तस्वीर में मुंबई के कपड़ा व्यवसायी शिवचरण गुप्ता गले में फूलों की माला पहने हुए हाथ जोड़े नजर आ रहे हैं।

मुंबई के कपड़ा व्यवसायी शिवचरण गुप्ता की कहानी सोशल मीडिया पर सामने आने के बाद रिश्तों, संस्कारों और पारिवारिक जिम्मेदारियों को लेकर गंभीर चर्चा का विषय बन गई है। इस घटना को देखने वाले अनेक लोगों ने इसे बदलते सामाजिक परिवेश और मानवीय मूल्यों में आ रहे बदलाव का आईना बताया है।

जानकारी के अनुसार, शिवचरण गुप्ता के कोई बेटा नहीं था और उनकी तीन बेटियां थीं। उन्होंने अपनी बेटियों को अच्छी शिक्षा दिलाई, उन्हें पढ़ाया-लिखाया और अच्छे परिवारों में विवाह कराया। विवाह में उन्होंने अपनी जीवनभर की कमाई लगा दी। उनकी दो बेटियां टीचर बनीं। माता-पिता को उम्मीद थी कि बुढ़ापे में उनकी बेटियां ही उनका सहारा बनेंगी।

समय के साथ उनके व्यवसाय में लगातार घाटा होता गया और जो कुछ था वह कर्ज में चला गया। जब बढ़ती उम्र के कारण शरीर ने साथ देना कम कर दिया और सेवा-सहारे की आवश्यकता पड़ी तो, लेख के अनुसार, तीनों बेटियों ने उनकी जिम्मेदारी उठाने से इनकार कर दिया। "हमारे पास समय नहीं है" कहकर पति-पत्नी को हरियाणा के सोनीपत स्थित एक वृद्धाश्रम में छोड़ दिया गया।

कुछ महीने पहले उनकी पत्नी का निधन हो गया। इसके बाद कुछ दिन पहले शिवचरण गुप्ता का भी निधन हो गया। लेख में दावा किया गया है कि उनके अंतिम संस्कार में उनकी कोई भी बेटी शामिल नहीं हुई। सबसे बड़ी बेटी ने 5100 रुपये भेज दिए और वीडियो कॉल के माध्यम से अंतिम संस्कार देखा। लेख के अनुसार, वीडियो में एक बेटी की आवाज सुनाई दी, "इतना समय क्यों लग रहा है? मुझे खाना खाना है और नहाना है।"

इस घटना के माध्यम से लेख में सवाल उठाया गया है कि क्या केवल बेटियां ही कलयुगी हैं या फिर समाज ने रिश्तों को स्वार्थ की तराजू पर तौलना शुरू कर दिया है। इसमें कहा गया है कि माता-पिता अपने बच्चों को जीवनभर की कमाई लगाकर डॉक्टर, इंजीनियर और टीचर तो बना देते हैं, लेकिन उन्हें इंसान बनाना भूल जाते हैं। लेख में यह भी कहा गया है कि बचपन में दिए गए सद्संस्कार पचपन की दहलीज तक ज्यों के त्यों बने रहते हैं और उच्च शिक्षा के साथ-साथ संस्कारों का बीजारोपण भी आवश्यक है।

लेख में आगे कहा गया है कि बच्चों को करियर की शिक्षा तो दी जाती है, लेकिन संस्कारों की शिक्षा नहीं दी जाती, जिसे सबसे बड़ी विडंबना बताया गया है। इसमें यह भी उल्लेख किया गया है कि माता-पिता अपने बच्चों को उच्च शिक्षा देकर विदेश भेज देते हैं, जिसके बाद वे उन्हें "स्टूपिड" समझने लगते हैं।

लेख में आशंका जताई गई है कि यदि ऐसी परिस्थितियां बढ़ती रहीं तो भविष्य में लोग संतान पैदा करने से भी डरेंगे। इसमें कहा गया है कि जिस पेड़ को 25 वर्ष तक पानी देकर बड़ा किया जाए, यदि उसी की छांव बुढ़ापे में न मिले तो उसका महत्व समाप्त हो जाता है।

लेख के निष्कर्ष में कहा गया है कि शिवचरण गुप्ता की कहानी केवल एक परिवार की नहीं, बल्कि पूरे समाज के लिए चेतावनी है। इसमें कहा गया है कि पैसा, प्रॉपर्टी और पद एक दिन साथ छोड़ देते हैं, जबकि अंत तक साथ रहने वाली चीज केवल संस्कार और अपनापन है। साथ ही यह संदेश दिया गया है कि बच्चों को ऊंची उड़ान भरने का अवसर अवश्य दिया जाए, लेकिन इतनी ऊंची नहीं कि वे अपनी जड़ों को ही भूल जाएं।

यह लेख राष्ट्र गौरव पारस जैन "पार्श्वमणि", पत्रकार, कोटा द्वारा प्रस्तुत किया गया है।

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