सुखिया सोमवार मेले पर रोक के प्रयास का विरोध, नेताओं ने बताया रियासतकालीन परंपरा पर आघात

उदयपुर के सुखिया सोमवार मेले को रोकने के प्रयासों पर भाजपा नेताओं ने जताया विरोध, बताया रियासतकालीन लोक परंपरा और संस्कृति से जुड़ा मुद्दा।

Update: 2026-08-03 11:21 GMT

उदयपुर में श्रावण मास के प्रत्येक सोमवार को गुलाबबाग में आयोजित होने वाले पारंपरिक ‘सुखिया सोमवार मेले’ को लेकर विवाद खड़ा हो गया है। भाजपा के वरिष्ठ नेता एवं पूर्व विधायक धर्मनारायण जोशी, पूर्व मंडल अध्यक्ष ओमप्रकाश खोखावत, पूर्व पार्षद दिनेश गुप्ता एवं डॉ. विजय विप्लवी ने संयुक्त वक्तव्य जारी कर सफाई व्यवस्था के नाम पर कतिपय अधिकारियों द्वारा मेले के आयोजन में बाधा उत्पन्न करने और इसे रोकने के प्रयासों की कड़ी निंदा की है।

नेताओं ने कहा कि यह मामला केवल एक मेले तक सीमित नहीं है, बल्कि उदयपुर की रियासतकाल से चली आ रही सामाजिक, सांस्कृतिक और लोक परंपरा के संरक्षण से जुड़ा विषय है। उन्होंने कहा कि सुखिया सोमवार मेवाड़ की विशिष्ट लोक-सांस्कृतिक परंपरा रही है, जिसमें श्रावण मास के प्रत्येक सोमवार को शहर और आसपास के क्षेत्रों से लोग बाग-बगीचों में पहुंचते थे।

उन्होंने बताया कि इस परंपरा में महिलाएं और युवतियां अपनी सखियों के साथ झूले झूलती थीं, लोकगीत गाती थीं और व्रत-उपवास से जुड़े धार्मिक अनुष्ठानों के साथ सामूहिक रूप से उत्सव मनाती थीं। ऐतिहासिक विवरणों में सज्जन निवास बाग में इन अवसरों पर विशाल मेले, बाजार, झूले और डोलर लगाए जाने का उल्लेख मिलता है।

नेताओं ने कहा कि समय के साथ सुखिया सोमवार मेले का स्वरूप बदला है, लेकिन गुलाबबाग में आयोजित होने वाला यह मेला आज भी उदयपुर की सांस्कृतिक स्मृति और जनजीवन से जुड़ा हुआ है। इस मेले में शहर के साथ-साथ आसपास के गांवों और कस्बों से भी लोग पहुंचते हैं। यहां खान-पान, खिलौने, घरेलू सामान एवं अन्य वस्तुओं की दुकानें सजती हैं, जबकि झूले और मनोरंजन के साधन बच्चों, महिलाओं और परिवारों के आकर्षण का केंद्र रहते हैं।

संयुक्त बयान में कहा गया कि अधिकारियों द्वारा सफाई व्यवस्था के नाम पर मेले को रोकने का प्रयास समझ से परे है। यदि सफाई व्यवस्था में कोई कमी है तो उसका समाधान करना प्रशासन की जिम्मेदारी है। उन्होंने कहा कि सफाई, यातायात, सुरक्षा, पार्किंग, कचरा निस्तारण और भीड़ प्रबंधन की उचित व्यवस्था कर मेले का आयोजन व्यवस्थित तरीके से किया जाना चाहिए, न कि व्यवस्थागत कमियों का जिम्मेदार मेले और आम जनता को ठहराया जाए।

नेताओं ने सवाल उठाया कि गुलाबबाग में अनियोजित निर्माण कार्यों के कारण प्राकृतिक जलमार्ग और कमल तलाई जैसी प्राकृतिक संरचनाओं को हुए नुकसान की ओर जिन अधिकारियों ने पर्याप्त ध्यान नहीं दिया, वे अब सफाई व्यवस्था को लेकर इतने चिंतित क्यों हैं।

उन्होंने कहा कि गुलाबबाग के विकास एवं निर्माण कार्यों के नाम पर पेड़ों को हटाने तथा प्राकृतिक स्वरूप से छेड़छाड़ करने वाले अधिकारी यदि अब सफाई के नाम पर पारंपरिक मेले को रोकने का प्रयास करते हैं तो यह अपनी प्रशासनिक जिम्मेदारी से बचने का प्रयास प्रतीत होता है।

उन्होंने प्रशासन से आग्रह किया कि मेले को रोकने के बजाय पूर्व नियोजन के साथ सफाई, पेयजल, अस्थायी शौचालय, कचरा संग्रहण, विद्युत सुरक्षा, यातायात एवं पार्किंग तथा कानून-व्यवस्था की पर्याप्त व्यवस्था सुनिश्चित की जाए। साथ ही मेला समाप्त होने के तुरंत बाद सफाई के लिए विशेष दल तैनात कर गुलाबबाग की स्वच्छता और पर्यावरण संरक्षण को प्राथमिकता दी जाए।

नेताओं ने कहा कि उदयपुर अपनी झीलों, बाग-बगीचों, लोक परंपराओं और सांस्कृतिक विरासत के कारण विश्वभर में विशिष्ट पहचान रखता है। ऐसी जीवंत लोक परंपराओं को प्रशासनिक सुविधा के नाम पर समाप्त करने के बजाय उनका संरक्षण और सुव्यवस्थित संचालन किया जाना चाहिए।

उन्होंने स्पष्ट कहा कि सुखिया सोमवार मेला केवल दुकानें और झूले लगाने का आयोजन नहीं है, बल्कि यह मेवाड़ की लोक-संस्कृति, महिलाओं की सामूहिक भागीदारी, पारिवारिक मेल-मिलाप और उदयपुर की ऐतिहासिक जीवनशैली से जुड़ी परंपरा है। इसलिए प्रशासन को इसे बाधित करने के बजाय गरिमा और सुव्यवस्था के साथ आयोजित कराने की जिम्मेदारी निभानी चाहिए।

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