परमात्मा की कृपा पानी है तो राम भक्ति में मन समर्पित करना होगा: आचार्य रामदयालजी महाराज
भीलवाड़ा के रामद्वारा धाम में आयोजित चातुर्मास के दौरान मानस प्रवचन और भक्तमाल की कथा का समापन हुआ, जिसमें आचार्य श्रीरामदयालजी महाराज ने विचार व्यक्त किए।
भीलवाड़ा के रामद्वारा धाम में आयोजित विश्व शांति कल्याण चातुर्मास के समापन अवसर पर उपस्थित श्रद्धालु और आचार्य श्रीरामदयालजी महाराज।
भीलवाड़ा में रामद्वारा धाम में आयोजित विश्व शांति कल्याण चातुर्मास के तहत सोमवार को मानस प्रवचन और भक्तमाल की कथा का समापन हुआ। इस अवसर पर अंतरराष्ट्रीय रामस्नेही संप्रदाय शाहपुरा के पीठाधीश्वर जगद्गुरु आचार्य स्वामी श्रीरामदयालजी महाराज ने कहा कि परमात्मा की कृपा प्राप्त करने के लिए मन को रामभक्ति में समर्पित करना होगा। नवरात्रि के नौ दिन आराधना और भक्ति के काल हैं। भक्ति के सामने शक्ति को भी झुकना पड़ता है। महाप्रभु स्वामी रामचरणजी महाराज ने चिंतन प्रस्तुत किया कि सभी में ब्रह्म विद्यमान है। राम अंक हैं और अंक ब्रह्म हैं। अंतरराष्ट्रीय रामस्नेही संप्रदाय शब्द ब्रह्म का उपासक है। आचार्यश्री ने ये विचार सोमवार को दैनिक सत्संग में व्यक्त किए।
चातुर्मास के दौरान तीन महीने से जारी मानस प्रवचनों को पूर्ण करने वाले प्रखर वक्ता संत मनोरथरामजी आलोट को साधुवाद देते हुए आचार्यश्री ने कहा कि उन्होंने प्रवचनों के माध्यम से जन-जन के मानस को राममय बनाने का पुरुषार्थ किया। उन्होंने रामभक्ति का महत्व समझाते हुए कहा कि रावण जीवनभर राम का विरोधी बना रहा, लेकिन राम के प्रति उसका अनुराग किसी से कम नहीं था। राम का विरोध करना उसकी मजबूरी थी, क्योंकि उसे पता था कि राम का विरोध करने पर तीन जन्म में उद्धार प्राप्त हो जाएगा, जबकि प्रेम करने पर सात जन्म लग जाएंगे। इसी कारण उसने इतनी लंबी अवधि तक प्रतीक्षा करने के बजाय विरोध का मार्ग चुना।
आचार्य रामदयालजी महाराज ने कहा कि मनुष्य उसी से प्रेम और स्नेह करता है, जिससे उसका मन मिल जाता है। मन मिल जाए तो एक पलंग पर आठ-नौ लोग भी बैठ सकते हैं, लेकिन मन नहीं मिले तो दो व्यक्ति पूरे ब्रह्मांड में भी साथ नहीं रह सकते। विभीषण ने अपने मन को समझाया और राम की कृपा के पात्र बन गए, जबकि रावण अपने मन के अनुसार चला और उसका इतिहास अलग बन गया। उन्होंने कहा कि राम धर्म, उपासना, चरित्र और संस्कृति हैं, जबकि इसके ठीक विपरीत रावण विकृति का प्रतीक है, जिससे सदैव बचना चाहिए।
आचार्यश्री ने कहा कि समय गतिशील है और तीन महीने पहले प्रारंभ हुआ चातुर्मास अब समापन के दौर में पहुंच गया है। विजयादशमी और एकादशी पर दो दिन सुबह 9 बजे से चातुर्मासिक प्रवचन होंगे। चातुर्मास का विधिवत समापन 22 अक्टूबर को होगा। उन्होंने कहा कि भीलवाड़ा में उनका यह पांचवां चातुर्मास भक्ति से ओतप्रोत विभिन्न आयोजनों के लिए सदैव स्मरण किया जाएगा। इस चातुर्मास में श्रद्धालुओं को संपूर्ण भागवत का तत्वज्ञान प्राप्त हुआ। इसके साथ ही अनुभव वाणीजी के सत्संग, भव्य सामूहिक पाठ, मानस प्रवचन और भक्तमाल की कथा श्रवण का लाभ भी मिला।
आचार्यश्री से पूर्व अंतरराष्ट्रीय रामस्नेही संप्रदाय के प्रखर वक्ता संत मनोरथरामजी आलोट के चातुर्मासकाल में प्रतिदिन आयोजित होने वाले मानस प्रवचन का समापन हुआ। उन्होंने कहा कि मानस प्रवचन जीवन जीने की कला सिखाते हैं और बताते हैं कि कोई कितना भी शक्तिशाली और बलशाली क्यों न हो, अहंकार, अभिमान और प्रमाद उसके विनाश का कारण बनते हैं। वहीं, विभीषण की तरह बुराई का त्याग कर राम की शरण में जाने वालों के जीवन का कल्याण हो जाता है।
सत्संग में भीलवाड़ा सहित विभिन्न स्थानों से बड़ी संख्या में श्रद्धालु मौजूद रहे। सूर्यास्त के समय संध्या आरती के बाद रामस्नेही संप्रदाय के युवा संत रामजस ईडर द्वारा प्रतिदिन होने वाली भक्तमाल की कथा भी सोमवार को पूर्ण हुई। चातुर्मास के दौरान प्रतिदिन रामधुनी के साथ सुबह 8.30 से 9 बजे तक वाणीजी का पाठ किया जा रहा है। इसके बाद सुबह 9 बजे से दैनिक सत्संग आयोजित हो रहा है। मानस प्रवचन और भक्तमाल की कथा के समापन के साथ चातुर्मास के अंतिम चरण में धार्मिक आयोजनों का क्रम जारी है।