तस्वीर में माणिक्यनगर रामद्वारा धाम, शाहपुरा में सत्संग के दौरान मंच पर विराजमान जगतगुरु आचार्य स्वामी श्रीरामदयालजी महाराज और अन्य संत दिखाई दे रहे हैं।

जीवन के मनोविकारों और इंद्रियों की कुटिलता से उत्पन्न दुःखों का समाधान वंदन भक्ति से संभव है। वैदिक आदर्शों और भारतीय संस्कृति के अनुसार भक्ति में वंदन भक्ति को सर्वश्रेष्ठ, अद्भुत और विलक्षण माना गया है। यह बात अंतरराष्ट्रीय रामस्नेही संप्रदाय शाहपुरा के पीठाघीश्वर जगतगुरु आचार्य स्वामी श्रीरामदयालजी महाराज ने मंगलवार को माणिक्यनगर रामद्वारा धाम में ‘‘विश्व शांति कल्याण’’ चातुर्मास के तहत आयोजित दैनिक सत्संग में कही।

आचार्य रामदयालजी महाराज ने वंदन भक्ति के स्वरूप की व्याख्या करते हुए कहा कि कितना भी बड़ा अपराध हो, क्षमायाचना कर वंदन करने से मन को राहत मिलती है। वंदन भक्ति काम, क्रोध, लोभ और मद का अंत करने वाली है। उन्होंने कहा कि प्रतिदिन सुबह उठते ही सबसे पहले परमात्मा, सद्गुरु और माता-पिता को प्रणाम करना चाहिए। प्रणाम और वंदन करने से आयु, विद्या, यश और बल में वृद्धि होती है। यदि आयु, आय, सम्मान और पद चाहिए तो रोज राम गुरु के चरणों में बार-बार प्रणाम करें, ये सब प्राप्त हो जाएंगे।

आचार्यश्री ने कहा कि संत हो या गृहस्थ, सभी को अपने भीतर देखना चाहिए कि सद्गुरु ने क्या सिखाया और हम क्या कर रहे हैं। सुबह उठते ही, भोजन करने से पहले, शाम को आरती से पहले और रात में सोने से पहले परमात्मा और सद्गुरु को प्रणाम करना चाहिए।

उन्होंने कहा कि परमात्मा से कुछ भी छुपा हुआ नहीं है। वह हमारे मन की सरलता और कुटिलता सब कुछ जानता है। जैसी हमारी भावना होगी, वैसा ही फल प्राप्त होगा। भक्ति विनम्रता का प्रतीक है और व्यक्ति को झुकना सिखाती है। उन्होंने कहा कि अफसोस की बात है कि कई लोगों को अपने गुरु को प्रणाम करने में भी शर्म आती है।

आचार्य रामदयालजी महाराज ने कहा कि माता-पिता और दादा-दादी को देखकर ही बच्चे संस्कारित होते हैं। सत्संग संस्कार सिखाने का प्रशिक्षण केंद्र है। संस्कार नहीं देने का कुप्रभाव समाज पर पड़ रहा है।

उन्होंने कहा कि हम परमात्मा और गुरु के समक्ष नहीं झुकेंगे तो कहां झुकेंगे। राम गुरु के लिए झुक गए तो दुनिया में अन्य कहीं भी झुकने की जरूरत नहीं पड़ेगी। भगवान को प्रणाम कर लिया तो जन्म-मरण के बंधन से मुक्त हो जाएंगे। साधक जितना विनम्र होगा, उसका जीवन उतना ही निराभिमानी बनेगा। अभिमान रहित जीवन भगवान तक पहुंचने में सरलता और सहजता का रूपक प्राप्त कर लेता है। भगवान कभी अपने भक्त में अहंकार नहीं देख सकते। भक्त सदा विनम्र, निराभिमानी, सरल और सहज होना चाहिए। भक्ति भक्त को निर्मल और सरल बनाती है।

आचार्यश्री ने कहा कि हमारा आहार हमेशा शुद्ध होना चाहिए। भगवान की भक्ति से आहार शुद्ध होता है। प्रसाद का मतलब परमात्मा का साक्षात दर्शन होता है। भगवान को भोग लगाकर किया गया भोजन प्रसाद बन जाता है।



 




आचार्यश्री से पूर्व अंतरराष्ट्रीय रामस्नेही संप्रदाय के प्रखर वक्ता संत मनोरथरामजी आलोट ने मानस पर प्रवचन दिया। प्रवचन के विश्राम पर श्रद्धालुओं द्वारा आचार्यश्री रामदयालजी महाराज की आरती की गई।

सत्संग में भीलवाड़ा सहित विभिन्न स्थानों से बड़ी संख्या में श्रद्धालु मौजूद रहे। चातुर्मास में दैनिक सत्संग का समय सुबह 9 से 10 बजे तक है। रामधुनी के साथ सुबह 8.30 से 9 बजे तक वाणीजी का पाठ हो रहा है। सूर्यास्त के समय संध्या आरती और रामस्नेही संप्रदाय के युवा संत रामजस जी ईडर द्वारा भक्तमाल की कथा में भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंच रहे हैं।


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