तस्वीर में राजनीतिक बाड़ाबंदी को दर्शाती एक व्यंग्यात्मक कार्टून कला नजर आ रही है।

निकाय चुनावों में जिन उम्मीदवारों पर मतदाताओं ने भरोसा करके वोट दिया, उन पर उनकी अपनी पार्टियों को ही भरोसा नहीं है। यही वजह है कि चुनाव निपटने के बाद भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस ने चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवारों की बाड़ाबंदी शुरू कर दी है। लोकतंत्र में मतदाता अपने प्रतिनिधि का चुनाव करता है, लेकिन चुनाव परिणाम आने के बाद वही प्रतिनिधि राजनीतिक दलों की निगरानी में होटल और रिसोर्ट जैसे बाड़ों में पहुंच जाते हैं।

बाड़ाबंदी का अर्थ ही अपने उम्मीदवारों पर राजनीतिक दलों का भरोसा नहीं होना है। यह मतदाता के भरोसे की हत्या, बिकने के लिए तैयार नेताओं पर निगरानी और पार्टी की नजरबंदी जैसी स्थिति को सामने रखती है। बड़ी होटलों और रिसोर्ट में उम्मीदवारों के लिए मुफ्त में ऐशो-आराम की सुविधाएं उपलब्ध कराई जाती हैं और बाहर से पहरा भी रखा जाता है।

बाड़े का उपयोग मूल रूप से पशुओं के लिए होता है। जहां गाय, भैंस, भेड़, बकरी या अन्य पालतू पशुओं को घेरकर या बांधकर रखा जाता है। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या हमारे भावी पार्षदों के साथ राजनीतिक दल भी ऐसा ही सलूक कर रहे हैं। जिस तरह बाड़ों में पशुओं को बंद करते समय गेट पर खड़ा पशुपालक उन्हें गिनता है, उसी तरह भावी पार्षदों को होटल और रिसोर्ट रूपी बाड़ों में भेजते हुए बाकायदा बस में बैठाया जाता है और रिसोर्ट के गेट पर पार्टी के बड़े नेता उनकी गिनती करते हैं।

उम्मीदवारों के इस रेवड़ में कोई गायब दिखाई दे तो उसे तलाशने की कवायद भी शुरू हो जाती है। जिस तरह पशुपालक अपने पशुओं में से किसी के गायब होने पर मोटरसाइकिल से अलग-अलग रास्तों पर उसकी तलाश में निकल पड़ते हैं, उसी तरह पार्टी के नेता भी वाहनों से उम्मीदवार के घर और हर संभावित ठिकाने की तरफ खोजने के लिए निकल पड़ते हैं।

जिस तरह दुधारू पशुओं को पशुपालक हरा और ताजा चारा खाने के लिए देते हैं, उसी तरह होटल और रिसोर्ट में उम्मीदवारों के लिए भी ताजा चारा, नहीं-नहीं, खाने-पीने के बढ़िया बंदोबस्त किए जाते हैं। बाहर पहरा भी रहता है। आखिर जीतने के बाद यही उम्मीदवार अपने निकायों को दूध की तरह निचोड़ेंगे और खुद तथा उनके सरपरस्त नेता मिलकर मलाई खाएंगे।

महिला उम्मीदवारों के लिए बाड़ाबंदी में स्पेशल ऑफर भी है। वे अपने परिवार के किसी पुरुष सदस्य को साथ ले जा सकती हैं। जिन उम्मीदवारों के छोटे बच्चे हैं, वे भी साथ जाएंगे।

अब बाड़ाबंदी राजनीति में एक परंपरा बन गई है। राजनीति में हॉर्स ट्रेडिंग शब्द शायद बाड़ाबंदी के साथ ही आया है। हॉर्स ट्रेडिंग यानी जनप्रतिनिधियों की खरीद-फरोख्त। उन्हें पैसे, पद या प्रलोभन देकर एकजुट रखना या पार्टी बदलने पर मजबूर करना इसका हिस्सा रहा है।

पहले आमतौर पर राज्यों में विधानसभा चुनाव के बाद किसी पार्टी को बहुमत नहीं मिलने की आशंका होने पर पहले बाड़ाबंदी और फिर विपक्षी नेताओं की हॉर्स ट्रेडिंग होती थी। लेकिन अब यह राजनीति की परंपरा बन गई है। पंच-सरपंच, पार्षद से लेकर विधायक-सांसद तक के चुनावों में बाड़ाबंदी और खरीद-फरोख्त भारतीय लोकतंत्र और मतदाता देख रहे हैं।

यह अनैतिक है, लेकिन सत्ता में आने के लिए जरूरी मान ली गई है। पिछले कुछ समय में तो हॉर्स ट्रेडिंग करके कई राज्यों में सरकारें ही बदल दी गईं और इसके लिए विधायकों को करोड़ों रुपए देने तक के आरोप चर्चा में रहे हैं।

राजस्थान में अब सभी निकायों में बाड़ाबंदी की जा रही है। भाजपा और कांग्रेस दोनों इसमें शामिल हैं। उन निर्दलीयों को भी बाड़ाबंदी में लिया जा रहा है, जो जीतने की स्थिति में हैं। उन बागियों को भी नजरों में रखा जा रहा है, जिन्हें अनुशासन के नाम पर निष्कासित कर दिया गया है। लेकिन अगर वे जीत गए और बोर्ड बनाने में उनकी जरूरत पड़ी तो टिकट नहीं मिलने से नाराज फूफा बने ये बागी आरती उतारकर दामाद की तरह वापस लाए जाएंगे।

बाड़ाबंदी का सवाल पूछे जाने पर नेताओं का तर्क और भी ज्यादा रोचक होता है। वे कहते हैं कि उम्मीदवारों को पार्टी की रीति-नीति समझाई जाएगी। सवाल यह है कि जिन्हें पार्टी की रीति-नीति ही पता नहीं हो, उन्हें पहले टिकट क्यों दिया गया था। वैसे रीति-नीति समझने की जरूरत क्या है। पार्षद बनते ही कमाओ-खाओ की नीति पर ही तो काम करना है।

कुल मिलाकर निकाय चुनाव के बाद शुरू हुई बाड़ाबंदी ने मतदाता के भरोसे, उम्मीदवारों की निष्ठा और राजनीतिक दलों के विश्वास पर सवाल खड़े कर दिए हैं। जिस लोकतांत्रिक प्रक्रिया में मतदाता अपने प्रतिनिधि को चुनता है, उसी के बाद चुने गए प्रतिनिधियों की निगरानी और बाड़ाबंदी लोकतंत्र की तस्वीर को अलग रूप में सामने रखती है।

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