बड़ी सादड़ी: श्रीमद् भागवत कथा का शुभारंभ, संत दिग्विजय राम का प्रवचन
रामद्वारा में कथा के पहले दिन संत दिग्विजय राम महाराज ने भागवत को मन की सफाई का जरिया बताते हुए भक्ति और मोक्ष का मार्ग रेखांकित किया।
तस्वीर में बड़ी सादड़ी के रामद्वारा में आयोजित कार्यक्रम के दौरान संत दिग्विजय राम महाराज (गुलाबी वस्त्रों में) एक श्रद्धालु के सिर पर विराजमान श्रीमद् भागवत पुराण ग्रंथी पर पुष्पमाला पहनाते हुए दिख रहे हैं, जबकि आसपास मौजूद अन्य श्रद्धालु हाथ जोड़े खड़े हैं।
बड़ी सादड़ी के रामद्वारा में मंगलवार को श्रीमद् भागवत कथा का शुभारंभ हुआ। कथा के पहले दिन महात्म्य प्रसंग में संत दिग्विजय राम महाराज ने कहा कि श्रीमद् भागवत भक्ति, ज्ञान, वैराग्य और तत्व का मर्म समझाकर पापों से मुक्ति के साथ मोक्ष प्रदान करने वाला पावन ग्रंथ है। उन्होंने कहा कि भागवत कथा श्रवण के लिए अंत:करण की पात्रता होना आवश्यक है और यह कथा मन का सर्विस सेंटर है।
संत दिग्विजय राम महाराज ने कहा कि भागवत कथा को भवसागर से पार होने के लिए श्रेष्ठ माना गया है। जिस तरह शेरनी का दूध शावक के उदर और स्वर्ण पात्र में ही टिकता है, उसी तरह भागवत कथा का श्रवण करने के लिए तन और मन एक होना चाहिए। भागवत रूपी ज्ञान गंगा में डुबकी लगाने से लोक और परलोक दोनों सुधर जाते हैं।
उन्होंने कहा कि शरीर रूपी मशीन में मन एक पुर्जा है, लेकिन हम इसकी सर्विस नहीं करवाते। मन की सफाई के लिए भागवत कथा सबसे बड़ा सर्विस सेंटर है। जिसका मन निर्मल होता है, वही परमात्मा को प्राप्त कर सकता है। भागवत संसार की सर्वश्रेष्ठ नौका है, जो जीव को चैतन्य की ओर ले जाती है। बैकुण्ठ का दरवाजा भी भागवत रूपी पासवर्ड से खुलता है। भागवत महापुराण का एक-एक शब्द श्रीकृष्ण है। भागवत पुराण के पहले श्लोक में भगवान का स्वरूप बताया गया है।
संत दिग्विजय राम महाराज ने कहा कि सत्य का अभाव नहीं होता और असत्य का कोई प्रभाव नहीं होता। जीवन में पाप और पुण्य के अलावा कुछ भी साथ नहीं जाता। सत्संग के समान सुख बैकुण्ठ में भी नहीं मिल सकता। नींद और निंदा पर विजय प्राप्त करने वाला जीव धन्य हो जाता है।
उन्होंने बताया कि सुखदेव महाराज ने नेमीशारण्य स्थल पर पहली बार 88 हजार सनकादिक ऋषियों को श्रीमद् भागवत कथा का श्रवण कराया था। उन्होंने कहा कि जो जीवन को अलौकिक कर दे, वही कथा है। भागवत कथा का श्रोता प्रभु अनुरागी होना चाहिए। भागवत में काल के गाल में जाने वाले जीव को बचाने का सामर्थ्य है। जन्म-जन्मान्तर के पुण्यों से भागवत प्रसाद की प्राप्ति होती है। पापी व्यक्ति भी भागवत का आश्रय ले ले तो उसका उद्धार हो जाता है। कथा श्रवण के दौरान किसी की भी निंदा नहीं करनी चाहिए।