मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला मंत्रिमंडल विस्तार के बाद श्रीनगर में गंभीर मुद्रा में नजर आ रहे हैं।

जम्मू-कश्मीर में मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला के नेतृत्व वाली सरकार के मंत्रिमंडल का विस्तार होने के बाद राजनीतिक विवाद खड़ा हो गया है। उपराज्यपाल मनोज सिन्हा ने राजभवन में आयोजित एक समारोह में नेशनल कॉन्फ्रेंस (जेकेएनसी) के चार नए मंत्रियों को पद और गोपनीयता की शपथ दिलाई। शपथ लेने वाले नेताओं में श्रीनगर के खानयार विधानसभा क्षेत्र से वरिष्ठ विधायक अली मोहम्मद सागर, मीर सैफुल्ला, शमीम फिरदौस और अल्ताफ अहमद वानी (कल्लू) शामिल हैं। ये चारों नए मंत्री कश्मीर घाटी से आते हैं। इस नए फेरबदल के बाद दो साल पुरानी सरकार के 9 सदस्यीय मंत्रिपरिषद में घाटी का प्रतिनिधित्व काफी बढ़ गया है। नए मंत्रियों को जगह देने के लिए छम्ब विधानसभा क्षेत्र से निर्दलीय विधायक सतीश शर्मा को मंत्रिमंडल से बाहर कर दिया गया है। 90 सदस्यीय जम्मू-कश्मीर विधानसभा में कानूनी नियमों के अनुसार मंत्रिपरिषद में अधिकतम नौ मंत्री ही बनाए जा सकते हैं।

इस कैबिनेट विस्तार के बाद सत्तारूढ़ नेशनल कॉन्फ्रेंस के भीतर असंतोष उभर आया है, वहीं विपक्षी दल भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने भी क्षेत्रीय और सांस्कृतिक असंतुलन का आरोप लगाते हुए सरकार पर निशाना साधा है। इस बदलाव के कारण जम्मू जिले का प्रतिनिधित्व मंत्रिपरिषद से पूरी तरह समाप्त हो गया है। इसके साथ ही पूरी कैबिनेट में हिंदू समुदाय का प्रतिनिधित्व घटकर केवल एक मंत्री तक सीमित रह गया है। वर्ष 1953 के बाद यह पहला मौका है जब जम्मू संभाग के 10 में से 8 जिलों का सरकार में कोई मंत्री नहीं है। जहां जम्मू जिले को कैबिनेट से पूरी तरह बाहर रखा गया है, वहीं अकेले श्रीनगर जिले से दो मंत्री शामिल हैं।

मंत्रिमंडल में स्थान न मिलने पर सबसे ज्यादा विरोध नेशनल कॉन्फ्रेंस के वरिष्ठ नेता और ईदगाह से विधायक मुबारक गुल के समर्थकों में देखा गया। श्रीनगर के तुलसी बाग स्थित उनके आवास के बाहर बड़ी संख्या में कार्यकर्ताओं और समर्थकों ने इकट्ठा होकर प्रदर्शन किया। उत्तेजित समर्थकों ने मांग की कि यदि उन्हें मंत्रिमंडल में जगह नहीं दी जाती है, तो उन्हें पार्टी से इस्तीफा दे देना चाहिए। इस पर प्रतिक्रिया देते हुए मुबारक गुल ने कहा कि उनके समर्थक इस बर्ताव से काफी आक्रोशित हैं और इस्तीफा देने का दबाव बना रहे हैं। उन्होंने बताया कि वह 50 सालों से पार्टी से जुड़े रहे हैं, लेकिन अब तक वे 20 शपथ ग्रहण समारोह देख चुके हैं और हर बार की तरह इस बार भी उन्हें छोड़ दिया गया है। उन्होंने कहा कि वह सही समय आने पर इस मुद्दे पर अपनी बात रखेंगे।

धार्मिक और क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व के आंकड़ों पर नजर डालें तो इस फेरबदल से पहले मंत्रिपरिषद में दो हिंदू चेहरे शामिल थे- छंब से विधायक सतीश शर्मा और नौशेरा-राजौरी से उपमुख्यमंत्री सुरिंदर चौधरी। सतीश शर्मा को हटाए जाने के बाद अब उपमुख्यमंत्री सुरिंदर चौधरी ही कैबिनेट में एकमात्र हिंदू चेहरा बचे हैं। जबकि नेशनल कॉन्फ्रेंस और उसके समर्थकों के पास जम्मू संभाग से अन्य हिंदू नेताओं के विकल्प उपलब्ध थे। इनमें किश्तवाड़ जिले के इंदरवाल से जीतने वाले वरिष्ठ नेता प्यारे लाल शर्मा शामिल थे, जो पूरी चिनाब घाटी का प्रतिनिधित्व कर सकते थे। इसके अलावा कठुआ जिले की बनी सीट से निर्दलीय विधायक रामेश्वर सिंह भी एक विकल्प थे, जो 6 विधानसभा सीटों वाले कठुआ जिले को प्रतिनिधित्व दे सकते थे। वहीं रामबन विधानसभा सीट से नेशनल कॉन्फ्रेंस के अपने विधायक अर्जुन सिंह राजू भी थे, जो रामबन, डोडा और किश्तवाड़ वाली पूरी चिनाब बेल्ट का प्रतिनिधित्व कर सकते थे, लेकिन इन्हें मौका नहीं दिया गया।

भौगोलिक और क्षेत्रीय असंतुलन की बात करें तो वर्तमान में जम्मू-कश्मीर कैबिनेट के 9 में से 7 मंत्री कश्मीर घाटी से हैं और केवल 2 मंत्री जम्मू संभाग से हैं। जम्मू संभाग के ये दोनों मंत्री पीर पंजाल क्षेत्र (राजौरी और पुंछ) से संबंध रखते हैं, जिसे भौगोलिक रूप से कश्मीर की सीमा से लगा माना जाता है। इस स्थिति के कारण जम्मू संभाग के 10 में से 8 जिलों—जम्मू, सांबा, कठुआ, उधमपुर, रामबन, डोडा, किश्तवाड़ और रियासी—का कैबिनेट में शून्य प्रतिनिधित्व है। 6 विधानसभा सीटों वाली पूरी चिनाब घाटी और 18 विधानसभा सीटों वाले जम्मू-सांबा-कठुआ औद्योगिक क्षेत्र से एक भी मंत्री नहीं बनाया गया है।

राजनीतिक इतिहास के दृष्टिकोण से जम्मू शहर और श्रीनगर शहर को हमेशा समान महत्व दिया जाता रहा है। सबसे ज्यादा 11 विधानसभा सीटों वाले जम्मू जिले को पिछले 70 वर्षों में पहली बार पूरी तरह से प्रतिनिधित्व से वंचित किया गया है। 1953 से 1975 के दौर (बख्शी, जी.एम. सादिक, मीर कासिम के कार्यकाल) में चौधरी राम प्यारा, त्रिलोचन दत्त और बलराज पूरी जैसे नेता कैबिनेट में रहे। 1975 से 1982 तक शेख अब्दुल्ला के कार्यकाल में मंगत राम शर्मा, रंगील सिंह और धर्म पाल मंत्री रहे। 1982 से 2002 के बीच फारूक अब्दुल्ला की सरकार में रोमेश शर्मा, धर्म पाल, हरि सिंह, बोध राज बाली और मंगत राम शर्मा (उपमुख्यमंत्री) शामिल थे और फारूक हमेशा जम्मू से 3-4 मंत्री रखते थे।

इसी तरह 2002 से 2008 के मुफ्ती मोहम्मद सईद और गुलाम नबी आजाद के शासनकाल में मूला राम, सुमन भगत, मंगत राम शर्मा, बाबू सिंह और तारा चंद जैसे नेता जम्मू जिले का प्रतिनिधित्व करते थे। 2009 से 2014 की उमर अब्दुल्ला और कांग्रेस गठबंधन सरकार में शाम लाल शर्मा, रमन भल्ला, तारा चंद और अजय सदहोत्रा के रूप में जम्मू का बड़ा दबदबा था। 2015 से 2018 की पीडीपी-भाजपा सरकार में कविंदर गुप्ता (उपमुख्यमंत्री), बाली भगत, प्रिया सेठी और शाम चौधरी शामिल थे। यहां तक कि अक्टूबर 2024 में बनी उमर अब्दुल्ला की पहली कैबिनेट में भी सतीश शर्मा (छंब-जम्मू) को शामिल किया गया था ताकि मुख्य जम्मू क्षेत्र का प्रतिनिधित्व बना रहे। आजाद भारत के इतिहास में यह पहली बार है जब जम्मू जिले से एक भी मंत्री नहीं है।

इस निर्णय के बाद राज्य में राजनीतिक बयानबाजी और विरोध तेज हो गया है। भारतीय जनता पार्टी के नेता और विपक्ष के नेता सुनील शर्मा ने आरोप लगाया है कि इस फेरबदल से यह साबित हो गया है कि नेशनल कॉन्फ्रेंस केवल एक 'कश्मीर-केंद्रित' पार्टी है, जिसे जम्मू क्षेत्र पर कोई भरोसा नहीं है। इसके अतिरिक्त, पीर पंजाल क्षेत्र से नेशनल कॉन्फ्रेंस के अपने कुछ विधायक नाराज बताए जा रहे हैं और उपमुख्यमंत्री सुरिंदर चौधरी को हटाने की मांग कर रहे हैं। वहीं दूसरी ओर, कश्मीर घाटी से पार्टी के वरिष्ठ नेता जैसे मुबारक गुल, नजीर गुरेजी और अब्दुल मजीद लारमी भी मंत्रिपरिषद में पद न मिलने के कारण अपनी नाराजगी व्यक्त कर रहे हैं।