एटा के पॉक्सो मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट से राहत मिलने के बाद वकील बात करते हुए.   

एटा के जसरथपुर थाना क्षेत्र में दर्ज POCSO मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पुलिस की गिरफ्तारी प्रक्रिया में गंभीर कानूनी खामी पाते हुए 25 वर्षीय आरोपी नदीम खान को राहत दी है। अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी व्यक्ति को गिरफ्तार करने की कानूनी शक्ति होना अपने आप में गिरफ्तारी को उचित नहीं ठहराता। गिरफ्तारी के लिए पुलिस को स्पष्ट और विशिष्ट आधार बताने होंगे, ताकि आरोपी को यह समझने का अवसर मिले कि उसके खिलाफ कार्रवाई क्यों की गई है और वह अपनी रिहाई या जमानत के लिए प्रभावी तरीके से न्यायालय का रुख कर सके।

न्यायमूर्ति अतुल श्रीधरन और न्यायमूर्ति अचल सचदेव की खंडपीठ ने मामले की सुनवाई के दौरान गिरफ्तारी मेमो की जांच की। अदालत ने पाया कि गिरफ्तारी के आधार से संबंधित छह श्रेणियों में से केवल एक में ठोस विवरण दर्ज किया गया था, जबकि बाकी पांच स्थानों पर विवेचक ने संबंधित सामग्री केस डायरी में उपलब्ध होने का उल्लेख किया था। हाईकोर्ट ने इस प्रक्रिया को पर्याप्त नहीं माना और कहा कि गिरफ्तारी के आधार को स्पष्ट किए बिना केवल केस डायरी का हवाला देना कानूनी आवश्यकता पूरी नहीं करता।

मामले में अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि गिरफ्तारी के बाद आरोपी को न्यायिक हिरासत में भेज देना पहले हुई गैरकानूनी गिरफ्तारी को वैध नहीं बना सकता। हाईकोर्ट के आदेश के बाद एटा की विशेष POCSO अदालत ने आरोपी की रिहाई के लिए संबंधित जिला जेल को बिना देरी रिलीज वारंट जारी करने का निर्देश दिया।

पड़ोसी की शिकायत पर 10 जुलाई 2026 को दर्ज हुआ था मुकदमा

मामला एटा जिले के जसरथपुर थाना क्षेत्र का है। पुलिस के मुताबिक, 10 जुलाई 2026 को आरोपी नदीम खान के खिलाफ उसके पड़ोसी की शिकायत पर मुकदमा दर्ज किया गया था। शिकायत में पड़ोसी ने आरोप लगाया था कि नदीम खान ने उसकी बेटी के साथ अभद्र व्यवहार किया।

प्रारंभ में पुलिस ने भारतीय न्याय संहिता यानी BNS की धारा 74, 316(2), 352 और 351(1) के तहत मुकदमा दर्ज किया था। विवेचना के दौरान पुलिस को पता चला कि शिकायतकर्ता की बेटी नाबालिग है। इसके बाद मामले में POCSO एक्ट की धाराएं भी जोड़ दी गईं। पुलिस ने आरोपी को गिरफ्तार कर न्यायिक हिरासत में भेज दिया।

विशेष POCSO अदालत से राहत नहीं मिलने पर हाईकोर्ट पहुंचे आरोपी

गिरफ्तारी को चुनौती देने के लिए आरोपी की ओर से अधिवक्ता प्रशांत पुंडीर ने इलाहाबाद हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की। इससे पहले आरोपी ने विशेष POCSO अदालत में राहत की मांग की थी, लेकिन वहां से राहत नहीं मिलने के बाद हाईकोर्ट का रुख किया गया।

याचिका पर सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने पुलिस की ओर से तैयार किए गए गिरफ्तारी मेमो की जांच की। इसमें गिरफ्तारी के आधार दर्ज करने के तरीके में महत्वपूर्ण कानूनी कमी सामने आई।

गिरफ्तारी मेमो के छह में से पांच स्थानों पर केवल केस डायरी का हवाला

अदालत ने पाया कि गिरफ्तारी मेमो में गिरफ्तारी के आधार से संबंधित छह श्रेणियां थीं, लेकिन पुलिस ने केवल एक श्रेणी में ठोस विवरण दर्ज किया था। बाकी पांच स्थानों पर विवेचक ने सिर्फ यह लिखा था कि संबंधित सामग्री केस डायरी में उपलब्ध है।

हाईकोर्ट के अनुसार, केस डायरी में सामग्री मौजूद होने का उल्लेख करना गिरफ्तारी के विशिष्ट आधार बताने के बराबर नहीं है। गिरफ्तारी मेमो में ऐसे तथ्य दर्ज होने चाहिए, जिनसे आरोपी को स्पष्ट रूप से पता चल सके कि उसे गिरफ्तार करने का निर्णय किन परिस्थितियों और साक्ष्यों के आधार पर लिया गया।

बेटी के बयान का हवाला दिया, लेकिन गिरफ्तारी की जरूरत स्पष्ट नहीं की

पुलिस ने गिरफ्तारी के आधार के रूप में शिकायतकर्ता की बेटी के बयान का हवाला दिया था। हालांकि, हाईकोर्ट ने पाया कि पुलिस पर्याप्त रूप से यह स्पष्ट नहीं कर सकी कि आरोपी को तत्काल गिरफ्तार करना क्यों जरूरी था और ऐसी कौन-सी विशिष्ट सामग्री उपलब्ध थी, जिसके कारण गिरफ्तारी आवश्यक हो गई।

अदालत के मुताबिक, गिरफ्तारी मेमो में संक्षेप में यह बताया जाना चाहिए था कि जांच के दौरान कौन-से साक्ष्य सामने आए, कौन-सी सामग्री बरामद या जब्त की जानी थी और किन परिस्थितियों में आरोपी की गिरफ्तारी जरूरी समझी गई। इन विवरणों के अभाव में गिरफ्तारी के आधार पर्याप्त रूप से स्पष्ट नहीं हुए।

BNSS की धारा 47 का उल्लेख, आरोपी को आधार बताना जरूरी

हाईकोर्ट ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता यानी BNSS की धारा 47 का उल्लेख करते हुए कहा कि गिरफ्तार किए गए व्यक्ति को उसकी गिरफ्तारी के आधार की पूरी जानकारी दी जानी चाहिए। अदालत ने स्पष्ट किया कि गिरफ्तारी के आधार केवल औपचारिकता निभाने के लिए दर्ज नहीं किए जा सकते, बल्कि उनमें ऐसे विशिष्ट तथ्य होने चाहिए, जिनसे आरोपी समझ सके कि उसके खिलाफ गिरफ्तारी की कार्रवाई क्यों की गई है।

अदालत ने कहा कि इस कानूनी व्यवस्था का उद्देश्य आरोपी को अपने अधिकारों का प्रभावी ढंग से इस्तेमाल करने का अवसर देना है। गिरफ्तारी के आधार स्पष्ट होने से आरोपी अपनी रिहाई या जमानत के लिए न्यायालय के समक्ष प्रभावी तरीके से पक्ष रख सकता है।

हाईकोर्ट की टिप्पणी- गिरफ्तारी की शक्ति होना पर्याप्त नहीं

सुनवाई के दौरान खंडपीठ ने गिरफ्तारी करने की कानूनी शक्ति और किसी व्यक्ति को वास्तव में गिरफ्तार करने की आवश्यकता के बीच अंतर स्पष्ट किया। अदालत ने कहा कि पुलिस के पास किसी व्यक्ति को गिरफ्तार करने की शक्ति होना अपने आप में गिरफ्तारी को उचित नहीं ठहराता।

हाईकोर्ट ने टिप्पणी की, “The power to arrest does not justify an arrest.” इसका अर्थ है कि गिरफ्तार करने की शक्ति अपने आप में गिरफ्तारी को जायज नहीं बनाती। अदालत की इस टिप्पणी में गिरफ्तारी की प्रक्रिया के दौरान कानूनी प्रावधानों का पालन करने और कार्रवाई के ठोस आधार दर्ज करने की आवश्यकता पर जोर दिया गया।

न्यायिक रिमांड से दूर नहीं होती गिरफ्तारी की कानूनी खामी

हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि गिरफ्तारी की प्रक्रिया कानून के अनुरूप नहीं अपनाई गई है, तो बाद में आरोपी को न्यायिक हिरासत में भेज देने से शुरुआती खामी दूर नहीं हो जाती। पुलिस को गिरफ्तारी के समय ही कानून में निर्धारित सुरक्षा उपायों का पालन करना होगा और आरोपी को गिरफ्तारी के वास्तविक एवं स्पष्ट आधार बताने होंगे।

अदालत ने गिरफ्तारी मेमो में दर्ज विवरणों को कानूनी सुरक्षा प्रावधानों के अनुरूप पर्याप्त नहीं माना। इसी आधार पर आरोपी को राहत मिली।

हाईकोर्ट के आदेश के बाद जारी हुआ रिहाई वारंट

हाईकोर्ट के आदेश के बाद आरोपी की ओर से एटा की विशेष POCSO अदालत में रिहाई के लिए आवेदन प्रस्तुत किया गया। विशेष अदालत ने आवेदन स्वीकार करते हुए संबंधित जिला जेल को आरोपी की रिहाई के लिए बिना देरी रिलीज वारंट जारी करने का निर्देश दिया।

इस प्रकार गिरफ्तारी के आधार स्पष्ट रूप से दर्ज नहीं किए जाने से जुड़ी कानूनी खामी के आधार पर नदीम खान को राहत मिली। मामले में हाईकोर्ट की टिप्पणी पुलिस की गिरफ्तारी प्रक्रिया के लिए महत्वपूर्ण है। अदालत ने स्पष्ट किया कि POCSO जैसे संवेदनशील मामलों में अपराध की गंभीरता के बावजूद गिरफ्तारी कानून के निर्धारित प्रावधानों और आरोपी के संवैधानिक अधिकारों के अनुरूप ही होनी चाहिए।

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