दीपावली पर 108 मंदिरों में एक साथ जलेंगे 51 हजार गोबर के दीये, सेवल मंदिर की अनूठी पहल
पर्यावरण संरक्षण और गौसेवा का संदेश देने के लिए सेवल मंदिर परिसर में तैयार किए जा रहे डेढ़ लाख दीये, श्रद्धालुओं को 21-21 दीये मुफ्त दिए जाएंगे।
महिला सेवल मंदिर परिसर डीग में गोबर से बने दीयों को पेंट कर रही है।
डीग/सीकरी। दीपावली पर इस बार क्षेत्र के 108 मंदिरों में एक साथ 51 हजार से अधिक गोबर के दीये प्रज्वलित किए जाएंगे। गौसंरक्षण, भारतीय संस्कृति और पर्यावरण संरक्षण का संदेश जन-जन तक पहुंचाने के उद्देश्य से सेवल मंदिर ने विशेष पहल शुरू की है। पिछले वर्ष की तरह इस वर्ष भी मंदिर परिसर में गाय के गोबर से डेढ़ लाख से अधिक दीये तैयार किए जा रहे हैं। दीपावली के दिन गोधूली बेला में सामूहिक दीपोत्सव का आयोजन होगा। इस पहल के तहत गांव-गांव तक गौमाता के धार्मिक एवं सांस्कृतिक महत्व और प्राकृतिक संसाधनों के सदुपयोग का संदेश पहुंचाया जाएगा। खास बात यह है कि सेवल मंदिर आने वाले प्रत्येक परिवार को 21 गोबर के दीये निःशुल्क भेंट किए जा रहे हैं।
दीये तैयार करने के लिए पारंपरिक विधि के साथ प्राकृतिक सामग्रियों का इस्तेमाल किया जा रहा है। इसके लिए 10 किलो गाय के गोबर में लगभग 100 ग्राम लकड़ी का बुरादा और 100 ग्राम ग्वार गम पाउडर मिलाया जाता है। लकड़ी का बुरादा और ग्वार गम बाइंडिंग एजेंट के रूप में काम करते हैं, जिससे दीये मजबूत और टिकाऊ बनते हैं। तैयार मिश्रण को अच्छी तरह गूंथने के बाद सांचों की सहायता से दीपकों का आकार दिया जाता है। इसके बाद हाथों से उनकी फिनिशिंग की जाती है।
सांचों में तैयार किए गए दीयों को लगभग तीन दिन तक धूप में सुखाया जाता है, ताकि उनमें मौजूद नमी निकल जाए और वे अच्छी तरह कठोर हो सकें। सूखने के बाद उनकी सफाई और सजावट की जाती है। इस वर्ष दीपकों को आकर्षक स्वरूप देने के लिए ऑर्गेनिक रंगों का उपयोग किया जा रहा है। इन रंगों से दीयों को सुंदर और पारंपरिक रूप दिया जा रहा है। इस तरह तैयार होने वाले दीपक दीपावली पर घरों और मंदिरों को रोशन करने के साथ प्राकृतिक उत्पादों के उपयोग को भी प्रोत्साहित करेंगे।
दीपावली के दिन इस अभियान का मुख्य आकर्षण गोधूली बेला में होने वाला सामूहिक दीपदान होगा। इसके तहत क्षेत्र के 108 मंदिरों में एक साथ 51 हजार से अधिक गोबर के दीये जलाए जाएंगे। अलग-अलग मंदिरों में एक ही समय पर हजारों दीपकों का प्रकाश भक्ति, श्रद्धा और सामूहिक सहभागिता का दृश्य प्रस्तुत करेगा। अभियान से आसपास के गांवों के मंदिरों और ग्रामीण परिवारों को भी जोड़ा जा रहा है। इसके साथ ही सेवल मंदिर आने वाले प्रत्येक परिवार को 21 दीये निःशुल्क दिए जाएंगे, ताकि श्रद्धालु अपने घरों में भी गोबर के दीपक जलाकर इस पहल में सहभागी बन सकें।
सेवल मंदिर से जुड़े जमना जीवन कृष्ण दास जी ने बताया कि भारतीय संस्कृति में गाय को माता का स्थान दिया गया है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, गाय के गोबर में लक्ष्मी जी का वास माना जाता है। इसी आध्यात्मिक भावना के साथ लोगों को दीपावली पर गोबर के दीयों से मां लक्ष्मी का पूजन करने के लिए प्रेरित किया जा रहा है। भगवान श्रीकृष्ण की लीलाओं में भी गौसेवा और गोपालन का विशेष महत्व रहा है। गौमाता भारतीय संस्कृति, ग्रामीण अर्थव्यवस्था और प्राकृतिक जीवनशैली का महत्वपूर्ण आधार हैं। ऐसे में गौमाता के गोबर से बने दीपकों का उपयोग श्रद्धा के साथ गौ आधारित जीवनशैली अपनाने का भी माध्यम है।
गोबर से बने इन दीपकों की एक खास विशेषता यह भी है कि दीपावली के बाद भी उनका उपयोग किया जा सकेगा। दीये जलने के बाद उन्हें गमलों में मिलाया जा सकता है, जहां वे जैविक खाद के रूप में काम आएंगे। इससे प्राकृतिक संसाधनों का पुनः उपयोग होगा और अनावश्यक कचरे को कम करने में मदद मिलेगी। इस पहल के माध्यम से लोगों को कृत्रिम सजावटी उत्पादों के बजाय प्राकृतिक विकल्प अपनाने और पर्यावरण के प्रति अपनी जिम्मेदारी समझने का संदेश दिया जा रहा है।
सेवल मंदिर की यह पहल दीपावली के पारंपरिक उत्सव को गौसेवा, आध्यात्मिक चेतना और पर्यावरण संरक्षण से जोड़ रही है। मंदिर प्रबंधन का उद्देश्य है कि दीपावली पर प्रज्वलित होने वाला प्रत्येक दीपक गौमाता के प्रति श्रद्धा, भारतीय संस्कृति के प्रति सम्मान और प्रकृति संरक्षण का संदेश जन-जन तक पहुंचाए।