भुसावर में पितृपक्ष पर जीवंत है सांझी परंपरा, गोबर-फूलों से बनती हैं आकृतियां
भाद्रपद पूर्णिमा से आश्विन अमावस्या तक चलने वाले इस 16 दिवसीय पर्व में कन्याएं और महिलाएं सुख-समृद्धि की कामना से सांझी पूजती हैं।
तस्वीर में दो महिलाएं घर के भीतर पारंपरिक सांझी कलाकृति के समक्ष पूजा करती दिख रही हैं।
भुसावर सहित उपखण्ड मुख्यालय क्षेत्र के ग्रामीण अंचल में पितृपक्ष (श्राद्ध) के दौरान सांझी सजाने का प्रचलन आज भी कायम है। भारतीय लोक कला, लोकगीत और संस्कृति-परंपरा का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाने वाला सांझी पर्व 16 दिनों तक गोधूलि बेला में मनाया जाता है। इस दौरान गाय के गोबर से सांझी की आकृतियां बनाकर प्रतिदिन लोकगीत गाते हुए पूजा-अर्चना की जाती है।
सांझी पर्व मुख्य रूप से भारत के उत्तरी और पश्चिमी राज्यों जैसे पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश के विशेषकर ब्रज प्रदेश, राजस्थान तथा मध्य प्रदेश के मालवा और निमाड़ के साथ दिल्ली में मनाया जाता है। सांझी का अर्थ एक लोक कला और पूजा-अर्चना के पर्व से है, जिसे गोधूलि बेला यानी संध्या समय में बनाया जाता है।
सांझी बनाने में गाय के गोबर, अनाज के दाने, रंग-बिरंगे फूल और कटी हुई हरी पत्तियों के साथ गोटा, सितारे, कुमकुम, कौड़ियां और मोर पंख का उपयोग किया जाता है। घर के बाहर आंगन में पितृपक्ष श्राद्ध शुरू होने पर भाद्रपद मास की पूर्णिमा से लेकर आश्विन मास की अमावस्या तक 16 दिनों तक प्रतिदिन अलग-अलग आकृतियां बनाई जाती हैं। इनमें चंदा, सूरज, ध्वज, चौपड़, मोर, मोरनी, केला के पेड़ के साथ बंदर बार जैसी आकृतियां शामिल हैं।
महिला भक्त मंडल की सदस्य श्रद्धालु लक्ष्मी शर्मा, ममता और चंचल जति, अन्तिमा ने बताया कि पितृपक्ष, श्राद्ध में मनाया जाने वाला यह पर्व अलग-अलग स्थानों पर सांझी, संजा और संझा के नाम से जाना जाता है। श्राद्ध पक्ष में पितरों को नमन करने का कार्य पुरुष ही नहीं, बल्कि घर की कन्याएं भी सांझी के माध्यम से करती हैं।
सांझी को मातृ देवी का प्रतीक मां दुर्गा अथवा पार्वती जी के रूप में सामूहिक पूजा-अर्चना की जाती है। इस दौरान लोकगीत गाए जाते हैं और सांझी की आरती के बाद प्रसादी का वितरण किया जाता है।
भक्त मंडल की सदस्य पुष्पा, रेनू और कल्पना, अन्नू ने बताया कि सांझी बनाने का उत्सव श्राद्ध पितृपक्ष के दौरान शुरू होता है और 16 दिनों तक अनवरत चलता है। प्रतिदिन तिथि के अनुसार अलग-अलग आकृतियां बनाई जाती हैं।
सांझी सजाने का प्रचलन ब्रजमंडल और भगवान श्रीकृष्ण की लीलाओं से भी जुड़ा हुआ है। इसमें श्रीकृष्ण और राधा के प्रेम को गाय के गोबर से दीवार के भित्ती चित्रों पर दर्शाया जाता है। शारदीय नवरात्रि की पूर्व संध्या पर चतुर्दशी (चौदस) को हाथी, घोड़ा, राजा-रानी और कोट की आकृति बनाकर पूजा-अर्चना की जाती है। कुंवारी कन्याएं सुंदर, सुशील वर प्राप्त करने की कामना करती हैं, जबकि महिलाएं परिवार में सुख-शांति, समृद्धि और खुशहाली की मनोकामना मांगती हैं।
मान्यता के अनुसार भगवान शिव को पाने के लिए माता पार्वती जी ने श्राद्ध पक्ष में 16 दिनों तक सांझी पर्व मनाया था। तभी से सांझी सजाने का प्रचलन चला आ रहा है। भुसावर सहित ग्रामीण अंचल में आज भी यह परंपरा लोकगीत, पूजा-अर्चना और सांझी की कलात्मक आकृतियों के साथ अपनी सांस्कृतिक पहचान को जीवंत बनाए हुए है।