जंगलों में साधना करने वाले चिन्मय सागर जी महाराज की स्मृति में विशेष आलेख
जंगल वाले बाबा चिन्मय सागर जी महाराज के अवतरण दिवस पर जानिए उनके तप, साधना, समाधिमरण और धर्म प्रचार की प्रेरणादायक यात्रा।
:तस्वीर में बाएं से मुनि श्री 108 चिन्मय सागर जी महाराज आशीर्वाद देते हुए और उनके सामने पत्रकार पारस जैन हाथ जोड़कर वंदन करते नजर आ रहे हैं।
परम पूज्य मुनि श्री 108 चिन्मय सागर जी महाराज, जिन्हें श्रद्धालु "जंगल वाले बाबा" के नाम से जानते थे, का 6 अगस्त अवतरण दिवस विशेष रूप से स्मरण किया जा रहा है। उनके जीवन की साधना, तप, त्याग और करुणा ने हजारों लोगों को प्रभावित किया। जहां उनके कदम पड़ते थे, वहां जंगल भी मंगलमय हो जाते थे।
राष्ट्र गौरव पारस जैन "पार्श्वमणि", पत्रकार कोटा (राज), ने बताया कि जीवन सभी जीते हैं, लेकिन जो जीवन को जीवंत बना देता है, वही जीवन को सार्थक करता है। भारत की वसुंधरा पर समय-समय पर अनेक ऋषि-मुनि, संत-महात्मा और दिव्य महान पुरुषों का अवतरण हुआ है। परम पूज्य गुरुदेव श्री चिन्मय सागर जी महाराज भी ऐसी ही दिव्य विभूति थे।
गुरुदेव चिन्मय सागर जी महाराज के हृदय में प्राणी मात्र के प्रति अटूट वात्सल्य, करुणा और प्रेम भरा हुआ था। उनकी सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि जो व्यक्ति एक बार उनके संपर्क में आता था, वह जीवनभर उनका होकर रह जाता था।
परम पूज्य मुनि चिन्मय सागर जी महाराज का जन्म कर्नाटक प्रांत के जिला बेलगांव के अंतर्गत छोटे से गांव जुगुल में हुआ था। देव शास्त्र गुरु के परम भक्त, उदार व्यवहार कुशल श्री अनंत मोले जी और धर्मनिष्ठ, संस्कारवान सदगृहिणी श्रीमती जी के आंगन में 6 अगस्त 1961 को श्री धर्मेंद्र कुमार जी जैन का जन्म हुआ।
मुनि श्री की शिक्षा हायर सेकेंडरी स्कूल तक रही। उन्होंने वर्ष 1982 में ब्रह्मचारी व्रत अंगीकार किया। इसके बाद 9 जुलाई 1987 को अतिशय क्षेत्र डोलजी में संत शिरोमणि विद्यासागर जी महाराज के संग में उनका मंगल प्रवेश हुआ।
मध्यप्रदेश के सिवनी स्थित सोनागिरी जैन मंदिर में संत शिरोमणि आचार्य 108 विद्यासागर जी महाराज के वरदहस्त कर कमलों से 31 मार्च 1988 को उनकी दीक्षा संपन्न हुई। मुनि श्री ने अपने संपूर्ण चातुर्मास अलग-अलग बिहड़ जंगलों में जंगली जानवरों के बीच किए।
मुनि श्री चिन्मय सागर जी महाराज की समता पूर्वक समाधि उनके जन्म स्थान जुगुल में 18 अक्टूबर 2019 को सांयकाल 6:17 बजे यम सल्लेखना पूर्वक हुई। उनकी 33 वर्ष की साधना और 3 आचार्य महाराज, 13 साधु संत, भट्टारक जी एवं अनेक त्यागी वृति की उपस्थिति में 33 दिन तक उत्कृष्ट समाधिमरण पूर्वक मरण को प्राप्त होना दुर्लभ संयोग माना गया।
यह भी विशेष संयोग रहा कि जहां गुरुदेव का जन्म हुआ, वहीं उनके जीवन का अंतिम समय भी व्यतीत हुआ। उन्होंने वीर प्रभु से कामना की थी कि एक दिन उनका भी समाधि मरण हो। वे संयम, तप, त्याग और साधना की साक्षात मूर्ति थे।
मुनि श्री का एक मंगल वर्षायोग ऐतिहासिक कोटा नगरी के समीप बोराबास (रावतभाटा रोड) के जंगलों में हुआ था। इस दौरान हजारी भील, मीना और गुर्जर समाज के लोगों ने अंडा, मांस और मछली का त्याग किया।
पारस जैन पाटनी "पार्श्वमणि" पत्रकार बताते हैं कि वे रोज गुरुदेव के दर्शन के लिए जाते थे और हर बार उनके चरण पकड़कर एक ही विनंती करते थे कि गुरुदेव एक धर्म का जैन टीवी चैनल खुलवा दीजिए। उन्होंने 40 दिन तक लगातार यही आग्रह किया।
इसके बाद गुरुदेव ने उन्हें पारस टीवी चैनल का आशीर्वाद दिया। एक बार बड़ौत (उत्तर प्रदेश) में सभी के सामने उन्हें बुलाकर गुरुदेव ने कहा, "देख पारस, तेरे नाम को विश्व के घर-घर में पहुंचा दिया मैंने।"
इस अवसर को याद करते हुए पारस जैन ने भीगी पलकों के साथ गुरुदेव के चरणों को छूते हुए कहा कि गुरुदेव, मुझे नहीं, आज सम्मेद शिखरजी में विराजमान पारसनाथ बाबा को घर-घर पहुंचाया है। जैन धर्म दर्शन के प्रचार-प्रसार का यह कार्य युगों तक याद रखा जाएगा।
मुनि श्री चिन्मय सागर जी महाराज की कठोर साधना, तप, त्याग और वात्सल्य करुणा की भावना उनके अनुयायियों के लिए प्रेरणा रही। उन्होंने लाखों लोगों को शाकाहारी, संयमी और व्यसन मुक्त जीवन की प्रेरणा दी। वर्ष 2018 में श्रवणबेलगोला महामस्तकाभिषेक आयोजन में उनकी उपस्थिति ने आयोजन की गरिमा बढ़ाई।
मुनि श्री 108 चिन्मय सागर जी महाराज का जीवन तप, साधना, करुणा और धर्म प्रचार का प्रतीक रहा, जिसे श्रद्धालु आज भी श्रद्धा और आस्था के साथ स्मरण करते हैं।