एटा: अलीगंज सीएचसी में आशाओं से वसूली मामले में 7 संगिनियां बर्खास्त
अलीगंज सीएचसी में 301 आशा कार्यकत्रियों से प्रतिमाह 2000 रुपये वसूली के आरोप में डीएम के निर्देश पर कार्रवाई, डॉक्टर तक रकम पहुंचने की भी हो रही जांच।
अलीगंज तहसील में संपूर्ण समाधान दिवस के दौरान डीएम एम. अरुन्मोली शिकायत सुनती हुईं.
एटा के अलीगंज सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (सीएचसी) से जुड़ी आशा कार्यकत्रियों से कथित तौर पर हर महीने 2,000 रुपये वसूले जाने के मामले में सात आशा संगिनियों के निष्कासन के बाद जांच के दायरे और आगे की कानूनी कार्रवाई को लेकर सवाल उठ रहे हैं। सीएचसी अलीगंज क्षेत्र में कुल 301 आशा कार्यकत्रियां बताई गई हैं। शिकायत में लगाए गए आरोप के आधार पर यदि प्रत्येक आशा से हर महीने 2,000 रुपये लिए जाने की गणना की जाए तो संभावित रकम 6 लाख 2 हजार रुपये प्रतिमाह और 72 लाख 24 हजार रुपये सालाना बैठती है। हालांकि, यह गणितीय अनुमान है। वास्तव में कितनी आशाओं से रकम ली गई, कितने समय तक कथित वसूली हुई और कुल कितनी धनराशि एकत्र की गई, इसकी पुष्टि जांच से ही हो सकती है।
जिलाधिकारी एम. अरुन्मोली के निर्देश पर कराई गई जांच के बाद सात आशा संगिनियों के निष्कासन के आदेश जारी किए गए हैं। लेकिन आशा कार्यकत्रियों ने अपनी शिकायत में कथित रकम डॉक्टर तक पहुंचने का भी आरोप लगाया था। ऐसे में यह सवाल उठ रहा है कि जांच केवल रकम लेने के आरोप तक सीमित रही या कथित लेन-देन की पूरी कड़ी की भी पड़ताल की गई। मामले में एफआईआर दर्ज होने और पुलिस कार्रवाई की स्थिति भी स्पष्ट नहीं है।
301 आशाओं के आधार पर 6.02 लाख रुपये मासिक का गणित
सीएचसी अलीगंज क्षेत्र में कुल 301 आशा कार्यकत्रियां कार्यरत बताई गई हैं। आशाओं ने आरोप लगाया था कि उनसे हर महीने 2,000 रुपये की मांग की जाती है और रुपये नहीं देने पर भुगतान रोकने की बात कही जाती है।
शिकायत में लगाए गए आरोप के आधार पर प्रत्येक आशा से 2,000 रुपये प्रतिमाह लेने की स्थिति में एक महीने की संभावित कुल रकम 6,02,000 रुपये और 12 महीने की संभावित कुल रकम 72,24,000 रुपये होगी। यानी सालाना संभावित रकम 72 लाख 24 हजार रुपये बैठती है।
यह आंकड़ा सभी 301 आशाओं से हर महीने धनराशि लिए जाने की स्थिति पर आधारित है, न कि प्रमाणित वसूली का विवरण। वास्तविक रकम का पता लगाने के लिए यह जांचना जरूरी होगा कि कितनी आशाओं से धनराशि ली गई, कितने महीनों तक ली गई और पैसा किसके पास पहुंचा।
17 अक्टूबर को 100 से अधिक आशाओं ने डीएम को सौंपा था सामूहिक शिकायती पत्र
17 अक्टूबर 2026 को अलीगंज तहसील में आयोजित संपूर्ण समाधान दिवस के दौरान 100 से अधिक आशा कार्यकत्रियों ने जिलाधिकारी एम. अरुन्मोली को सामूहिक शिकायती पत्र सौंपा था। शिकायत में कथित वसूली, भुगतान नहीं किए जाने का दबाव बनाने और निर्धारित जिम्मेदारियों के अतिरिक्त काम कराने के आरोप लगाए गए थे।
शिकायती पत्र पर सुशीला देवी, पारुल, मनोज, अनीता, विनीता, सुलेखा, सपना, कुसुम, शिल्पी, रेखा, विमलेश, उषा, बीना, मिथिलेश, प्रीति, रेनू, उषा देवी और लता सहित बड़ी संख्या में आशा कार्यकत्रियों ने हस्ताक्षर किए थे।
आशाओं का कहना था कि वे ग्रामीण क्षेत्रों में गर्भवती महिलाओं, नवजात शिशुओं और अन्य लाभार्थियों तक स्वास्थ्य सेवाएं पहुंचाने का काम करती हैं। इसके बावजूद उन पर अतिरिक्त कार्य का दबाव बनाया जाता है और कथित तौर पर रकम की मांग की जाती है।
पारुल और शशि ने डॉक्टर तक रकम पहुंचने का लगाया था आरोप
संपूर्ण समाधान दिवस के दौरान आशा पारुल और आशा शशि ने जिलाधिकारी के सामने आरोप लगाया था कि उनसे हर महीने 2,000 रुपये लिए जाते हैं। उनका दावा था कि यह रकम आशा संगिनी के माध्यम से डॉक्टर तक पहुंचाई जाती है।
शिकायत में लगाए गए इस आरोप के बाद कथित लेन-देन की पूरी कड़ी की जांच को लेकर सवाल उठ रहे हैं। यह स्पष्ट होना जरूरी है कि जांच के दौरान संबंधित लोगों के बयान लिए गए या नहीं, कथित रकम की अवधि का पता लगाने का प्रयास हुआ या नहीं और धनराशि के कथित गंतव्य की पड़ताल किस स्तर तक की गई।
फिलहाल डॉक्टरों तक रकम पहुंचाए जाने के आरोप की स्वतंत्र पुष्टि सामने नहीं आई है। जांच के निष्कर्ष के बिना किसी चिकित्सक या अधिकारी की संलिप्तता को प्रमाणित तथ्य नहीं माना जा सकता।
जांच के बाद सात आशा संगिनियां बर्खास्त, सीएमओ कार्यालय ने जारी किए आदेश
जिलाधिकारी के निर्देश पर मुख्य चिकित्सा अधिकारी डॉ. राजेंद्र प्रसाद की ओर से शिकायत की जांच कराई गई। उपलब्ध कार्रवाई संबंधी जानकारी के अनुसार, जांच में धनराशि लिए जाने के मामले में सात आशा संगिनियों को दोषी पाए जाने की बात कही गई। इसके बाद जिलाधिकारी/अध्यक्ष, जिला स्वास्थ्य समिति एटा के अनुमोदन से उनके निष्कासन के आदेश जारी किए गए।
कार्रवाई की जद में आईं सात आशा संगिनियों में श्रीमती शीला देवी, श्रीमती रंजीता, श्रीमती मधु देवी, श्रीमती रीना देवी, श्रीमती सुनीता देवी, श्रीमती विमलेश पाल और श्रीमती पुष्पा देवी शामिल हैं। सभी सात आशा संगिनियां सीएचसी अलीगंज से संबद्ध थीं।
आदेशों की प्रतियां राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन, उत्तर प्रदेश सहित संबंधित अधिकारियों को आवश्यक कार्रवाई के लिए भेजे जाने की जानकारी दी गई है।
हालांकि, निष्कासन की कार्रवाई के बाद भी जांच रिपोर्ट में कथित वसूली की कुल रकम, प्रभावित आशाओं की संख्या और अन्य संभावित जिम्मेदार लोगों की भूमिका को लेकर क्या निष्कर्ष निकाला गया, यह स्पष्ट होना बाकी है।
कथित वसूली लंबे समय से चल रही थी तो निगरानी किसकी थी?
आशाओं की शिकायत के बाद सीएचसी स्तर पर निगरानी व्यवस्था को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। यदि नियमित तौर पर रकम मांगे जाने का आरोप है तो यह जानना जरूरी है कि संबंधित अधिकारियों को इसकी जानकारी थी या नहीं। क्या पहले भी इस तरह की शिकायतें मिली थीं? क्या आशाओं के भुगतान और आशा संगिनियों की कार्यप्रणाली की नियमित समीक्षा की जाती थी?
इन सवालों का जवाब जांच रिकॉर्ड और संबंधित अधिकारियों के पक्ष के आधार पर ही दिया जा सकता है। शिकायत में डॉक्टर तक रकम पहुंचने का आरोप शामिल होने के कारण जांच का दायरा और उसके निष्कर्ष स्पष्ट होना महत्वपूर्ण है।
अब यह भी स्पष्ट होना बाकी है कि कार्रवाई केवल कथित रकम लेने के आरोप में दोषी पाई गई सात संगिनियों तक सीमित रही या पूरी व्यवस्था की जांच की गई। यदि जांच में किसी अन्य व्यक्ति की भूमिका सामने आई है तो उसके खिलाफ की गई कार्रवाई की जानकारी भी सामने आनी चाहिए।
विभागीय कार्रवाई के बाद एफआईआर दर्ज हुई या नहीं?
मामले में सात आशा संगिनियों के निष्कासन के आदेश जारी होने की जानकारी सामने आई है, लेकिन एफआईआर दर्ज होने की स्थिति स्पष्ट नहीं है। ऐसे में सवाल है कि क्या जांच के निष्कर्ष पुलिस को भेजे गए, क्या किसी संभावित दंडनीय अपराध के संबंध में पुलिस को शिकायत दी गई और यदि ऐसा नहीं हुआ तो इसके पीछे क्या कारण हैं।
विभागीय निष्कासन और आपराधिक कार्रवाई अलग-अलग प्रक्रियाएं हैं। किसी कर्मचारी को पद से हटाया जाना अपने आप में एफआईआर दर्ज होने का प्रमाण नहीं है। इसी तरह, एफआईआर दर्ज नहीं होने की स्थिति में भी कारणों की जानकारी के बिना किसी अधिकारी की मंशा पर निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा।
यदि जांच में जबरन धन लेने या किसी अन्य दंडनीय अपराध के पर्याप्त तथ्य सामने आए हैं तो सक्षम अधिकारियों को कानून के अनुसार आगे की कार्रवाई पर निर्णय लेना होगा। इस प्रक्रिया में जांच रिपोर्ट, शिकायत से जुड़े साक्ष्य और संबंधित पक्षों के बयान महत्वपूर्ण होंगे।
जिला प्रशासन से इन सवालों पर स्पष्ट जवाब की जरूरत
सात आशा संगिनियों पर कार्रवाई के बाद मामले में कई अहम बिंदुओं पर स्थिति स्पष्ट होना बाकी है। क्या सभी 301 आशाओं से हर महीने 2,000 रुपये लिए जाने का आरोप जांच में सत्यापित हुआ? कथित वसूली कितने समय से चल रही थी और कुल कितनी रकम एकत्र होने के प्रमाण मिले? डॉक्टर तक रकम पहुंचाने के आरोप की जांच में क्या निष्कर्ष निकला? क्या चिकित्साधीक्षक या अन्य संबंधित अधिकारियों की भूमिका की पड़ताल की गई? क्या जांच रिपोर्ट पुलिस को भेजी गई और एफआईआर दर्ज कराने के संबंध में कोई कदम उठाया गया? सात संगिनियों के निष्कासन के अलावा आगे की कार्रवाई की क्या स्थिति है?
इन सवालों के जवाब जांच रिपोर्ट और जिला प्रशासन के आधिकारिक पक्ष से ही सामने आ सकते हैं।
अलीगंज में आशा कार्यकत्रियों की सामूहिक शिकायत के बाद सात संगिनियों के निष्कासन की कार्रवाई हुई है। लेकिन शिकायत में डॉक्टर तक रकम पहुंचने, भुगतान को लेकर दबाव बनाने और कथित वसूली के लंबे समय तक जारी रहने जैसे आरोप भी शामिल थे। इसलिए जांच के दायरे और निष्कर्षों को स्पष्ट करना जरूरी है।
301 आशाओं की संख्या के आधार पर 6.02 लाख रुपये प्रतिमाह और 72.24 लाख रुपये सालाना का अनुमान सामने आता है, लेकिन वास्तविक वसूली की रकम जांच से ही प्रमाणित होगी। अब मामले की आगे की दिशा इस बात पर निर्भर करेगी कि जांच कथित रकम लेने के आरोप में दोषी पाई गई सात संगिनियों तक सीमित रहती है या कथित लेन-देन की पूरी कड़ी, संबंधित अधिकारियों की भूमिका और संभावित आपराधिक पहलुओं की भी पड़ताल की जाती है।