गुरु के बिना जीवन अधूरा, सच्चे मार्गदर्शक से ही मिलता है ज्ञान का प्रकाश

गुरु पूर्णिमा पर राष्ट्र गौरव के राष्ट्रीय मीडिया प्रभारी पारस जैन "पार्श्वमणि" ने गुरु के महत्व को बताते हुए कहा कि गुरु अज्ञान के अंधकार को दूर कर जीवन को ज्ञान और सही दिशा का प्रकाश प्रदान करते हैं।

Update: 2026-07-29 14:29 GMT

तस्वीर में राष्ट्र गौरव के राष्ट्रीय मीडिया प्रभारी पारस जैन पार्श्वमणि कोटा में नजर आ रहे हैं।

गुरु पूर्णिमा पर विशेष: राष्ट्र गौरव के राष्ट्रीय मीडिया प्रभारी पारस जैन "पार्श्वमणि" ने बताया गुरु का जीवन में महत्व

महान दुर्लभ चिंतामणि रत्न के समान मानव जीवन प्राप्त हुआ है। इस जीवन का प्रत्येक क्षण और प्रत्येक पल अत्यंत कीमती है। ऐसे में मनुष्य को समय-समय पर चिंतन करना चाहिए कि वह कहां से आया है, उसे कहां जाना है और मानव जीवन का वास्तविक महत्व क्या है।

गुरु पूर्णिमा के अवसर पर राष्ट्र गौरव के राष्ट्रीय मीडिया प्रभारी और पत्रकार कोटा (राज) पारस जैन "पार्श्वमणि" ने गुरु के महत्व को बताते हुए कहा कि जीवन में गुरु का स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण होता है। उन्होंने कहा कि "गुरु बिन ज्ञान न होय"। जीवन में गुरु का होना उतना ही आवश्यक है, जितना शरीर के लिए प्राण। जिस व्यक्ति के जीवन में गुरु नहीं होता, उसका जीवन अभी शुरू ही नहीं हुआ माना जाता है। यदि जीवन में सच्चा गुरु मिल जाए तो समझना चाहिए कि जीवन संवर गया।

गुरु शब्द के महत्व को स्पष्ट करते हुए उन्होंने कहा कि यदि गहनता से विचार किया जाए तो "गुरु" शब्द अपने आप में गरिमावान है। "गु" का अर्थ अंधकार और "रु" का अर्थ प्रकाश होता है। अर्थात जो अज्ञान रूपी अंधकार को दूर कर ज्ञान रूपी प्रकाश का मार्ग दिखाए, वही सच्चा गुरु कहलाता है।

उन्होंने कहा कि गुरु ही वह शक्ति है जो नर से नारायण, पाषाण से परमात्मा और तीतर से तीर्थंकर बना देते हैं। गुरु अपने शिष्य के भीतर छिपी दिव्यता को जागृत कर उसे जीवन के सही मार्ग पर आगे बढ़ाते हैं।

जीवन के तीन प्रमुख स्तंभों का उल्लेख करते हुए पारस जैन "पार्श्वमणि" ने कहा कि जीवन में "मां", "महात्मा" और "परमात्मा" का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है। मां बचपन को संस्कारों से संवारती है। महात्मा/गुरु जवानी में सही दिशा, सही निर्णय और सही कर्म का मार्ग दिखाते हैं। वहीं परमात्मा वृद्धावस्था में शांति और मोक्ष का मार्ग प्रदान करते हैं।

उन्होंने कहा कि जब जीवन में चारों ओर विपरीत परिस्थितियां उत्पन्न हो जाती हैं और अंधकार दिखाई देने लगता है, तब गुरु ही दीपक बनकर सही दिशा प्रदान करते हैं और जीवन को फिर से नई ऊर्जा देते हैं।

गुरु के वास्तविक स्वरूप को बताते हुए उन्होंने कहा कि गुरु केवल पढ़ाने वाले शिक्षक नहीं होते। माता-पिता पहले गुरु हैं, प्रकृति गुरु है, अनुभव गुरु है और सबसे ऊपर सद्गुरु हैं, जो मनुष्य को आत्मा से परमात्मा तक जोड़ने का मार्ग दिखाते हैं।

गुरु पूर्णिमा के पावन अवसर पर उन्होंने सभी गुरुओं को कोटि-कोटि नमन करते हुए संकल्प लेने का आह्वान किया कि गुरु के दिखाए मार्ग पर चलकर न केवल अपना जीवन सफल बनाया जाए, बल्कि समाज में भी ज्ञान और प्रकाश फैलाया जाए।

उन्होंने अंत में संत कबीर के दोहे को उद्धृत करते हुए कहा—

"गुरु गोविंद दोऊ खड़े, काके लागूं पाय।

बलिहारी गुरु आपने, गोविंद दियो बताय।"

यह प्रस्तुति राष्ट्रीय मीडिया प्रभारी राष्ट्र गौरव पारस जैन "पार्श्वमणि" पत्रकार कोटा (राज) द्वारा दी गई है।

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