सफेद कुर्ते में खड़े सांसद संजय झा नई दिल्ली में फरक्का जल संधि के नवीनीकरण और बिहार के जल हितों के संदर्भ में।

बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की पार्टी जनता दल यूनाइटेड (जेडीयू) ने भारत और बांग्लादेश के बीच वर्ष 1996 में हुई फरक्का जल-बंटवारा संधि के नवीनीकरण का पुरजोर विरोध किया है। जेडीयू के कार्यकारी अध्यक्ष और राज्यसभा सांसद संजय कुमार झा ने संसद के उच्च सदन यानी राज्यसभा में इस संवेदनशील मुद्दे को उठाते हुए सरकार से मांग की है कि इस संधि को इसके वर्तमान स्वरूप में बिल्कुल भी रिन्यू न किया जाए। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि जब तक बिहार के लोगों की दीर्घकालिक जल सुरक्षा, कृषि आवश्यकताओं और विकास से जुड़ी जरूरतों को पूरी तरह से सुरक्षित नहीं किया जाता, तब तक इस समझौते को आगे बढ़ाना राज्य के व्यापक हितों के बिल्कुल भी अनुकूल नहीं होगा।

राज्यसभा में अपनी बात रखते हुए सांसद संजय झा ने इस बात पर विशेष प्रकाश डाला कि 12 दिसंबर 1996 को हस्ताक्षरित फरक्का जल संधि की मौजूदा वैधता इसी साल 12 दिसंबर 2026 को समाप्त होने वाली है। ऐसे में इस संधि के नवीनीकरण को लेकर जो भी कदम उठाए जाएं, उनसे पहले गंगा नदी के किनारे बसे राज्यों, और विशेष रूप से बिहार की जल आवश्यकताओं का एक व्यापक और वैज्ञानिक मूल्यांकन किया जाना अनिवार्य है। उन्होंने इसे एक बहुत बड़ा 'राष्ट्रीय हित का मुद्दा' करार देते हुए कहा कि केंद्र सरकार को इस संधि पर कोई भी अंतिम निर्णय लेने से पहले बिहार की भौगोलिक और आर्थिक वास्तविकताओं पर गंभीरता से विचार करना चाहिए।

अपने राजनीतिक और प्रशासनिक अनुभवों का हवाला देते हुए संजय झा ने याद दिलाया कि जब वे राज्य सरकार में जल संसाधन मंत्री के पद पर थे, तब भी उन्होंने विभिन्न आधिकारिक मंचों से लगातार यह मांग उठाई थी कि केंद्र सरकार को फरक्का जल समझौते पर पुनर्विचार करना चाहिए। उन्होंने कहा कि बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार भी शुरू से ही इस समझौते के प्रावधानों को लेकर अपनी चिंताएं जताते रहे हैं। पार्टी का यह स्पष्ट मानना है कि यदि किसी समझौते से देश के किसी एक हिस्से या राज्य के हितों को भारी नुकसान पहुंचता है, तो उस पर नए सिरे से विचार किया जाना चाहिए।

संजय झा ने दक्षिण बिहार के कई जिलों में उत्पन्न हो रही गंभीर जल समस्याओं का भी संसद में जिक्र किया। उन्होंने बताया कि फरक्का बैराज का मूल निर्माण हुगली नदी में पर्याप्त जल प्रवाह को बनाए रखने और कोलकाता बंदरगाह की नौवहन जरूरतों को पूरा करने के लिए किया गया था। लेकिन इसके विपरीत, बिहार राज्य पिछले कई दशकों से गंगा नदी के जल की अपर्याप्त उपलब्धता के कारण गंभीर रूप से प्रभावित होता आ रहा है। स्थिति यह है कि दक्षिण बिहार के कई जिलों में भूजल स्तर में लगातार और खतरनाक गिरावट दर्ज की जा रही है, जिसके चलते आम नागरिकों को पीने के पानी और किसानों को खेतों की सिंचाई के लिए भारी किल्लत का सामना करना पड़ रहा है।

भविष्य की चुनौतियों का अनुमान जताते हुए उन्होंने कहा कि राज्य की बढ़ती आबादी और औद्योगिक तथा कृषि आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए प्रचुर मात्रा में गंगा जल का होना बेहद आवश्यक है। अनुमानों के अनुसार, वर्ष 2050 तक अकेले बिहार को अतिरिक्त 2,000 क्यूसेक पानी की आवश्यकता महसूस होगी। इसलिए, यदि वर्तमान परिस्थितियों को नजरअंदाज करते हुए इस संधि को मौजूदा स्वरूप में ही नवीनीकृत कर दिया गया, तो राज्य की स्थिति और अधिक विकट हो जाएगी। उन्होंने केंद्र सरकार से पुरजोर आग्रह किया कि इस समझौते को बिना सोचे-समझे आगे बढ़ाने के बजाय एक नई और व्यावहारिक व्यवस्था विकसित की जाए, जिसमें सभी संबंधित राज्यों की वास्तविक जरूरतों का वैज्ञानिक अध्ययन शामिल हो।

फरक्का जल संधि की पृष्ठभूमि पर नजर डालें तो भारत और बांग्लादेश के बीच गंगा नदी के पानी के बँटवारे को लेकर साल 1996 में एक महत्वपूर्ण समझौता हुआ था। पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद जिले में गंगा नदी के ऊपर फरक्का बांध यानी बैराज का निर्माण किया गया है, जिसके नाम पर इस संधि का नाम 'फरक्का जल संधि' पड़ा है। इस समझौते के तहत दोनों देशों के बीच गंगा के पानी के बंटवारे के लिए बहुत ही स्पष्ट और विस्तृत प्रावधान तय किए गए हैं।

समझौते के तय नियमों के अनुसार, यदि फरक्का बैराज के पास पानी की कुल आपूर्ति 70,000 क्यूसेक या उससे कम रहती है, तो उपलब्ध पानी का ठीक 50-50 प्रतिशत हिस्सा भारत और बांग्लादेश दोनों देशों के बीच बराबर बांटा जाता है। वहीं, यदि पानी का प्रवाह 70,000 से 75,000 क्यूसेक के बीच दर्ज किया जाता है, तो समझौते के तहत तय मात्रा के अनुसार बांग्लादेश को निश्चित तौर पर 35,000 क्यूसेक पानी दिया जाता है और शेष बचा हुआ सारा जल भारत के उपयोग के लिए निर्धारित रहता है। इसी प्रकार, यदि फरक्का से पानी का प्राकृतिक प्रवाह 75,000 क्यूसेक के आंकड़े को पार कर जाता है, तो भारत अपने घरेलू और विकासात्मक उपयोग के लिए 40,000 क्यूसेक पानी अपने पास रखता है, जबकि इसके अलावा बचा हुआ सारा अतिरिक्त जल बांग्लादेश को उपलब्ध कराया जाता है।

जेडीयू सांसद ने अंत में दो टूक अंदाज में दोहराया कि इस प्रकार के जल-बंटवारे के प्रावधानों के कारण बिहार को जो नुकसान उठाना पड़ रहा है, उसे अब और अनदेखा नहीं किया जा सकता। भारत और बांग्लादेश के बीच होने वाले इस महत्वपूर्ण समझौते के नवीनीकरण के मोड़ पर खड़े होकर बिहार के राजनीतिक दलों और जनप्रतिनिधियों ने अपनी आवाज को बुलंद कर दिया है। अब यह देखना बेहद दिलचस्प और महत्वपूर्ण होगा कि केंद्र सरकार इस गंभीर और दीर्घकालिक क्षेत्रीय मुद्दे पर क्या रुख अपनाती है और राज्य के हितों की रक्षा के लिए आगामी समय में क्या वैकल्पिक कदम उठाए जाते हैं।