जिस मैदान पर गूंज रहा छात्रों का संघर्ष, जानिए कौन थे आदिवासियों की आवाज और ओलंपिक गोल्ड के कैप्टन जिनके नाम पर बना है चर्चित स्टेडियम|
रांची के जयपाल सिंह मुंडा स्टेडियम में जेपीएससी-जेएसएससी छात्रों का आंदोलन जारी है। जानिए कौन थे ओलंपिक गोल्ड विजेता जयपाल सिंह मुंडा।
रांची के जयपाल सिंह मुंडा स्टेडियम के बाहर JPSC और JSSC परीक्षाओं में अनियमितताओं के खिलाफ प्रदर्शन करते हुए छात्र|
जयपाल सिंह मुंडा स्टेडियम इन दिनों झारखंड की राजधानी रांची में अपनी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और वर्तमान छात्र आंदोलन दोनों को लेकर सुर्खियों में छाया हुआ है। झारखंड लोक सेवा आयोग यानी JPSC और झारखंड कर्मचारी चयन आयोग यानी JSSC की विभिन्न भर्ती परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं और गड़बड़ियों के खिलाफ राज्यभर के युवा और छात्र पिछले पंद्रह दिनों से लगातार धरना-प्रदर्शन कर रहे हैं [cite: जयपाल सिंह मुंडा कौन थे? जिनके नाम पर रांची में बना स्टेडियम, JPSC-JSSC छात्रों के आंदोलन से चर्चा में आया]। हालांकि राज्य की हेमंत सरकार और प्रदर्शनकारी अभ्यर्थियों के बीच कई दौर की बातचीत भी हुई है, लेकिन कई मुख्य मांगों पर सहमति न बन पाने के कारण छात्रों का यह विरोध प्रदर्शन शनिवार को भी लगातार पंद्रहवें दिन पूरी मजबूती के साथ जारी रहा। खास बात यह है कि JPSC और JSSC के ये सभी अभ्यर्थी इसी जयपाल सिंह मुंडा स्टेडियम में अपना डेरा जमाए हुए हैं, जिसके चलते यह प्रतिष्ठित खेल परिसर अचानक से देश भर के राजनीतिक और शैक्षणिक गलियारों में चर्चा का केंद्र बन गया है। इस पूरे घटनाक्रम के बीच यह जानना बेहद दिलचस्प हो जाता है कि आखिर यह स्टेडियम जिस महान शख्सियत के नाम पर रखा गया है, वे जयपाल सिंह मुंडा कौन थे और उनका देश के इतिहास में कितना बड़ा योगदान रहा है।
इतिहास के पन्नों को पलटें तो मरांग गोमके के नाम से सम्मानित जयपाल सिंह मुंडा का जन्म वर्ष 1903 में खूंटी जिले के एक साधारण आदिवासी परिवार में हुआ था। उनकी शुरुआती स्कूली शिक्षा रांची के ही स्थानीय विद्यालयों में पूरी हुई थी। बचपन से ही पढ़ाई-लिखाई और खेलकूद विशेषकर हॉकी के खेल में उनकी प्रतिभा बेहद असाधारण थी। उनकी इसी विलक्षण प्रतिभा को भांपते हुए ईसाई मिशनरियों ने उनकी उच्च शिक्षा के लिए हरसंभव मदद की और उन्हें आगे की पढ़ाई के वास्ते इंग्लैंड भेज दिया। इंग्लैंड पहुंचकर उन्होंने प्रसिद्ध ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के प्रतिष्ठित सेंट जॉन्स कॉलेज में दाखिला लिया और वहीं से अर्थशास्त्र विषय में अपना पोस्ट ग्रेजुएशन पूरा किया [cite: जयपाल सिंह मुंडा कौन थे? जिनके नाम पर रांची में बना स्टेडियम, JPSC-JSSC छात्रों के आंदोलन से चर्चा में आया]।
ऑक्सफोर्ड में पठन-पाठन के दौरान हॉकी के खेल में उनकी महारत का डंका पूरे विश्वविद्यालय में बज उठा था। वे मैदान पर एक बेहतरीन डीप डिफेंडर के तौर पर अपनी खेल कला का प्रदर्शन करते थे। उनकी सबसे बड़ी खासियत यह थी कि वे बिना किसी प्रकार का फाउल किए बेहद सटीक समय पर विरोधी टीम के खिलाड़ी को रोकते थे और गेंद को अपने नियंत्रण में लेकर एक जोरदार हिट के जरिए अपनी टीम के साथी खिलाड़ी तक सुरक्षित पहुंचा देते थे। यूनिवर्सिटी की हॉकी टीम की ओर से खेलते हुए उन्होंने कई महत्वपूर्ण मुकाबलों में अपनी टीम को शानदार जीत दिलाई। उनके इस अद्वितीए खेल कौशल से प्रभावित होकर ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी ने उन्हें प्रतिष्ठित 'ऑक्सफोर्ड ब्लू' सम्मान से अलंकृत किया [cite: जयपाल सिंह मुंडा कौन थे? जिनके नाम पर रांची में बना स्टेडियम, JPSC-JSSC छात्रों के आंदोलन से चर्चा में आया]। यह ऐतिहासिक उपलब्धि हासिल करने वाले वे भारत के पहले छात्र थे।
भारतीय खेल इतिहास में उनका नाम स्वर्णिम अक्षरों में इसलिए भी दर्ज है क्योंकि उन्होंने ही सबसे पहले भारतीय हॉकी टीम को अंतरराष्ट्रीय मंच पर स्वर्ण पदक दिलाया था। वर्ष 1928 के एम्स्टर्डम समर ओलंपिक्स के दौरान उन्होंने भारतीय हॉकी टीम की कप्तानी की बागडोर संभाली थी और अपनी कैप्टेंसी में देश को ओलंपिक का पहला गोल्ड मेडल दिलाया था। खेल के मैदान के अलावा उनका व्यक्तित्व बहुआयामी था; वे एक प्रखर राजनीतिज्ञ, सजग पत्रकार, जाने-माने लेखक, संपादक और कुशल शिक्षाविद् के रूप में भी देश भर में जाने जाते थे।
समाज सुधार और राजनीतिक अधिकारों की बात करें तो वर्ष 1938 में जब उन्होंने रांची और पटना का दौरा किया, तब उन्होंने क्षेत्रीय आदिवासियों की दयनीय और शोषित हालत को बहुत करीब से देखा। उनकी इस पीड़ा को समझते हुए उन्होंने 'आदिवासी महासभा' की स्थापना की और उनके हक की आवाज को मजबूती से उठाना शुरू किया। इसके बाद वर्ष 1950 में उन्होंने इसी आदिवासी महासभा का दायरा बढ़ाते हुए इसे एक राजनीतिक दल के रूप में 'झारखंड पार्टी' में बदल दिया। उनकी राजनीतिक लोकप्रियता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि वर्ष 1951 के पहले आम लोकसभा चुनाव में उन्होंने रांची पश्चिम लोकसभा सीट से चुनाव लड़ा और भारी मतों से जीत दर्ज की [cite: जयपाल सिंह मुंडा कौन थे? जिनके नाम पर रांची में बना स्टेडियम, JPSC-JSSC छात्रों के आंदोलन से चर्चा में आया]। वे लगातार चार बार देश की सबसे बड़ी पंचायत यानी लोकसभा के लिए चुने गए [cite: जयपाल सिंह मुंडा कौन थे? जिनके नाम पर रांची में बना स्टेडियम, JPSC-JSSC छात्रों के आंदोलन से चर्चा में आया]। इनमें से तीन बार वे अपनी खुद की पार्टी झारखंड पार्टी के टिकट पर सांसद बने, जबकि एक बार उन्होंने कांग्रेस के टिकट पर जीत हासिल की थी। साल 1963 में उन्होंने अपनी झारखंड पार्टी का कांग्रेस पार्टी में आधिकारिक रूप से विलय कर दिया था। इसके बाद वर्ष 1967 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने उन्हें खूंटी संसदीय सीट से मैदान में उतारा, जहाँ उन्होंने शानदार जीत दर्ज की और इस प्रकार वे 1951 से लेकर 1967 तक लगातार देश के सांसद रहे।
देश और समाज के प्रति उनके इन्हीं महान योगदानों को हमेशा याद रखने के लिए रांची में बने इस आधुनिक स्टेडियम का नामकरण उनके नाम पर किया गया। हालांकि, इस स्टेडियम के निर्माण से जुड़ा इतिहास भी काफी दिलचस्प है, क्योंकि कभी यह वर्तमान परिसर एक बड़ा सा तालाब हुआ करता था। जयपाल सिंह मुंडा के सुपुत्र जयंत जयपाल मुंडा ने इस संदर्भ में जानकारी साझा करते हुए बताया था कि आज जहां यह भव्य स्टेडियम खड़ा है, वहां पहले एक बेकार पड़ा तालाब हुआ करता था जिसका कोई विशेष उपयोग नहीं था। उस दौर में स्थानीय स्कूल के बच्चों ने खुद आगे आकर वहां श्रमदान किया और उस अनुपयोगी जगह को खेलने के मैदान के रूप में तैयार किया था। समय के साथ-साथ वहां खेल प्रेमियों की भीड़ जुटने लगी और धीरे-धीरे वह जगह एक बड़े स्टेडियम के रूप में विकसित हो गई। आज उसी ऐतिहासिक और प्रेरणादायी मैदान पर अपनी आजीविका और भविष्य को बचाने के लिए जेपीएससी और जेएसएससी के छात्र शांतिपूर्ण तरीके से अपने हक का आंदोलन चला रहे हैं