ऋण कभी नहीं उतर सकता। शिव पुराण कथा में वर्ण के अनुसार पार्थिव शिवलिंग के निर्माण का प्रावधान बताया गया है। ब्राह्मण के लिए सफेद, क्षत्रिय के लिए लाल, वैश्य के लिए पीली और शुद्र के लिए काली मिट्टी से पार्थिव शिवलिंग बनाने का विधान है। हालांकि, मिट्टी की उपलब्धता नहीं होने पर जैसी भी पवित्र मिट्टी मिले, उससे पार्थिव शिवलिंग का निर्माण कर पूजन करना चाहिए।

इसके बाद गोपीचंद भृतहरि कथा का वाचन करते हुए संत दिग्विजय राम महाराज ने राजा गोपीचंद और उनकी माता वेणा देवी के बीच हुए संवाद का वर्णन किया। माता वेणादेवी ने पुत्र गोपीचंद को नसीहत दी कि यह संसार नश्वर है। इसलिए गुरु की शरण में जाकर सन्यास धारण कर तप और भक्ति करना ही जीवन का सत्य है।

गोपीचंद ने संसार के सुख भोगने देने की बात कही। आखिरकार उन्होंने माता की बात मानते हुए गुरु की शरण ली। कथा के माध्यम से संत दिग्विजय राम महाराज ने अहंकार से दूर रहकर भक्ति, गुरु शरण और माता-पिता के ऋण के महत्व पर प्रकाश डाला।

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