सत्य निकेतन इमारत हादसे ने खोली MCD सर्वे की पोल, अवैध निर्माण पर उठे गंभीर सवाल|
दक्षिण दिल्ली के सत्य निकेतन में पांच मंजिला अवैध इमारत ढहने से सात लोगों की मौत के बाद एमसीडी के पूर्व-मानसून सर्वे पर सवाल खड़े हो गए हैं।
दुर्घटना स्थल पर एनडीआरएफ के जवान और स्थानीय लोग सत्य निकेतन में इमारत ढहने के बाद राहत कार्य करते हुए।
दक्षिण दिल्ली के सत्य निकेतन क्षेत्र में पांच मंजिला अवैध इमारत के ढह जाने से हुई सात लोगों की दर्दनाक मौत ने एक बार फिर राजधानी की सुरक्षा व्यवस्था और नगर निगम के प्रशासनिक दावों की पोल खोल दी है। इस भीषण हादसे ने मानसून से ठीक पहले नगर निगम यानी एमसीडी द्वारा किए जाने वाले स्ट्रक्चरल सर्वे की कार्यप्रणाली और उसकी प्रभावशीलता पर बेहद गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। हाल ही में हुए इस सर्वेक्षण के दौरान निगम ने लगभग अठ्ठाइस लाख इमारतों की जांच करने का दावा किया था, जिसमें से हैरानी की बात यह है कि केवल उन्नीस इमारतों को ही जर्जर और खतरनाक श्रेणी में रखा गया था। सत्य निकेतन की इस दुर्घटना ने साबित कर दिया है कि कागजी आंकड़े और मैदानी हकीकत में कितना बड़ा अंतर है।
एमसीडी के आधिकारिक दस्तावेजों और बयानों के अनुसार, रविवार को ढही यह पांच मंजिला इमारत 1990 के दशक में एक पुनर्वास कॉलोनी के भीतर लगभग पचपन वर्ग गज के छोटे से भूखंड पर बनाई गई थी। हालांकि, इसके विपरीत स्थानीय निवासियों का यह दावा है कि यह इमारत करीब पचास साल पुरानी थी और इसका निर्माण 1970 के दशक के दौरान हुआ था। शुरुआती दौर में इन पुनर्वास कॉलोनियों के विकास के समय नियमों के तहत केवल भूतल और एक मंजिल यानी ग्राउंड प्लस वन के निर्माण की ही आधिकारिक अनुमति दी गई थी। बावजूद इसके, नियमों को ताक पर रखकर दशकों पुरानी इस पांच मंजिला इमारत का धड़ल्ले से व्यावसायिक उपयोग किया जा रहा था और इसे लड़कों के पीजी के रूप में चलाया जा रहा था।
जांच में यह भी सामने आया है कि इस बहुमंजिला इमारत का कोई भी स्वीकृत नक्शा नगर निकाय के पास मौजूद नहीं था, और न ही इसके अवैध निर्माण को लेकर पहले कोई शिकायत दर्ज कराई गई थी। जिस क्षेत्र में यह हादसा हुआ, वह 1970 के दशक में पुनर्वास कॉलोनी के रूप में बसाया गया था जहां लोगों को छोटे प्लॉट आवंटित किए गए थे। एमसीडी कमिश्नर संजीव खिरवार का कहना है कि इस पूरे मामले की मजिस्ट्रेट जांच के आदेश दिए जा चुके हैं, जिसकी रिपोर्ट आने के बाद ही इमारत के ढहने के वास्तविक और तात्कालिक कारणों का पुख्ता खुलासा हो पाएगा। यह भी जांच का विषय है कि क्या इसके बेसमेंट में किसी तरह का निर्माण कार्य चल रहा था या नहीं।
इस भयावह हादसे के बाद स्थानीय लोगों में भारी आक्रोश व्याप्त है, जिन्होंने इमारत के गिरने के लिए बेसमेंट में भरा पानी और वहां चल रहे मरम्मत कार्यों को मुख्य रूप से जिम्मेदार ठहराया है। स्थिति की गंभीरता को देखते हुए नगर निकाय ने तुरंत कार्रवाई करते हुए पास की ही एक अन्य इमारत को खाली करवाकर सील कर दिया है, जिसमें लड़कियों का पीजी संचालित हो रहा था। इसके अलावा, दिल्ली नगर निगम अधिनियम, 1957 की धारा 349 के अंतर्गत आसपास की कम से कम चार अन्य खतरनाक इमारतों को भी तुरंत खाली करने के कड़े नोटिस जारी किए गए हैं। दस्तावेजों के मुताबिक, इस इमारत के मालिक ने पिछले वर्ष ही अपना संपत्ति कर और साल 2007 में कन्वर्जन शुल्क जमा करवाया था, जिससे यह साफ होता है कि प्रशासन की नजरों में यह संपत्ति दर्ज थी लेकिन इसके अवैध विस्तार पर समय रहते लगाम नहीं कस जा सकी।
नगर निगम के अपने आंकड़े बताते हैं कि जून से सितंबर के बीच निकाय ने करीब नौ सौ अस्सी संपत्तियों पर तोड़फोड़ की कार्रवाई की है, चार सौ साठ संपत्तियों को सील किया है, अवैध निर्माण को लेकर पंद्रह सौ से अधिक कारण बताओ नोटिस तथा सात सौ आठ सीलिंग संबंधी नोटिस जारी किए हैं। इसके साथ ही सात सौ बीस से अधिक तोड़फोड़ के आधिकारिक आदेश भी जारी किए गए हैं। इसके बावजूद सत्य निकेतन की यह घटना दर्शाती है कि एमसीडी की सर्वेक्षण टीमें केवल इमारतों की बाहरी तौर पर जांच करती हैं और दीवारों पर आई दरारों या झुकाव जैसे सतही संकेतों को देखकर ही अपनी औपचारिकता पूरी कर लेती हैं, जिसमें किसी भी प्रकार की विस्तृत संरचनात्मक तकनीकी जांच शामिल नहीं होती है।
यह कोई इकलौती घटना नहीं है, बल्कि इस वर्ष विशेषकर दक्षिणी दिल्ली क्षेत्र में इस तरह के कई बड़े हादसे सामने आ चुके हैं। बीते तीस मई को सैदुल अजायब में एक इमारत ढहने से छह लोगों की जान चली गई थी, वहीं तीन जून को हौज रानी इलाके में एक बेड एंड ब्रेकफास्ट में भीषण आग लगने से ग्यारह विदेशी नागरिकों समेत तेरह लोगों की मौत हो गई थी। इसके अलावा जून के ही महीने में मलका गंज सब्जी मंडी क्षेत्र और करावल नगर में भी मकान ढहने की गंभीर घटनाएं घटित हुई थीं। इन तमाम त्रासदियों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि जब तक अनधिकृत निर्माणों और पुरानी इमारतों की जमीनी स्तर पर पारदर्शी और तकनीकी रूप से गहरी जांच नहीं की जाती, तब तक ऐसे हादसों पर रोक लगाना और निर्दोष नागरिकों की जान बचाना असंभव बना रहेगा।