मनुष्य जीवन में साधना ही शिव तक पहुंचने का मार्ग, संत मनसुखराम ने बताया प्रेम का रहस्य
नाथद्वारा के शाहपुर ऊपला रामद्वारा में शिव महापुराण कथा के दौरान संत मनसुखराम जी महाराज ने साधना, संत सेवा और माता-पिता की आज्ञा का महत्व बताया। उन्होंने संत संग से परमात्मा के प्रति प्रेम जागृत होने का रहस्य समझाया।
तस्वीर में संत श्री मनसुखराम जी महाराज नाथद्वारा में शाहपुर ऊपला रामद्वारा में शिव महापुराण कथा के दौरान माइक के सामने प्रवचन देते हुए नजर आ रहे हैं।
नाथद्वारा शहर के शाहपुर ऊपला रामद्वारा में चल रही शिव महापुराण कथा में जालौर से चातुर्मास के लिए पधारे संत श्री मनसुखराम जी महाराज ने मनुष्य जीवन में साधना, सरलता, संत सेवा और माता-पिता की आज्ञा के महत्व पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि मनुष्य के जीवन में साधना ही उसे शिव तक ले जाती है।
संत श्री मनसुखराम जी महाराज ने कहा कि शिव सरल, सहज और समाधि में स्थित रहने वाले हैं। भगवान के पास पहुंचने के लिए किसी वस्तु की आवश्यकता नहीं है, केवल मनुष्य के भीतर सरलता होनी चाहिए। सरलता के कारण मनुष्य संसार के कर्मों में नहीं फंसता और परमात्मा को प्राप्त कर लेता है।
शिव पुराण का प्रसंग बताते हुए उन्होंने कहा कि माता-पिता की आज्ञा मानने और उन्हें अपने जीवन में श्रेष्ठ मानने से बालक के जीवन में श्रेष्ठता आती है। उन्होंने बताया कि एक समय ब्रह्मा ने सभी देवताओं को बुलाकर यह विचार रखा कि सबसे पहले किसकी पूजा की जाए। ब्रह्मा जी ने कहा कि जो सबसे पहले पृथ्वी का चक्कर लगाकर आएगा, उसे प्रथम पद दिया जाएगा।
इसके बाद देवता पृथ्वी का चक्कर लगाने के लिए दौड़ पड़े। संत मनसुखराम जी महाराज ने वर्तमान समय का संदर्भ देते हुए कहा कि आज भी पद पाने के लिए लोग भाग रहे हैं और राजनीति कर रहे हैं, लेकिन धर्म नीति नहीं अपना रहे। उन्होंने कहा कि जीवन में राजनीति नहीं, बल्कि धर्म नीति अपनाई जानी चाहिए।
कथा में उन्होंने बताया कि सभी देवता दौड़ने लगे, लेकिन श्री गणेश भगवान संत को देखकर रुक गए। उन्होंने कहा कि जो व्यक्ति अपने जीवन में संत को देखकर रुक जाता है, उन्हें सम्मान देता है और प्रणाम करता है, वह संत की कृपा से जीवन में परम पद प्राप्त कर लेता है।
संत श्री मनसुखराम जी महाराज ने कहा कि जिसे हमारे जीवन में कभी संभव नहीं माना जाता, उसे प्राप्त करना ही शिव महापुराण की पावन कथा समझाती है। संत की सेवा दुर्लभ से भी दुर्लभ वस्तु प्रदान कर सकती है। इसी भाव को उन्होंने इन पंक्तियों के माध्यम से व्यक्त किया—
“संत जगावै प्रेम को, राम शब्द को ध्याय।
रामचरण संता बिना, कोई सके न प्रेम जगाय।।”
उन्होंने कहा कि इन पंक्तियों का भाव बहुत गहरा है। संसार में हर जीव के भीतर प्रेम का बीज मौजूद है, लेकिन वह सोया हुआ है। उसे जगाने का काम संत करते हैं। संत स्वयं रात-दिन राम नाम और राम शब्द में लीन रहते हैं और उसी ध्यान के बल से उनमें वह शक्ति आती है।
उन्होंने कहा कि सच्चे संत के बिना सोए हुए प्रेम को कोई नहीं जगा सकता। पंडित, ज्ञानी और ग्रंथ ज्ञान दे सकते हैं, लेकिन हृदय में परमात्मा के प्रति मीठा और निर्मल प्रेम केवल संत की कृपा, उनके संग और उनके दर्शन से जागता है।
संत मनसुखराम जी महाराज ने कहा कि शिव सन्यासी हैं, शिव बैरागी हैं और शिव की शरण में जाने से जीव को संतोष मिलता है। शिव महापुराण की कथा के माध्यम से साधना, संत सेवा और परमात्मा के प्रति निर्मल प्रेम को जीवन में अपनाने का संदेश दिया गया।