तस्वीर में खेरोदा के जैन स्थानक भवन में आयोजित धर्मसभा के दौरान मंच पर बैठे संत और नीचे फर्श पर बैठे हुए श्रद्धालु नजर आ रहे हैं।

खेरोदा में चातुर्मास के दौरान जैन स्थानक भवन में आयोजित धर्मसभा को संबोधित करते हुए पूज्य गुरुदेव कोमल मुनि जी ने कहा कि जीवन में घमंड और अभिमान का त्याग कर दूसरों की बात सुनना और समझना आवश्यक है। उन्होंने कहा कि केवल अपनी प्रशंसा सुनकर प्रसन्न होना और दूसरों की उपेक्षा करना व्यक्ति को पतन की ओर ले जाता है।

गुरुदेव कोमल मुनि ने शील के महत्व पर जोर देते हुए कहा कि शील आत्मा की वास्तविक शक्ति, चरित्र की सुरक्षा का अमूल्य कवच और मनुष्यता की सबसे बड़ी ताकत है। क्रोध पर प्रहार करते हुए उन्होंने कहा कि क्रोध मन की शांति को नष्ट कर देता है और इसके बीज केवल दुख उत्पन्न करते हैं। मन में थोड़ा सा भी क्षमा भाव धारण करने से असीम शांति की अनुभूति होती है।

मुनि श्री ने कहा कि किसी को भी दूसरों की राह में बाधा या अड़चन नहीं बनना चाहिए, बल्कि परस्पर सहयोग करना ही हमारा परम धर्म और कर्तव्य है। वर्तमान परिवेश पर चिंता व्यक्त करते हुए उन्होंने कहा कि आज का मनुष्य कर्मों से पशुवत आचरण कर रहा है और स्वयं को मानव कहता है। यह कलयुग का ही प्रभाव है कि दुर्लभ मानव जीवन पाकर भी व्यक्ति का व्यवहार पतनोन्मुख है।

उन्होंने स्पष्ट किया कि धर्म ही वह मार्ग है, जो जन्म-जन्मांतर के दुखों को हरकर परम सुख प्रदान करता है। जिस जीवन में धर्म का प्रकाश न हो, वह अंधकारमय है, क्योंकि धर्म ही मनुष्य को ‘नर से नारायण’ बनने की सामर्थ्य देता है।

सभा में अध्ययनशील, सेवारत्न हर्षित मुनि जी ने कहा कि आचार्य सम्राट आत्माराम जी म. सा. का जीवन सभी के लिए अनुपम प्रेरणास्रोत है। वे उच्च कोटि के संयम और आत्म-साधक थे। समाज और धर्म के क्षेत्र में उनका महती अवदान रहा है, जिसे कभी भुलाया नहीं जा सकता।

मुनि श्री ने उपस्थित जनसमूह को आत्म-मंथन का संदेश देते हुए कहा कि पूज्य आचार्य श्री का चरित्र सर्वथा बेदाग था। आज स्वयं से यह प्रश्न पूछने की आवश्यकता है कि क्या हमारा चरित्र भी वैसा ही निष्कलंक और बेदाग है?

इस अवसर पर वर्द्धमान जैन श्रावक संघ के अध्यक्ष सुनील कूकड़ा एवं मंत्री मुकेश डांगी सहित संघ के अनेक पदाधिकारी, गणमान्य श्रावक-श्राविकाएं तथा बड़ी संख्या में धर्मप्रेमी बंधु उपस्थित रहे।

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