यूपी बोर्ड के आदेश बेअसर! उतरौला के स्कूलों में महँगी अनधिकृत किताबों से अभिभावकों पर बढ़ा आर्थिक बोझ
यूपी बोर्ड के सख्त निर्देशों के बावजूद बलरामपुर के उतरौला क्षेत्र के कई माध्यमिक विद्यालयों में कथित तौर पर महँगी और अनधिकृत किताबें चलाए जाने का मामला सामने आया है। अभिभावकों ने आकस्मिक निरीक्षण और दोषी स्कूलों पर कड़ी कार्रवाई की मांग उठाई है।
बलरामपुर (उतरौला): शैक्षिक सत्र 2026-27 की शुरुआत के साथ ही स्कूलों में किताबों को लेकर अभिभावकों की चिंताएँ बढ़ने लगी हैं। उत्तर प्रदेश माध्यमिक शिक्षा परिषद् (यूपी बोर्ड) द्वारा जारी सख्त निर्देशों के बावजूद, बलरामपुर जिले के उतरौला तहसील क्षेत्र के कई माध्यमिक विद्यालयों में कथित तौर पर अनधिकृत और महँगी पुस्तकें चलाए जाने का मामला सामने आया है। इससे कक्षा 9वीं से 12वीं तक के छात्र-छात्राओं के अभिभावकों पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ पड़ रहा है।
यूपी बोर्ड के सचिव द्वारा जारी आधिकारिक पत्र के अनुसार, विद्यालयों में केवल बोर्ड द्वारा अधिकृत प्रकाशकों की सस्ती और प्रामाणिक पुस्तकें ही चलाई जा सकती हैं। किसी भी स्कूल द्वारा छात्रों को बाहरी अनधिकृत महँगी पुस्तकें या गाइड खरीदने के लिए बाध्य करना पूरी तरह प्रतिबंधित है। शासन की मंशा के अनुसार इस व्यवस्था की पुष्टि के लिए अप्रैल और जुलाई माह में सघन जाँच अभियान चलाए जाने के निर्देश दिए गए थे। इसके साथ ही चालू माह में 15 जुलाई 2026 तक सभी जनपदों में सघन निरीक्षण कर दोषी संस्थाओं पर कड़ी कार्रवाई का प्रारूप भी तय किया गया था।
हालांकि, स्थानीय अभिभावकों और जागरूक नागरिकों का कहना है कि धरातल पर उचित और कड़े निरीक्षण के अभाव में कुछ विद्यालय मनमानी पर उतारू हैं। परिषद की सस्ती किताबों के स्थान पर निजी प्रकाशकों की महँगी किताबें धड़ल्ले से चलाई जा रही हैं। चूंकि सत्र शुरू हो चुका है और बच्चों की पढ़ाई प्रभावित न हो, इसलिए अभिभावक मजबूरी में महँगी पुस्तकें खरीदने को विवश हैं। इससे आम परिवारों पर अनावश्यक वित्तीय दबाव लगातार बढ़ता जा रहा है।
मामले को लेकर क्षेत्र के नागरिकों और अभिभावकों ने प्रशासन से मांग की है कि उतरौला तहसील के माध्यमिक विद्यालयों का तत्काल आकस्मिक निरीक्षण (Surprise Inspection) कराया जाए। यदि नियमों की अनदेखी कर अनधिकृत पुस्तकें बेची या पढ़ाई जा रही हैं, तो संबंधित स्कूलों के खिलाफ माध्यमिक शिक्षा अधिनियम के तहत त्वरित व कठोर कानूनी कार्रवाई की जाए। अभिभावकों का कहना है कि बोर्ड के स्पष्ट निर्देशों के बावजूद यदि ऐसी अनियमितताओं पर समय रहते प्रभावी कार्रवाई नहीं हुई, तो आम परिवारों पर बढ़ता आर्थिक बोझ और शिक्षा व्यवस्था की पारदर्शिता दोनों गंभीर सवालों के घेरे में आ जाएंगे।