समाज की सामूहिक शक्ति का संगठित स्वरूप है संघ, रणदीप बिसने ने विजयादशमी उत्सव में किया आह्वान
महाराष्ट्र के समुद्रपूर में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का विजयादशमी उत्सव आयोजित हुआ। विद्या भारती के रणदीप बिसने ने संघ के शताब्दी वर्ष, संगठन की भूमिका, सामाजिक जिम्मेदारी और समाज परिवर्तन में नागरिकों की भागीदारी पर विचार रखे।
महाराष्ट्र के समुद्रपूर में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की ओर से आयोजित विजयादशमी उत्सव में मंच पर उपस्थित अतिथिगण.
महाराष्ट्र के समुद्रपूर में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की ओर से आयोजित विजयादशमी उत्सव में विद्या भारती विदर्भ प्रांत के सहमंत्री रणदीप बिसने ने कहा कि संघ समाज से अलग कोई संगठन नहीं, बल्कि समाज की सामूहिक शक्ति का संगठित स्वरूप है। समाज का प्रत्येक व्यक्ति महत्वपूर्ण है और उसकी समस्याओं को समझकर उनका समाधान तलाशना ही संघकार्य का मूल उद्देश्य है। उन्होंने लोगों से संघ को अलग संगठन मानने के बजाय अपना समझकर उसके कार्यों में सक्रिय भागीदारी निभाने का आह्वान किया।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, समुद्रपूर खंड की ओर से आयोजित इस विजयादशमी उत्सव में बिसने मुख्य वक्ता के रूप में संबोधित कर रहे थे। कार्यक्रम में संघ के खंड संघचालक रवी गाठे और प्रमुख अतिथि के रूप में शंकरराव आत्राम मंच पर उपस्थित थे।
अपने संबोधन में रणदीप बिसने ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना और उसके संगठनात्मक सफर का उल्लेख किया। उन्होंने बताया कि संघ के संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने तत्कालीन सामाजिक परिस्थितियों, हिंदू समाज के सामने मौजूद चुनौतियों, समाज में विघटन और संगठन शक्ति की कमी को देखते हुए 1925 में विजयादशमी के दिन संघ की स्थापना की थी। व्यक्तिनिर्माण के माध्यम से समाज परिवर्तन और समाज परिवर्तन के जरिए राष्ट्रनिर्माण का विचार संघकार्य के केंद्र में रहा है।
उन्होंने संघ के नेतृत्व की ऐतिहासिक यात्रा का भी उल्लेख किया। डॉ. हेडगेवार के बाद द्वितीय सरसंघचालक माधव सदाशिव गोलवलकर (श्रीगुरुजी), तृतीय सरसंघचालक मधुकर दत्तात्रय देवरस (बालासाहेब देवरस), चतुर्थ सरसंघचालक प्रा. राजेंद्रसिंह (रज्जूभैया), पंचम सरसंघचालक के. एस. सुदर्शन और वर्तमान सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत के नेतृत्व में संघ का कार्य आगे बढ़ता रहा। प्रत्येक कालखंड की सामाजिक परिस्थितियों और चुनौतियों को ध्यान में रखते हुए संघ के कार्यक्षेत्र का विस्तार किया गया और कार्यपद्धति में आवश्यक बदलाव किए गए।
बिसने ने कहा कि संघ का शताब्दी वर्ष केवल उत्सवों और कार्यक्रमों तक सीमित रहने का अवसर नहीं है, बल्कि अब तक किए गए कार्यों का आत्मपरीक्षण करने और भविष्य की सामाजिक जिम्मेदारियां तय करने का समय है। स्वयंसेवकों ने अब तक अनुशासन, संगठन, राष्ट्रभक्ति और व्यक्तिगत चरित्र के आधार पर कार्य किया है। इन मूल्यों को आगामी पीढ़ी में स्थापित करना समय की आवश्यकता है।
उन्होंने कहा कि संघ समाज से अलग कोई व्यवस्था नहीं, बल्कि समाज का अभिन्न हिस्सा है। इसलिए समाज को संघकार्य के प्रति अपनापन रखते हुए सामाजिक परिवर्तन की प्रक्रिया में सक्रिय भागीदारी करनी चाहिए। वर्तमान की समस्याओं का समाधान तलाशने के साथ भविष्य की चुनौतियों को समझकर सक्षम, संस्कारित और संगठित समाज का निर्माण करना सभी का सामूहिक दायित्व है।
कार्यक्रम की शुरुआत स्वयंसेवकों की ओर से सुभाषित, अमृतवचन, संघगीत और व्यक्तिगत गीत की प्रस्तुति के साथ हुई। इसके बाद स्वयंसेवकों ने शारीरिक प्रात्यक्षिकों का प्रदर्शन किया।
इस अवसर पर कमलाकर भुरे, प्रा. मेघश्याम ढाकरे, मंडल अध्यक्ष शेषराव तुळणकार, पूर्व नगराध्यक्ष गजानन राऊत, मधुकर सोनारे सहित आसपास के विभिन्न क्षेत्रों के गणमान्य व्यक्ति, नागरिक और स्वयंसेवक बड़ी संख्या में उपस्थित रहे। गणवेशधारी स्वयंसेवकों की भी उल्लेखनीय भागीदारी रही। उत्साहपूर्ण माहौल में समुद्रपूर खंड का विजयादशमी उत्सव संपन्न हुआ।