उदयपुर से आसारवा चलने वाली वंदे भारत ट्रेन को सूरत तक बढ़ाने की घोषणा के बाद मेवाड़ की रेल मांग को लेकर सवाल उठने लगे हैं। इस घोषणा को मेवाड़ की पुरानी रेल मांग के बीच एक और “झुनझुना” बताते हुए कहा गया है कि जनता अब केवल घोषणाओं के बजाय काम और परिणाम चाहती है।

सवाल उठाया गया है कि अगर अहमदाबाद में काम चालू था, तो फिर यह काम कहां गया? वहीं, अगर ट्रेन को सूरत तक ले जाना ही था, तो इसकी शुरुआत मुंबई से क्यों नहीं की गई? इसे लेकर सवाल है कि यह रेल सुविधा है या चुनावी मौसम का नया झुनझुना।

मेवाड़ की जनता की ओर से कहा गया है, “ट्रेन चाहिए, दिखावा नहीं, मेवाड़ का हक चाहिए, झुनझुना नहीं!” साथ ही नगर निगम चुनाव की नैया डगमगाने की स्थिति में रेल के नाम पर घोषणाओं की पतवार को लेकर भी सवाल उठाया गया है। कहा गया है कि अब जनता केवल घोषणा नहीं, काम और परिणाम देखना चाहती है।

इस मामले में न मोदीजी को बधाई और न अश्विनीजी को धन्यवाद देने की बात कही गई है। इसके पीछे तर्क दिया गया है कि मेवाड़ की रेल मांग कोई नई नहीं है और न ही इतनी छोटी है कि एक-दो बदलाव से बात पूरी हो जाए।

मेवाड़ की स्पष्ट मांग मुंबई दादर से श्रीनाथजी/नाथद्वारा, राजसमंद और आमेट तक नियमित सीधी रेल कनेक्टिविटी की है। मांग में कहा गया है कि मेवाड़ को लॉलीपॉप नहीं, सीधी रेल चाहिए। घोषणा नहीं, समाधान चाहिए और झुनझुना नहीं, अधिकार चाहिए।

मेवाड़ की आवाज अब दबेगी नहीं, यह संदेश देते हुए कहा गया है कि जनता जाग चुकी है और उसकी मांग स्पष्ट है—“रेल चाहिए तो पूरी चाहिए, मेवाड़ के सम्मान के साथ चाहिए।”

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