तृष्णा को बताया दुखों की जड़, संयम और सरलता से आत्म-कल्याण का मार्ग: गुरुदेव कोमल मुनि
खेरोदा जैन स्थानक में गुरुदेव कोमल मुनि ने तृष्णा को दुखों की जड़ बताते हुए संयम, सरलता और आत्म-कल्याण का संदेश दिया।
: तस्वीर में खेरोदा के जैन स्थानक भवन में चातुर्मास के दौरान मंच पर बैठे उप प्रवर्तक गुरुदेव कोमल मुनि और सेवारत्न हर्षित मुनि नजर आ रहे हैं।
खेरोदा कस्बे के जैन स्थानक भवन में आयोजित चातुर्मास के दौरान उप प्रवर्तक गुरुदेव कोमल मुनि ने जीवन के शाश्वत सत्यों पर चिंतन करते हुए श्रावकों को आत्म-कल्याण के लिए संयम, सरलता और नम्रता अपनाने की प्रेरणा दी।
गुरुदेव कोमल मुनि ने संबोधित करते हुए कहा कि आज मनुष्य की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि वह दुखों से मुक्ति पाना चाहता है, लेकिन दुखों के कारण बनने वाले संसार और मोह का त्याग करने को तैयार नहीं है। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि इंसान तैरना तो चाहता है, लेकिन पानी में उतरकर संयम धारण करने के लिए तैयार नहीं होता। पार लगाने के लिए तैयार खड़ी नाव को भी वह पकड़ना नहीं चाहता।
मुनि श्री ने तृष्णा को सभी दुखों की जड़ बताते हुए कहा कि मनुष्य दिन-रात अपनी इच्छाओं और तृष्णाओं की पूर्ति में लगा रहता है, जिससे उसकी बुद्धि भ्रमित हो जाती है। इसके कारण व्यक्ति सत्य और असत्य का अंतर भूल जाता है तथा सन्मार्ग से भटक जाता है। उन्होंने 24 घंटे के समय का आत्ममंथन करने की प्रेरणा देते हुए कहा कि यदि पूरा समय खाने, पीने, सोने और विषय-भोगों में ही व्यतीत हो जाएगा तो आत्म-कल्याण के लिए समय कब मिलेगा।
उन्होंने कहा कि जैसी मनुष्य की भावना होती है, वैसी ही उसकी परिणति होती है। खोटी भावना से हमेशा अशुभ परिणाम निकलते हैं, जबकि प्रबल और पवित्र भावना रखने वाला व्यक्ति ही सच्चा शूरवीर होता है।
जीवन के व्यावहारिक पक्ष पर प्रकाश डालते हुए गुरुदेव कोमल मुनि ने कहा कि बड़प्पन के अहंकार को छोड़कर जीवन में नम्रता, लघुता और सरलता धारण करने में ही वास्तविक कल्याण निहित है। उन्होंने समझाया कि जिस प्रकार बच्चे छोटे रहकर माता-पिता के संरक्षण में सुरक्षित रहते हैं, उसी प्रकार विनम्रता और सरलता जीवन को सही दिशा प्रदान करती है।
इस अवसर पर अध्ययनशील, सेवारत्न हर्षित मुनि ने 'सुख विपाक सूत्र' का वाचन करते हुए श्रद्धालुओं को मार्गदर्शन दिया। उन्होंने कहा कि यदि जीवन में वास्तविक सुख प्राप्त करना है तो जीवन को 'सुबाहुकुमार' के चरित्र के अनुरूप ढालना होगा।
कार्यक्रम के अंत में उपस्थित श्रद्धालुओं से तृष्णा रूपी महाजाल को समझकर प्रभु की शरण ग्रहण करने और आत्म-कल्याण के मार्ग पर आगे बढ़ने का आह्वान किया गया। इस दौरान वर्द्धमान जैन श्रावक संघ अध्यक्ष सुनील कूकड़ा ने आगंतुक अतिथियों का स्वागत किया।