रामनिवास धाम में गुरु पूर्णिमा पर उमड़ा श्रद्धा सैलाब, संत नवनिधराम ने बताया गुरु का महत्व

रामनिवास धाम शाहपुरा में गुरु पूर्णिमा पर हजारों श्रद्धालु पहुंचे, संत नवनिधराम महाराज ने गुरु-शिष्य परंपरा का महत्व बताया।

Update: 2026-07-29 10:12 GMT

तस्वीर में रामनिवास धाम परिसर में माइक के सामने बैठकर श्रद्धालुओं को संबोधित करते संत और पीछे बैठे अन्य साधु-अनुयायी दिख रहे हैं।

रामस्नेही संप्रदाय की मुख्यपीठ रामनिवास धाम में बुधवार को गुरु पूर्णिमा महोत्सव श्रद्धा, भक्ति और आध्यात्मिक उल्लास के साथ मनाया गया। प्रातःकाल से ही धाम में श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ने लगी और राजस्थान सहित देश के विभिन्न राज्यों से पहुंचे हजारों रामस्नेही अनुयायियों ने आद्याचार्य महाप्रभु स्वामी रामचरणजी महाराज के पावन स्तंभजी पर माथा टेककर आस्था अर्पित की।

गुरु पूर्णिमा के अवसर पर रामनिवास धाम में राम नाम की मधुर ध्वनि, भक्ति भजनों की स्वर लहरियां और गुरु वंदना के जयघोष से वातावरण भक्तिमय बना रहा। श्रद्धालुओं ने गुरु चरणों में नमन कर आध्यात्मिक आशीर्वाद प्राप्त किया। कार्यवाहक भंडारी संत नवनिधराम महाराज, ट्रस्टी रामगोपाल सोमाणी, सुर्यप्रकाश बिड़ला और कैलाशचंद्र तोषनीवाल की अगुवाई में स्तंभजी की महाआरती वंदना की गई। इससे पूर्व राम नाम अंकित कर स्तंभजी की पूजा-अर्चना की गई।



 


गुरु पूर्णिमा के दिन रामनिवास धाम का प्रत्येक कोना श्रद्धा और विश्वास की छटा से भरा नजर आया। सुबह से ही स्तंभजी और सरस्वती भंडार तक श्रद्धालुओं की लंबी कतारें लगी रहीं। महिलाओं, युवाओं, बुजुर्गों और बच्चों ने विधि-विधान से दर्शन कर जीवन में सुख, शांति, समृद्धि और आध्यात्मिक उन्नति की कामना की। पूरे परिसर में अनुशासन और सेवा का समन्वय दिखाई दिया। स्वयंसेवकों ने श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए व्यवस्थाओं को सुचारु बनाए रखा।

इन दिनों रामनिवास धाम में चातुर्मास कर रहे कार्यवाहक भंडारी संत नवनिधराम महाराज ने गुरु पूर्णिमा की महत्ता पर प्रवचन देते हुए गुरु-शिष्य परंपरा का विस्तार से वर्णन किया। उन्होंने कहा कि भारतीय सनातन संस्कृति में गुरु को साक्षात परमात्मा का स्वरूप माना गया है। गुरु केवल ज्ञान देने वाला व्यक्ति नहीं, बल्कि जीवन को सही दिशा दिखाने वाला दिव्य पथप्रदर्शक होता है। गुरु के बिना आत्मज्ञान, संस्कार और जीवन का वास्तविक उद्देश्य अधूरा रह जाता है।

संत नवनिधराम महाराज ने कहा कि वर्तमान वैश्विक और भौतिकवादी युग में गुरु और शिष्य के संबंधों के मायने बदल रहे हैं। आधुनिकता की दौड़ में आध्यात्मिक मूल्यों का क्षरण चिंता का विषय है। ऐसे समय में सनातन परंपरा में गुरु को दिए गए सर्वोच्च स्थान को पुनः स्थापित करने की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि गुरु के प्रति समर्पण, श्रद्धा और सेवा भाव के बिना जीवन में वास्तविक ज्ञान और आत्मिक शांति की प्राप्ति संभव नहीं है।

अपने प्रवचन में संत नवनिधराम महाराज ने शास्त्रों का उल्लेख करते हुए गुरु के स्वरूप का वर्णन किया। उन्होंने द्वयोपनिषद् के श्लोक का उल्लेख करते हुए कहा—

आचार्यों वेदसंपन्नो विष्णुभक्तो विमत्सरः।

मन्त्रज्ञो मन्त्रभक्तश्च सदामन्त्राश्रयः शुचिः॥

उन्होंने श्लोक की व्याख्या करते हुए बताया कि वास्तविक गुरु वही है जो स्वयं श्रेष्ठ आचरण करता हो और समाज को भी सदाचार की प्रेरणा देता हो। जो वेदों का ज्ञाता, भगवान विष्णु का अनन्य भक्त, ईर्ष्या और द्वेष जैसे विकारों से रहित, मंत्रों का ज्ञाता और उनमें पूर्ण निष्ठा रखने वाला हो। जो सदैव मंत्रों का आश्रय लेने वाला तथा तन-मन से पवित्र हो, वही गुरु कहलाने का अधिकारी है।

संत नवनिधराम महाराज ने कहा कि गुरु केवल उपदेश देने वाला नहीं, बल्कि अपने जीवन से प्रेरणा देने वाला होता है। उसका प्रत्येक आचरण समाज के लिए आदर्श बनता है। गुरु अपने ज्ञान, तप, त्याग और सेवा से समाज में संस्कारों का दीप प्रज्ज्वलित करता है। इसी कारण भारतीय संस्कृति में गुरु को ब्रह्मा, विष्णु और महेश के समान पूजनीय माना गया है।

उन्होंने शिष्य के कर्तव्यों पर भी प्रकाश डालते हुए द्वयोपनिषद् के एक अन्य श्लोक का उल्लेख किया—

शरीरं वसु विज्ञानं वासः कर्मगुणानसून्।

गुर्वर्थं धारयेत् यस्तु स शिष्यो नेतरः स्मृतः॥

संत ने इसकी व्याख्या करते हुए कहा कि जो व्यक्ति अपना शरीर, धन, ज्ञान, कर्म, गुण, वस्त्र और यहां तक कि अपने प्राण भी गुरु के आदर्शों और बताए मार्ग के लिए समर्पित कर देता है, वही सच्चा शिष्य कहलाता है। केवल नाम मात्र से गुरु का अनुयायी बन जाना पर्याप्त नहीं है। वास्तविक शिष्य वही है जो गुरु के उपदेशों को जीवन में उतारकर चरित्र, व्यवहार और सेवा के माध्यम से समाज के सामने आदर्श प्रस्तुत करे।

उन्होंने कहा कि गुरु और शिष्य का संबंध केवल शिक्षा तक सीमित नहीं होता, बल्कि यह आत्मा और परमात्मा के मिलन का माध्यम है। गुरु अज्ञान रूपी अंधकार को दूर कर ज्ञान का दीप जलाता है और जीवन को नई दिशा देता है। इसलिए प्रत्येक व्यक्ति को अपने जीवन में गुरु के प्रति समर्पण, सेवा, विनम्रता और श्रद्धा का भाव बनाए रखना चाहिए।

गुरु पूर्णिमा महोत्सव के दौरान रामनिवास धाम में पूरे दिन धार्मिक अनुष्ठान, गुरु वंदना, रामधुन, भजन-कीर्तन और सत्संग का क्रम चलता रहा। श्रद्धालुओं ने गुरु चरणों में पुष्प अर्पित कर आशीर्वाद लिया तथा अपने परिवार और समाज की सुख-समृद्धि की मंगलकामना की।

रामनिवास धाम में उमड़ी आस्था ने एक बार फिर गुरु-शिष्य परंपरा की महत्ता को उजागर किया। श्रद्धालुओं का कहना था कि गुरु पूर्णिमा केवल एक पर्व नहीं, बल्कि गुरु के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का अवसर है। भव्य आयोजन ने श्रद्धा, समर्पण और सनातन संस्कृति की गौरवशाली गुरु परंपरा को नई ऊर्जा प्रदान की।

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