तस्वीर में भगवान शिव के पोस्टर के आगे बैठकर संत दिग्विजय राम कथा सुना रहे हैं।

चित्तौड़गढ़। बड़ी सादड़ी के राम द्वारा में आयोजित महा शिव पुराण कथा में संत दिग्विजय राम ने सद्गुरु की कृपा और कठोर साधना के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि सतगुरु कृपा के बिना कोई भी कार्य सिद्ध नहीं होता। उन्होंने कहा कि तन-मन की सभी बुराइयां सद्गुरु की कृपा से समाप्त हो जाती हैं।

संत दिग्विजय राम ने कहा कि सद्गुरु कुंभकार की तरह होते हैं, जो व्यक्ति के अंदर की खोट को समाप्त कर देते हैं। मन की खोट साधना से और जब शरीर तपता है तो बाहर की खोट भी समाप्त हो जाती है। सभी तरह की कमियों को दूर करने का एक ही उपाय है कि व्यक्ति सद्गुरु की शरण में जाए। तन की कमियों को संसार के साधनों से समाप्त किया जा सकता है, लेकिन मन की खोट तप, साधना और सद्गुरु की कृपा से ही दूर की जा सकती है।


उन्होंने कहा कि जिस व्यक्ति का अंतरण निर्मल हो जाता है, उसके लिए ईश्वर की प्राप्ति संभव हो जाती है। जीवन के सभी संशय सद्गुरु मिटा देते हैं। संत ने शिव पुराण का उल्लेख करते हुए बताया कि पार्वती जी को भी तपस्या के लिए गुरु नारद जी का आश्रय लेना पड़ा था। सतगुरु की कृपा का वर्णन नहीं किया जा सकता।

संत दिग्विजय राम ने बताया कि नारद जी ने पार्वती को पंचाक्षर गुरु मंत्र दिया था। इस मंत्र की महिमा बहुत बड़ी है और इसे सुनने मात्र से भगवान महादेव प्रसन्न हो जाते हैं। जनसाधारण द्वारा पंचाक्षर मंत्र और महामृत्युंजय मंत्र का जाप करके भगवान महादेव को प्रसन्न किया जा सकता है। पंचाक्षर मंत्र सभी मंत्रों का राजा है और महादेव को बहुत ही प्रिय लगता है।

संत ने बताया कि पार्वती माता-पिता की आज्ञा लेकर तपस्या के लिए जाती हैं। पार्वती जी उस स्थान पर जाती हैं, जहां महादेव ने कामदेव को भस्म किया था। गर्मी के मौसम में अपने चारों ओर पंचाग्नि जलाकर पंचाक्षर मंत्र का जप करते हुए निराहार रहती हैं। पार्वती जी ने पेड़ों की पत्तियां खाकर कठोर तपस्या की, इसलिए उनका नाम अर्पण पड़ा।

कथा में संत दिग्विजय राम ने बताया कि सभी देवताओं को तारकासुर परेशान करने लगा, जिससे देवता भयभीत होकर शिव के पास जाते हैं और प्रार्थना करते हैं कि आप विवाह कीजिए, ताकि आपसे पैदा होने वाला पुत्र तारकासुर का वध कर सके और सभी ओर शांति हो जाए। सभी देवताओं द्वारा बार-बार प्रार्थना करने पर शिव विवाह के लिए तैयार हो जाते हैं। इसके बाद सप्त ऋषियों को बुलाकर शिव-पार्वती की परीक्षा लेने के लिए भेजते हैं।

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